गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 591, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें५९० * गीता-संग्रह *
न हि कल्पितकल्पविचार इति
न हि कारणकार्यविचार इति।
पदसन्धिविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ४॥
जो सबमें समरूप है, उस (आत्मा)-में कल्पित और कल्पका विचार नहीं हो सकता; कार्य और कारणका विचार नहीं हो सकता तथा वह पद तथा सन्धिस रहित होता है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ४॥
न हि बोधविबोधसमाधिरिति
न हि देशविदेशसमाधिरिति।
न हि कालविकालसमाधिरिति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ५॥
[समत्वकी] समाधि-अवस्थामें ज्ञान अथवा अज्ञान नहीं होता, उसमें देश अथवा विदेश यह विचार भी नहीं हो सकता; उसमें काल अथवा अकाल नहीं है—ऐसा विचार भी नहीं हो सकता। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ५॥
न हि कुम्भनभो न हि कुम्भ इति
न हि जीववपुर्न हि जीव इति।
न हि कारणकार्यविभाग इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ६॥
समत्वभावमें न तो घटाकाश है और न घट है; उसमें न तो जीवका शरीर है और न तो जीव ही है; उसमें कारण तथा कार्यका विभाग भी नहीं है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ६॥