गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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भी कर्म नहीं करता तो भी दोषोंका अभाव हो जानेसे वह किसीसे
भी बद्ध नहीं होता ॥ ३० ॥
निरामयं निष्प्रतिमं निराकृतिं
निराश्रयं निर्वपुषं निराशिषम् ।
निर्द्वन्द्वनिर्मोहमलुप्तशक्तिकं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३१ ॥
जीवन्मुक्त योगी विकाररहित, अप्रतिम, निराकार, निरालम्ब
देहरहित, इच्छारहित, द्वन्द्वरहित, मोहरहित तथा सर्वशक्तिमान् उस
परमेश्वर शाश्वत आत्माको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥
वेदो न दीक्षा न च मुण्डनक्रिया
गुरुर्न शिष्यो न च यन्त्रसम्पदः ।
मुद्रादिकं चापि न यत्र भासते
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३२ ॥
जहाँ वेद, मन्त्र-दीक्षा, मुण्डन-क्रिया, गुरु-शिष्य-व्यवहार, यन्त्र
आदि सम्पदाएँ और मुद्रा आदिका भी आभास नहीं रह जाता, उस
परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
न शाम्भवं शाक्तिकमानवं न वा
पिण्डं च रूपं च पदादिकं न वा ।
आरम्भनिष्पत्तिघटादिकं च नो
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३३ ॥
जो न शम्भुसे, न शक्तिसे और न मनुसे उत्पन्न हुआ है; जो
न पिण्ड है, न रूपयुक्त है और न पैर आदि इन्द्रियोंसे युक्त है और
जो आरम्भ तथा निष्पत्तिसे युक्त घट आदि पदार्थ भी नहीं है, उस
परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥