गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अवधूतगीता ( १ ) * ५५३
करनेवाला हूँ। कर्म न तो मेरे पूर्व जन्मका है और न इसी जन्मका
है। मेरा देह नहीं है और मैं देहसे रहित भी नहीं हूँ। मैं ममतारहित
अथवा ममतायुक्त भी कैसे हो सकता हूँ॥ ६६॥
न मे रागादिको दोषो दुःखं देहादिकं न मे।
आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम्॥ ६७॥
राग आदि दोष मेरे नहीं हैं और देह आदिसे सम्बन्धित दुःख भी
मेरे नहीं हैं। मुझको एकरूप, विराट् तथा आकाशतुल्य आत्मा
जानो॥ ६७॥
सखे मनः किं बहुजल्पितेन
सखे मनः सर्वमिदं वितर्क्यम्।
यत्सारभूतं कथितं मया ते
त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि॥ ६८॥
हे मित्र मन! अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन है? तुम्हें इस
सब पर मनन करना चाहिये। जो सारभूत है, उसे मैंने तुमको बता
दिया कि तुम वास्तवमें परतत्त्व हो और आकाशतुल्य व्यापक
हो॥ ६८॥
येन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि।
योगिनस्तत्र लीयन्ते घटाकाशमिवाम्बरे॥ ६९॥
योगिजन जिस किसी भी भावसे तथा जहाँ कहीं भी मृत्युको
प्राप्त होनेपर उसी परब्रह्ममें [वैसे ही] विलीन हो जाते हैं, जैसे [घटके
टूट जानेपर] घटाकाश महाकाशमें विलीन हो जाता है॥ ६९॥
तीर्थे चान्त्यजगेहे वा नष्टस्मृतिरपि त्यजन्।
समकाले तनुं मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत्॥ ७०॥
तीर्थमें अथवा चाण्डालके घरमें अचेतावस्थामें भी देहका त्याग करता
हुआ योगी तत्क्षण मुक्त होकर व्यापक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ७०॥