सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 519

५१८ * गीता-संग्रह *


निराधाराग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥ ३८॥
अज्ञानी निराधार आग्रहोंमें पड़कर संसारका पोषण करते रहते हैं। ज्ञानियोंने समस्त अनर्थोंकी जड़ संसार-सत्ताका ही सर्वथा उच्छेद कर दिया है॥ ३८॥

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥ ३९॥
अज्ञानीको शान्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि वह शान्त होनेकी इच्छासे युक्त है (इच्छा ही अशान्ति है)। ज्ञानी पुरुष तत्त्वका दृढ़ निश्चय करके सर्वदा शान्तचित्त ही रहता है॥ ३९॥

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते।
धीरास्ते तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥ ४०॥
अज्ञानीको आत्मसाक्षात्कार कैसे हो सकता है, जबकि वह दृश्य पदार्थोंका आलम्बन स्वीकार करता है। ज्ञानी पुरुष वे हैं, जो उन दृश्य पदार्थोंको देखते ही नहीं और अपने अविनाशी स्वरूपको ही देखते हैं॥ ४०॥

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥ ४१॥
जो आग्रह करता है, उस मूर्खका चित्त निरुद्ध कहाँ है? स्थित-प्रज्ञ आत्मारामका चित्त तो सर्वदा स्वाभाविक ही निरुद्ध रहता है॥ ४१॥

भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः।
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥ ४२॥
कोई पदार्थ-सत्ताकी भावना करता है और कोई पदार्थोंकी असत्ताकी भावना करता है। ज्ञानीपुरुष तो भाव-अभाव दोनोंकी भावना छोड़कर यों ही निश्चिन्त (मस्त) रहता है॥ ४२॥

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ) · पृष्ठ 519, कुल 675 में से · SarvaKosh