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सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

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पृष्ठ 368
* उत्तरगीता * ३६७
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मुञ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम्।  
एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्भिरनुत्तमम्॥ २३॥  

यहाँ शरीरको मूँज कहा गया है और आत्माको सींका योग-वेत्ताओंने देह और आत्माके पार्थक्यको समझनेके लिये यह बहुत उत्तम दृष्टान्त दिया है॥ २३॥  

यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभृत्।  
न तस्येशेश्वरः कश्चित् त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभुः॥ २४॥  

देहधारी जीव जब योगके द्वारा आत्माका यथार्थरूपसे दर्शन कर लेता है, उस समय उसके ऊपर त्रिभुवनके अधीश्वरका भी आधिपत्य नहीं रहता॥ २४॥  

अन्या न्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते।  
विनिवृत्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति॥ २५॥  

वह योगी अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके शरीर धारण कर सकता है, बुढ़ापा और मृत्युको भी भगा देता है, वह न कभी शोक करता है न हर्ष॥ २५॥  

देवानामति देवत्वं युक्तः कारयते वशी।  
ब्रह्म चाव्ययमाप्नोति हित्वा देहमशाश्वतम्॥ २६॥  

अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला योगी पुरुष देवताओंका भी देवता हो सकता है। वह इस अनित्य शरीरका त्याग करके अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है॥ २६॥  

विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते।  
क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित्॥ २७॥  

सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश होनेपर भी उसे भय नहीं होता। सबके क्लेश उठानेपर भी उसको किसीसे क्लेश नहीं पहुँचता॥ २७॥