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सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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३४६ * गीता-संग्रह *


प्रीतोऽस्मि ते महाप्राज्ञ ब्रूहि किं करवाणि ते।
यदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽयमागतः॥ ४३॥
महाप्राज्ञ! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम जिस वस्तुको पानेकी इच्छासे मेरे पास आये हो, उसके प्राप्त होनेका यह समय आ गया है॥ ४३॥

अभिजाने च तदहं यदर्थं मामुपागतः।
अचिरात् तु गमिष्यामि तेनाहं त्वामचूचुदम्॥ ४४॥
तुम्हारे आनेका उद्देश्य क्या है, इसे मैं जानता हूँ और शीघ्र ही यहाँसे चला जाऊँगा। इसीलिये मैंने स्वयं तुम्हें प्रश्न करनेके लिये प्रेरित किया है॥ ४४॥

भृशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण।
परिपृच्छस्व कुशलं भाषेयं यत् तवेप्सितम्॥ ४५॥
विद्वन्! तुम्हारे उत्तम आचरणसे मुझे बड़ा सन्तोष है। तुम अपने कल्याणकी बात पूछो। मैं तुम्हारे अभीष्ट प्रश्नका उत्तर दूँगा॥ ४५॥

बहु मन्ये च ते बुद्धिं भृशं सम्पूजयामि च।
येनाहं भवता बुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप॥ ४६॥
काश्यप! मैं तुम्हारी बुद्धिकी सराहना करता हूँ और उसे बहुत आदर देता हूँ। तुमने मुझे पहचान लिया है, इसीसे कहता हूँ कि बड़े बुद्धिमान् हो॥ ४६॥

॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि उत्तरगीतायां प्रथमोऽध्यायः॥ १॥