सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334
  • नारदगीता * ३३३
    मैंने मनके द्वारा उत्तम गति प्राप्त करनेका निश्चय किया है ॥ ५० ॥
    तत्र यास्यामि यत्रात्मा शमं मेऽधिगमिष्यति ।
    अक्षयश्चाव्ययश्चैव यत्र स्थास्यामि शाश्वतः ॥ ५१ ॥
    अब मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ मेरे आत्माको शान्ति मिलेगी तथा
    जहाँ मैं अक्षय, अविनाशी और सनातनरूपसे स्थित रहूँगा ॥ ५१ ॥
    न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गतिः।
    अवबन्धो हि बुद्धस्य कर्मभिर्नोपपद्यते ॥ ५२ ॥
    परंतु योगके बिना उस परम गतिको नहीं प्राप्त किया जा सकता।
    बुद्धिमान्का कर्मोंके निकृष्ट बन्धनसे बँधा रहना उचित नहीं है ॥ ५२ ॥
    तस्माद् योगं समास्थाय त्यक्त्वा गृहकलेवरम्।
    वायुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाकरम् ॥ ५३ ॥
    अतः मैं योगका आश्रय ले इस देह-गेहका परित्याग करके
    वायुरूप हो तेजोराशिमय सूर्यमण्डलमें प्रवेश करूँगा ॥ ५३ ॥
    न ह्येष क्षयतां याति सोमः सुरगणैर्यथा।
    कम्पितः पतते भूमिं पुनश्चैवाधिरोहति ॥ ५४ ॥
    देवतालोग चन्द्रमाका अमृत पीकर जिस प्रकार उसे क्षीण कर
    देते हैं, उस प्रकार सूर्यदेवका क्षय नहीं होता। धूममार्गसे चन्द्रमण्डलमें
    गया हुआ जीव कर्मभोग समाप्त होनेपर कम्पित हो फिर इस पृथ्वीपर
    गिर पड़ता है। इसी प्रकार नूतन कर्मफल भोगनेके लिये वह
    पुनः चन्द्रलोकमें जाता है (सारांश यह कि चन्द्रलोकमें जानेवालेको
    आवागमनसे छुटकारा नहीं मिलता है) ॥ ५४ ॥
    क्षीयते हि सदा सोमः पुनश्चैवाभिपूयते।
    नेच्छाम्येवं विदित्वैते ह्रासवृद्धी पुनः पुनः ॥ ५५ ॥
    इसके सिवा चन्द्रमा सदा घटता-बढ़ता रहता है। उसकी ह्रास-
    वृद्धिका क्रम कभी टूटता नहीं है। इन सब बातोंको जानकर मुझे चन्द्र-
    लोकमें जाने या ह्रास-वृद्धिके चक्करमें पड़नेकी इच्छा नहीं होती है ॥ ५५ ॥