सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

पुत्रगीता

[महाभारतके शान्तिपर्वमें भीष्म-युधिष्ठिर-संवादके अन्तर्गत पुत्रगीताके रूपमें एक प्राचीन आख्यान आता है, जिसमें सदा वेद-शास्त्रोंके अध्ययनमें तत्पर रहनेवाले एक ब्राह्मणको उनके मेधावी नामक तत्त्वदर्शी पुत्रद्वारा ही बहुत मार्मिक उपदेश दिये गये हैं। प्रत्येक मनुष्यका जीवन क्षणभंगुर है, मृत्यु कभी भी बिना पूर्वसूचनाके आ सकती है, अतः प्रत्येक अवस्थामें संसारकी आसक्तिसे बचकर धर्माचरण तथा सत्यव्रतका पालन करते रहना चाहिये, यही परमसाधन इस पुत्रगीतामें बताया गया है। अत्यन्त प्रभावी ढंगसे चेतावनी देनेवाली यह पुत्रगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]

युधिष्ठिर उवाच
अतिक्रामति कालेऽस्मिन् सर्वभूतक्षयावहे।
किं श्रेयः प्रतिपद्येत तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १॥

राजा युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! समस्त भूतोंका संहार करनेवाला यह काल बराबर बीता जा रहा है, ऐसी अवस्थामें मनुष्य क्या करनेसे कल्याणका भागी हो सकता है? यह मुझे बताइये॥ १॥

भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
पितुः पुत्रेण संवादं तं निबोध युधिष्ठिर॥ २॥

भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें ज्ञानी पुरुष पिता और पुत्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। तुम उस संवादको ध्यान देकर सुनो॥ २॥

द्विजातेः कस्यचित् पार्थ स्वाध्यायनिरतस्य वै।
बभूव पुत्रो मेधावी मेधावी नाम नामतः॥ ३॥

कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें एक ब्राह्मण थे, जो सदा वेद-