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सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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पृष्ठ 158
  • षड्जगीता * १५७

और अर्थसे काम श्रेष्ठ माना गया है। काम धर्म और अर्थका कारण
है, अतः वह धर्म और अर्थरूप है॥ ३६॥

नाकामतो ब्राह्मणाः स्वन्नमर्था-
न्नाकामतो ददति ब्राह्मणेभ्यः।
नाकामतो विविधा लोकचेष्टा
तस्मात् कामः प्राक् त्रिवर्गस्य दृष्टः॥ ३७॥

बिना किसी कामनाके ब्राह्मण अच्छे अन्नका भी भोजन नहीं
करते और बिना कामनाके कोई ब्राह्मणोंको धनका दान नहीं करते
हैं। जगत्के प्राणियोंकी जो नाना प्रकारकी चेष्टा होती है, वह बिना
कामनाके नहीं होती; अतः त्रिवर्गमें कामका ही प्रथम एवं प्रधान स्थान
देखा गया है॥ ३७॥

सुचारुवेषाभिरलंकृताभि-
र्मदोत्कटाभिः प्रियदर्शनाभिः।
रमस्व योषाभिरुपेत्य कामं
कामो हि राजन् परमो भवेन्नः॥ ३८॥

अतः राजन्! आप कामका अवलम्बन करके सुन्दर वेषवाली,
आभूषणोंसे विभूषित तथा देखनेमें मनोहर एवं मदमत्त युवतियोंके साथ
विहार कीजिये। हमलोगोंको इस जगत्में कामको ही श्रेष्ठ मानना
चाहिये॥ ३८॥

बुद्धिर्ममैषा परिखास्थितस्य
मा भूद् विचारस्तव धर्मपुत्र।
स्यात् संहितं सद्भिरफल्गुसारं
ममेति वाक्यं परमानृशंसम्॥ ३९॥

धर्मपुत्र! मैंने गहराईमें पैठकर ऐसा निश्चय किया है। मेरे इस
कथनमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरा यह