गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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आप सब लोग हर्ष और उत्साहके साथ इस प्रश्नका यथावत्रूपसे उत्तर
दें और वही बात कहें, जिसपर आपकी पूरी आस्था हो ॥ ३ ॥
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् ।
जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥ ४ ॥
तब अर्थकी गति और तत्त्वको जाननेवाले प्रतिभाशाली विदुरजीने
धर्मशास्त्रका स्मरण करके सबसे पहले कहना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
विदुर उवाच
बाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा।
भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसम्पदः ॥ ५ ॥
विदुरजी बोले—[राजन्!] बहुत-से शास्त्रोंका अनुशीलन,
तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और
संयम—ये सब आत्माकी सम्पत्ति हैं ॥ ५ ॥
एतदेवाभिपद्यस्व मा तेऽभूच्चलितं मनः।
एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपंद हि मे ॥ ६ ॥
[युधिष्ठिर!] तुम इन्हींको प्राप्त करो। इनकी ओरसे तुम्हारा
मन विचलित नहीं होना चाहिये। धर्म और अर्थकी जड़ ये ही हैं।
मेरे मतमें ये ही परम पद हैं ॥ ६ ॥
धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः।
धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थः समाहितः ॥ ७ ॥
धर्मसे ही ऋषियोंने संसार-समुद्रको पार किया है। धर्मपर ही
सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं। धर्मसे ही देवताओंकी उन्नति हुई है और
धर्ममें ही अर्थकी भी स्थिति है ॥ ७ ॥
धर्मो राजन् गुणः श्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते।
कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ८ ॥
राजन्! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थको मध्यम बताया जाता है