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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १३३
पद्यानुवाद—
राजित है वह सुन्दर प्रतिमा मन-मन्दिरमें मेरे,
साँसें करती रहतीं जिसके फेरे साँझ-सबेरे।
किस वनमें प्रिय जाऊँ, खोजूँ पदचिह्नोंको तेरे?
कब तक रहूँ बरसता, आँखोंमें बदलीको घेरे?
बालबोधिनी—विरहमें अतिशय व्याकुल अन्तर्मनमें श्रीराधाकी
स्फूर्ति प्राप्त होनेपर श्रीकृष्ण कहते हैं, श्रीराधा तो अहर्निश
मेरे मन-मन्दिरमें रहनेवाली मेरी प्रियतमा प्रेयसी हैं और
अपनी हृदयस्थिता उन श्रीराधाके साथ मैं अत्यधिक रमण
करता रहता हूँ। वे मुझसे कभी वियुक्त होतीं ही नहीं।
वनमें जब है ही नहीं, तो उसमें उनको खोजनेसे क्या लाभ
है और यहाँ देखकर मैं जो विलाप कर रहा हूँ वह भी
व्यर्थ है॥४॥
तन्वि खिन्नमसूयया हृदयं तवाकलयामि।
तन्न वेद्मि कुतो गतासि तेन तेऽनुनयामि—
हरि हरि हतादरतया...॥५॥
अन्वय—हे तन्वि (कृशाङ्गि) तव हृदयं (चेतः) असूयया
(तदुत्कर्षज्ञानारोद्यमरूपे गुणे दोषारोपणरूपया ईर्ष्या) खिन्नम्
(नितरां व्यथितम्) आकलयामि (सम्भावयामि); तत् (तस्मात्)
कुतः (कुत्र) गतासि इति न वेद्मि (न जानामि); तेन
(हेतुना) ते (तुभ्यं) न अनुनयामि (पादग्रहणादिना न
क्षमापयामि)॥५॥
अनुवाद—हे कृशाङ्गि ! प्रतीत होता है, तुम्हारा हृदय
असूयासे कलुषित हो गया है, परन्तु मैं क्या करूँ, तुम
अभिमानिनी होकर कहाँ चली गयी हो—पर मैं नहीं जानता
हूँ कि तुम्हारे मानको दूर करनेके लिए कैसे अनुनय विनय
करूँ ?

१३४ श्रीगीतगोविन्दम्
पद्यानुवाद—
जान रहा ईर्ष्यासे तन्वी! छिन्न हृदय है तेरा।
कहाँ गयी है? सुन पायेगी क्या यह अनुनय मेरा?
बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाकी वियोगावस्थासे अत्यन्त
व्याकुल हैं, उद्विग्न हैं। वे अपने समक्ष ही विद्यमान-सी
श्रीराधाको मानकर, स्फूर्त्तिके उद्गमित होनेपर श्रीराधाको
‘तन्वि’ पदसे सम्बोधित करने लगे—हे राधे! मैंने तुम्हें
छोड़कर दूसरी ब्रजाङ्गनाओंके साथ विहार किया। इसलिए
तुम्हारा हृदय कलुषित हो गया है, तुम्हारे हृदयमें अपनी
उत्कर्षताके कारण दूसरोंके प्रति ईर्ष्या भर गयी है।
दोषारोपणके कारण तुम्हारा हृदय खेदमय हो गया है। तुम
यहाँसे अन्यत्र चली गयी हो। यदि मैं जानता कि तुम कहाँ
गयी हो तो तुम्हारा पादस्पर्श करके तुम्हें मना लेता—तुमसे
क्षमा माँग लेता॥५॥
दृश्यसे पुरतो गतागतमेव मे विदधासि।
किं पुरेव ससंभ्रमं-परिरम्भणं न ददासि—
हरि हरि हतादरतया... ॥६॥
अन्वय—[प्रिये,] मे (मम) पुरतः (अग्रतः) एव गतागतं
(यातायातं) विदधासि (करोषि); [पुरतः] दृश्यसे [तथापि] किं
(कथं) पुरा इव (पूर्ववत्) ससम्भ्रमं (सावेगं यथा स्यात्
तथा) परिरम्भणं (आलिङ्गनं) न ददासि [पुरः स्थितायाः
प्रियतमाया ईदृशी निष्ठुरता न युक्ता इत्यभिप्रायः] ॥६॥
अनुवाद—हाय! तुम मेरे सामने आती जाती सी
दिखायी दे रही हो, पर पहलेकी भाँति अतिशय प्रेमोल्लासके
कारण सम्भ्रमके साथ तुम सहसा ही मेरा आलिङ्गन क्यों
नहीं करती हो?
पद्यानुवाद—
मेरे सम्मुख दीख रही तू, पल पल आती जाती।
क्यों न सजनि! फिर सहज भावसे भुज युगमें बँध जाती॥

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १३५
बालबोधिनी—हे प्रिये कृशाङ्गि! अपने सामने मैं तुमको
यातायात करता हुआ देख रहा हूँ, बस केवल तुम आती
जाती ही हो, पर क्या कारण है कि आज तुम मुझे
आलिङ्गन पाशमें नहीं बाँध रही हो? तुम इतनी निष्ठुर क्यों
बन गयी हो? सच है कि विरही पुरुषकी उद्विग्नावस्था जब
पराकाष्ठापर पहुँच जाती है, तब उस समय उसकी भावना
चरम अवस्थाको प्राप्त हो जाती है। उस समय उसे लगता
है कि उसका प्रेमी वहीं है। श्रीराधाके वियोगके कारण
श्रीकृष्ण इतने विकल हो गये हैं कि उनकी भावना
साक्षात्कृतावस्था तक पहुँच गयी है, सभी ओर श्रीराधा ही
श्रीराधा दिखायी दे रही है। वही, वही, बस वही श्रीराधा
सम्पूर्ण संसारमें दिखायी दे रही है॥६॥
क्षम्यतामपरं कदापि तवेदृशं न करोमि।
देहि सुन्दरि दर्शनं मम मन्मथेन दुनोमि—
हरि हरि हतादरतया...॥७॥
अन्वय—हे सुन्दरि, क्षम्यतां [अपराधमिमम् इति शेषः]
कदापि तव अपरम् ईदृशम् (एवम्प्रकारं) [अप्रियमिति शेषः]
न करोमि (करिष्यामि); [अतः] मम दर्शनं देहि; मन्मथेन
(मनो मथ्नातीति मन्मथो विरहः तेन) दुनोमि (क्लेशं
प्राप्नोमि)॥७॥
अनुवाद—हे सुन्दरि! मुझे क्षमा कर दो। अब तुम्हारे
सामने ऐसा अपराध कभी नहीं करूँगा। अब दर्शन दो, मैं
कन्दर्प पीड़ासे व्यथित हो रहा हूँ।
पद्यानुवाद—
क्या न क्षमा अब कर दोगी निज अपराधीको रानी?
मधुमयि! दर्शन दे कष्टोंकी कर दो अन्त कहानी॥
भूल न होगी; अब भविष्यमें यह आँखोंका पानी—
साक्षी है, कवि ‘जय’ के स्वरमें गूँजी मोहन-वाणी॥

१३६ श्रीगीतगोविन्दम्
बालबोधिनी—श्रीकृष्णकी उद्वेगावस्थाकी चरम सीमा यहाँ
कविद्वारा अभिव्यक्त हो रही है। मनमें श्रीराधाकी स्फूर्त्ति होने
लगी है, उनके सामने वे अपने आराध्यकी स्वीकृति करते
हुए कह रहे हैं, हे राधे! मेरे अपराधोंको क्षमा करो, जो
कुछ हो गया उसे भूल जाओ, भविष्यमें अब कभी ऐसा
अपराध नहीं करूँगा। मुझे दर्शन दो, मैं तुम्हारा अति प्रिय
हूँ, तुम मेरी आँखोंसे ओझल मत होओ। तुम्हारे विरहमें मैं
कामतापसे झुलसा जा रहा हूँ।
प्रस्तुत गीतमें वर्णित नायक श्रीकृष्ण धीर ललित हैं
तथा परस्पर अनुराग जनित विप्रलम्भ-शृङ्गार इस गीतका
प्रधान रस है।
वर्णितं जयदेवकेन हरेरिदं प्रवणेन।
केन्दुबिल्व-समुद्रसम्भव-रोहिणी-रमणेन—
हरि हरि हतादरतया... ॥८॥
अन्वय—केन्दुबिल्व-समुद्र-सम्भव-रोहिणी-रमणेन (केन्दु-
बिल्वनामा ग्रामः स एव समुद्रं तस्मात् सम्भवतीति तथोक्तः
यः रोहिणीरमणः चन्द्रः तेन) जयदेवकेन प्रवणेन (प्रणतेन
सता; नम्रेण इत्यर्थः) हरेः (कृष्णस्य) इदं (विरहगीतं) वर्णितं
(रचितम्) ॥८॥
अनुवाद—केन्दुबिल्व नामक ग्रामरूप समुद्रसे जो चन्द्रमाकी
भाँति आविर्भूत हुए हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णकी विलापसूचक
वचनावलीका संग्रह किया है—ऐसे कवि श्रीजयदेव विनम्रताके
साथ इस गीतका वर्णन कर रहे हैं।
बालबोधिनी—कवि श्रीजयदेवजीने अत्यन्त विनयपूर्वक
श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णके विरह-विलापका वर्णन किया है।
समुद्रसे जैसे चन्द्रमाका उद्भव होता है, उसी प्रकार केन्दुबिल्व
गाँवमें जयदेव नामक कविका आविर्भाव हुआ है। श्रीजयदेव

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १३७
कविका एक नाम पीयूषवर्षी है। पीयूषवर्षी चन्द्रमाका भी
एक नाम है। रोहिणीरमण चन्द्रमाका ही नाम है। चन्द्रमासे
जैसे सभी लोग आनन्दित होते हैं, उसीप्रकार इस गीतिकाव्यसे
भी सभी लोग आनन्दित होंगे ॥८॥
हृदि विसलता-हारो नायं भुजङ्गम-नायकः
कुवलय-दल-श्रेणी कण्ठे न सा गरल-द्युतिः
मलयज-रजो नेदं भस्म-प्रिया-रहिते मयि
प्रहर न हर-भ्रान्त्याऽनङ्ग क्रुधा किमु धावसि ? ॥९॥
अन्वय—[अधुना मन्मथमुपालभते]—हे अनङ्ग, क्रुधा (कोपेन)
किमु (कथं) धावसि ? [मदर्थञ्चेत्, तर्हि] हरभ्रान्त्या (शङ्करभ्रमेण)
प्रियारहिते मयि न प्रहर (प्रहारं मा कुरु) [हरस्तु प्रियार्द्धाङ्गयुक्तः
अतो नाहं हरोऽस्मि; तल्लक्षणादिकं चेत् दृश्यते मयि इत्यपि
न; तथाच हरभ्रान्तिं वारयति] हृदि (मम वक्षसि) अयं
विसलताहारः (विसलताया मृणालस्य हारः); [विरहतापशान्त्यर्थं
ध्रियते इति भावः] भुजङ्गम-नायकः (भुजगपतिः शेषः यः
हरेण मालाकारेण हृदि ध्रियते इति सः) न। कण्ठे कुवलय-
दलश्रेणी (कुवलयानां नीलोत्पलानां दलश्रेणी दलपङ्क्तिः),
[शैत्याय ध्रियते इति भावः]; सा (प्रसिद्धा) गरलद्युतिः
(हलाहलकान्ति; या हरकण्ठे विराजते सा) न। [किञ्च] इदं
(मम गात्रलग्नं) मलयज-रजः (चन्दनरेणुः) विरहताप-शान्त्यर्थं
शैत्याय सौगन्धाय ध्रियते इति भावः] भस्म (हरगात्रलग्नं
भषितं) न ॥९॥
अनुवाद—हे अनङ्ग ! क्या तुम मुझे चन्द्रशेखर जानकर
रोष भरकर कष्ट दे रहे हो ? तुम्हारी यह कैसी विषमता
है ? मेरे हृदयमें जो कुछ देख रहे हो, वह भुजङ्गराज वासुकी
नहीं है, यह तो मृणाल लता निर्मित हार है। कण्ठदेशमें
विषकी नीलिमा नहीं है, नील कमलकी माला है। यह
प्रियाविहीन मेरी इस देहपर चिताभस्म नहीं, यह तो चन्दनका

१३८ श्रीगीतगोविन्दम्
अनुलेपन है। इसलिए हे मन्मथ ! तुम निवृत्त हो जाओ,
भ्रममें पड़कर मुझपर व्यर्थ ही विषम बाणकी वर्षा मत
करो, क्रोध करके मेरी ओर क्यों दौड़ रहे हो ? और देखो !
महादेव पार्वतीके साथ अर्द्धाङ्गमें मिलित होकर सुखसे
विराज रहे हैं, परन्तु मेरी प्राणाधिका राधिकाके साथ मिलन
तो बहुत दूरकी बात, वह कहाँ है, मैं भी नहीं जानता
हूँ॥९॥
पद्यानुवाद—
उर पर नाग नहीं है यह तो, श्रेणी कुवलय दलकी।
विषकी आभा नहीं कण्ठमें, माला नील कमल की॥
भस्म नहीं है शीतल करने, विरह तापकी ज्वाला—
लगा रहा मलयज–रज तनमें, मैं विरही मतवाला॥
बालबोधिनी—प्रेयसी श्रीराधाके विरहमें कामदेवके बाणोंसे
श्रीकृष्णका अन्तःकरण जर्जरित हो गया है। श्रीकृष्णको ऐसा
प्रतीत हो रहा है, जैसे कामदेवने उसे चन्द्रमौलि समझ लिया
है, तभी तो अपने अभेद्य बाणोंका प्रहार उन पर कर रहा
है, विह्वल होकर श्रीकृष्ण कहते हैं—हे अनङ्ग ! देखो,
महादेव सर्वदा अपनी प्रियतमा पार्वतीके साथ अर्द्धाङ्गमें
मिलित होकर कैसे सुखसे विराजमान हैं, परन्तु प्राणाधिका
श्रीराधिकाके साथ मेरा मिलन तो बहुत दूरकी बात है, वह
कहाँ है, यह भी मुझे पता नहीं है। मन्मथ-सन्तापसे पीड़ित
श्रीकृष्णको श्रीराधाकी स्फूर्त्ति हो रही है। अतः वे साक्षात्
रूपमें कह रहे हैं—हे अनङ्ग! तुम क्यों व्यर्थ ही क्रोध
करके मुझे शङ्कर समझकर बार-बार मेरे ऊपर आघात
करनेके लिए दौड़ रहे हो। तुम्हें जो यह साँपकी तरह
कमलनालके सूतोंकी माला दिखती है, यह तो मृणाल-दण्डका
हार है, मेरे गलेमें जो नील-कमलोंकी पंक्ति है, उसे तुम
शङ्करके गलेमें विषकी नीलकान्ति मान रहे हो, मेरे शरीर
पर जो यह देख रहे हो वह भस्म नहीं है, वह तो

तृतीयः सर्गः-मुग्ध-मधुसूदनः १३९
प्रियतमाके वियोगजनित सन्तापको दूर करनेके लिए मलयज
चन्दनका लेप लगाया है, जो सूखकर भस्ममें परिणत हो
गया है। मैं तो प्रियाके बिना वैसे ही निष्प्राण हो रहा हूँ;
क्यों मेरे ऊपर प्रहार कर रहे हो ?
प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द, अपह्नति अलङ्कार तथा
विप्रलम्भ-शृङ्गार चित्रित है। कुछ विद्वानोंके मतानुसार यहाँ
भ्रान्तिमान अलङ्कार है।
पाणौ मा कुरु चूत-शायकममुं मा चापमारोपय
क्रीड़ा-निर्जित-विश्व ! मूर्च्छित-जनाघातेन किं पौरुषम्।
तस्या एव मृगीदृशो मनसिज ! प्रेङ्खत्कटाक्षाशुग-
श्रेणी-जर्जरितं मनागपि मनो नाद्यापि सन्धुक्षते ॥१० ॥
अन्वय-[न केवलमङ्गदाहात् शिवो मम वैरी, भवानपि
उल्लङ्घित- शासन-त्वात्, अतस्त्वय्यपि प्रहरिष्यामीत्यत आह]-हे
क्रीड़ानिर्ज्जितविश्व (क्रीड़या निर्ज्जितः विश्वं येन तत्सम्बुद्धौ)
हे मनसिज (हे अनङ्ग) अमुं चूतशायकं (आम्रमुकुलरूपं
बाणं) पाणौ (हस्ते) मा कुरु (मा गृहाण); [यदि पाणौ
कृतवानसि तर्हि पाणौ एव आस्ताम्] चापं (धनुः) मा
आरोपय (शयेण मा सन्धोहि इत्यर्थः); [कथमेवं विधेयमित्यत
आह]-मूर्च्छितजनाघातेन (मूर्च्छितस्य शरप्रहारेण मोहं गतस्य
जनस्य आघातेन प्रहारेण प्रहृत-प्रहारेण इत्यर्थः) किं पौरुषं
(कः पुरुषकारः) ? (कथं त्वं मूर्च्छितः इत्यत आह)-[मम]
मनः तस्या एव मृगीदृशः (मृगाक्ष्याः राधायाः) प्रेङ्खत्कटाक्षाशुग-
श्रेणीजर्जरितं (प्रेङ्खन्तः उच्छलन्तं ये कटाक्षाः ते एव
आशुगाः बाणाः तेषां श्रेणीभिः पङ्क्तिभिः जर्जरितं नितरां
विद्धम्) [अतएव] अद्यापि मनागपि (अत्यल्पमपि) न सन्धुक्षते
(न प्रकृतिं गच्छति) ॥२॥
अनुवाद-हे कन्दर्प ! क्रीड़ाके छलसे शरासनके बलपर
समस्त विश्वको जीतनेवाले, स्मर-ज्वरसे पीड़ित अत्यन्त
दीनहीन जर्जरित मेरे जैसे व्यक्तिके ऊपर प्रहार करनेसे

१४० श्रीगीतगोविन्दम्
तुम्हारा कौनसा पराक्रम सिद्ध होगा? तुम इस आम्रमञ्जरीके
बाणको अपने हाथमें मत लो और यदि लेते भी हो तो
उसे धनुषपर मत चढ़ाओ। देखो! उस मृगनयना श्रीराधाके
ही प्रसृमर कटाक्षोंसे जर्जरित मेरा मन अभी तक स्वस्थ नहीं
हो पाया है, अतएव मदनविकारसे मूर्च्छित उसपर प्रहार मत
करो ॥१०॥
पद्यानुवाद—
शिवके धोखे 'अशिव' कृत्य क्यों करते मनसिज भोले!
रोष भरे बरसाते हो शर निशिदिन तरकस खोले।
आम्रमञ्जरीके बाणोंको मत निज करमें धरना।
यदि धरना तो धनुपर धरकर सन्धान न करना॥
देख रहे हो मृगनयनीके शरसे हियका छिदना।
पुनः तुम्हारे बाणोंका क्या सह पाऊँगा बिधना॥
निज क्रीड़ासे जीत विश्वको उस पर शासन करते।
मूर्च्छित जनपर कर प्रहार क्यों शौर्य प्रदर्शन करते?
बालबोधिनी—कामदेवने मानो श्रीकृष्णसे कहा-मेरे शरीरको
जलानेवाला वह शिव तो शत्रु है ही, परन्तु आप भी मेरे
शासनका उल्लंघन करनेवाले हैं, अतः आप पर भी
बाणोंका अनुसन्धान करूँगा। तब श्रीकृष्ण कामको उपालम्भ
देते हुए कहते हैं कि—हे मनसिज! मत लो हाथमें आमके
बौरोंका बाण।
कामदेवके पुष्पबाण पाँच प्रकारके होते हैं—
(१) आम्र मुकुल, (२) अशोक पुष्प, (३) मल्लिका
पुष्प, (४) माधवी पुष्प, (५) बकुल पुष्प (मौलश्री)।
वसन्त ऋतु होनेके कारण आम्रमञ्जरी वृक्षोंके अग्रभागमें
निकल आयी है। श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं कि कामदेव
इसी आम्रमञ्जरीको अपना बाण बनाकर राधा-विरहमें
व्यथित मुझपर ही आघात करेगा। अतएव उसे विरमित
कर रहे हैं—तुम आम्रमञ्जरीके उस बाणको अपने करोंमें
ग्रहण मत करो।

तृतीयः सर्गः-मुग्ध-मधुसूदनः १४१
मा चापमारोपय—यदि तुमने निज हाथोंमें धारण कर ही
लिया है, तो भी इसे अपने धनुषकी प्रत्यंचापर मत
चढ़ाओ। हे क्रीडानिर्जित विश्व—अपने खेलसे ही विश्वको
जीतनेवाले! मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ, वह बाण मुझ
निष्प्राणका वध कर डालेगा। तुम विश्वविजयी हो, मैं
श्रीराधाके वियोगके कारण मृततुल्य हूँ। तुम्हारे जैसा वीर
किसी मरेको मारने लगे, तो तुम्हारा ही अपयश होगा,
तुम्हारे पराक्रमकी प्रशंसा न होगी।
'मनसिज' इस पदसे श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि तुम तो
मेरे मनसे ही उत्पन्न हुए हो। जिससे उत्पन्न हुए हो, उसीको
मारने लग जाना तो कोई उचित कार्य नहीं है।
तुम श्रीराधाके लिए मेरे प्रति बाणोंका प्रहार करना
चाहते हो तो श्रीराधाके प्रसृमर कटाक्षपातरूपी बाण जो
तुम्हारे बाणोंसे भी अधिक तीक्ष्ण है, उसीसे जर्जरित हो
गया हूँ। इस घायल पर असाध्य विषबाणका प्रहार क्यों?
प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीडित छन्द तथा आक्षेपालङ्कार
है॥१०॥
भ्रूपल्लवो धनुरपाङ्ग-तरङ्गितानि
बाणा गुणः श्रवण-पालिरिति स्मरेण।
तस्यामनङ्ग-जय-जङ्गम-देवताया-
मस्त्राणि निर्जित-जगन्ति किमर्पितानि ॥११॥
अन्वय—भ्रूपल्लवः (भ्रूः पल्लव इव तथोक्तः) धनुः
(कार्मुकं) अपाङ्गतरङ्गितानि (कटाक्षप्रेक्षितानि) बाणाः (शराः),
श्रवणपालिः (कर्णप्रान्तभागः) गुणः (मौर्वी) इति (एतानि)
निर्जित-जगन्ति (निर्जितानि जगन्ति यैः तादृशानि) अस्त्राणि
स्मरेण (कामेन) अनङ्ग-जय-जङ्गम-देवतायाम् (अनङ्गस्य
जयः त्रिभुवनपराभव स्तस्य या जङ्गमा चञ्चला देवता
तदधिष्ठात्री देवीत्यर्थः तथाभूतायां) तस्याम् (राधायाम्) अर्पितानि

१४२ श्रीगीतगोविन्दम्
(न्यस्तानि) किम्? [तत्प्रसादलब्धैरस्त्रैः जगज्जित्वा पुनस्तत्रै-
वार्पितानीति भावः] ॥३॥
अनुवाद—अहो! भ्रु-पल्लवरूपी धनुष, अपाङ्ग-भङ्गिमा,
तरङ्गरूपी बाण, नयन अवधि श्रवण प्रान्ततक विस्तृत ज्या
अर्थात् धनुषकी डोरी—इस सम्पूर्ण अमोघ अस्त्रविद्याके
साधनरूपी उपकरणोंको कामदेवने सम्पूर्ण जगतको निर्विशेषरूपमें
जीतकर उन अस्त्रोंकी स्वामिनी, अपनी विजयकी जङ्गम
देवता श्रीराधाको पुनः अर्पित कर दिया है।
पद्यानुवाद—
त्रिभुवन विजयी अस्त्रोंको, अर्पित राधाको ऐसे-
कर समा गया स्मर उसमें, कोई हारा हो जैसे।
भौंहोंमें 'धनुष' बसा है, शर-पाँत दीठमें बैठी!
कानोंकी पाली दिखती, मानो प्रत्यंचा ऐंठी॥
बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधामें कामबाण-समूहका आरोपण
करते हुए कहते हैं कि संसारको जीतनेवाले अस्त्रोंको
कामदेव श्रीराधामें ही निक्षिप्त कर दिया है क्या? 'तत्'
शब्दसे यहाँ 'पूर्वानुभूति' अभिव्यक्त हुई है। 'तस्याम्' पदसे
सूचित किया है कि जिस श्रीराधाके वियोगसे मैं व्याकुल हूँ,
जो मेरी मनःकान्ता है, उसीमें श्रीकृष्णने जगद्विजयी अस्त्रोंको
निक्षिप्त कर दिया है।
श्रीराधाके द्वितीय वैशिष्ट्यका प्रतिपादन करते हुए
कहते हैं कि श्रीराधा अनङ्गजयी जङ्गम देवता है। कामदेव
तो जगद्विजय करनेवाले चलते-फिरते देवता हैं। श्रीराधासे ही
अस्त्रोंको उपलब्ध करके कामदेवने जगत् जीता और पुनः
उद्देश्यकी पूर्ति हो जानेपर उसी देवताको उन अस्त्रोंको
समर्पित कर दिया है।
कामदेवका जगद्विजयी अस्त्र है—भ्रूपल्लव-धनुः। श्रीराधाकी
भौंहें नीली एवं स्निग्ध हैं; इसलिए उनमें भ्रूपल्लवका आरोप
है और टेढ़ी होनेसे उनमें धनुषका आरोप है। श्रीराधाके

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १४३
'अपाङ्ग-तरङ्ग' ही कामदेवके अपाङ्ग वीक्षणरूपी कटाक्षवेधक
बाण हैं। बाण जिसप्रकार अभिलक्ष्यका भेदन कर डालते हैं,
उसी प्रकार श्रीराधाने भी मेरे मनको भेद डाला है। 'अस्त्र'
शब्दसे अस्त्रविद्या साधनके उपकरण कहे जाते हैं।
इसप्रकार श्रीकृष्णने तत् तत् आविष्कार समर्थ अवयवोंमें
कामदेवके तत् तत् अस्त्रविद्या साधनोपकरणोंकी उत्प्रेक्षा की
है।
इस श्लोकमें 'वसन्त तिलका' छन्द है, उत्प्रेक्षा एवं
रूपक अलङ्कारोंकी संसृष्टि है॥११॥
भ्रूचापे निहितः कटाक्ष-विशिखो निर्मातु मर्मव्यथां
श्यामात्मा कुटिलः करोतु कबरी-भारोऽपि मारोद्यमम्।
मोहन्तावदयञ्च तन्वि तनुतां विम्बाधरो रागवान्
सद्वृत्तं स्तन-मण्डलं तव कथं प्राणैर्मम क्रीड़ति ॥१२॥
अन्वय—[अधुना तत्कटाक्षादि-स्मरणेन स्वस्य सातिशय-पीड़ां
वर्णयति]—हे तन्वि (कृशाङ्गि) भ्रूचापे (भ्रूरेव चापो धनुः
तत्र) निहितः (अर्पितः) कटाक्षविशिखः (कटाक्ष एव विशिखः
शरः) मर्मव्यथां (मर्माणि व्यथां) निर्मातु (विदधातु) [नात्राप्यनौचित्यं
चापार्पितबाणस्य मर्मव्यथादायक-स्वभावत्वादिति भावः; श्यामात्मा
(श्यामवर्णः; अन्यत्र मलिनस्वभावः) कुटिलः (भङ्गिभृत्;
अन्यत्र वक्रस्वभावः) कबरीभारः (केशपाशः) अपि मारोद्यमं
(मारस्य अन्यत्र मारणस्य उद्यमं) करोतु [कुटिलस्य
मलिनस्वभावस्य च मारक-स्वभावत्वादितिभावः]; अयञ्च रागवान्
(रक्तवर्णः; अन्यत्र क्रोधनः) विम्बाधरः (विम्बफलवत् अधरः)
मोहं तावत् तनुतां (विदधातु) [स्वभावकोपनस्य प्रहारादिना
मोहजनकत्वादिति भावः]; तव सद्वृत्तं (सुगोलं अन्यत्र
सुचरित्रं) स्तनमण्डलं कथं मम प्राणैः क्रीड़ति (प्राणहरणरूपां
क्रीड़ां किमिति करोतीत्यर्थः) [सद्वृत्तस्य परपीडाकरणमनुचितमिति
भावः]॥१२॥

१४४ श्रीगीतगोविन्दम्
अनुवाद—हे छरहरी देहयष्टिवाली (इकहरे बदन वाली)
राधे ! तुम्हारे भ्रूचापसे निक्षिप्त कटाक्ष विशिख (बाण) मेरे
हृदयको निदारुण पीड़ासे पीड़ित करे, तुम्हारा श्यामल
कुटिल केशपाश मेरा वध करनेका उपक्रम करे, तुम्हारा यह
बिम्बफलके समान राग-रञ्जित अधर मुझमें मोह उदित
करे, किन्तु तुम्हारा यह सद्वृत्त (सुगोल) मनोहर मण्डलाकार
स्तनयुगल सुचरित होकर क्रीड़ाके छलसे मेरे प्राणोंके साथ
क्यों क्रीड़ा कर रहा है ?
पद्यानुवाद—
हे तन्वि, नेत्र-शर तेरे, नित छेद रहे हैं उरको
वे व्याल केश भी रह-रह, डँसते रहते हैं मुझको।
वे सरस मधुर बिम्बाधर, मुझको मोहाकुल करते
उन्नत उरोज सखि! तेरे, क्यों जी में जीवन भरते ॥
बालबोधिनी—श्रीराधाका ध्यान करते हुए श्रीकृष्ण कहते
हैं, राधे ! तुम्हारे भ्रूकुटि धनुषमें आरोपित बाण ही मेरे
अन्तःकरणको प्रपीड़ित कर रहे हैं, तुम्हारे कटाक्षकी लहरें
ही बाण हैं, उनका ऐसा करना उचित ही है, क्योंकि धनुषसे
सम्बन्धित बाण स्वाभाविकरूपसे दूसरोंके लिए दुःखदायी होते
हैं—दूसरोंको विदीर्ण करना ही तो इनका धर्म है।
तुम्हारे काले कुञ्चित स्वाभाविक रूपसे वक्रता धारण
किये हुए केश भी मारनेका पराक्रम करते हैं, यह भी अनुचित
नहीं है, क्योंकि जिसका हृदय कुटिल एवं मलिन होता है, वह
दूसरोंको मारनेका प्रयास स्वाभाविकरूपसे करते ही हैं।
हे कृशाङ्गि राधे ! बिम्बफल सदृश तुम्हारा यह रक्तिम
अधर मुझे मूर्च्छित कर रहा है, उसमें भी कोई अनौचित्य
नहीं हैं, क्योंकि जो रागी होता है वह अनुरागमें क्या नहीं
करता ? दूसरोंको मोहित करनेका काम स्वाभाविकरूपसे
करता है।
किन्तु यह अवश्य ही अनुचित लगता है कि तुम्हारा

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १४५
सुवर्त्तुल स्तनयुगल क्रीड़ाके छलसे मेरे प्राणोंको हरण
करनेकी चेष्टा क्यों कर रहा है? सज्जनोंका ऐसा आचरण
तो अस्वाभाविक ही है। जो सद्वृत्त होता है, वह दूसरोंके
प्राणोंके साथ खिलवाड़ नहीं करता।
प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा विरोद्धालङ्कार
है ॥ १२ ॥
तानि स्पर्श-सुखानि ते च तरलाः स्निग्धा दृशोर्विभ्रमा-
स्तद्वक्त्राम्बुज-सौरभं स च सुधास्यन्दी गिरां वक्रिमा।
सा विम्बाधर-माधुरीति विषयासङ्गेऽपि चेन्मानसं
तस्यां लग्न-समाधि हन्त विरह-व्याधिः कथं वर्द्धते ॥ १३ ॥
अन्वय—तानि (पूर्वानुभूतानीत्यर्थः) स्पर्शसुखानि (अङ्गस्पर्श-
जनितानि सुखानि) [एतेन त्वगिन्द्रिय-विषयासङ्गः प्राप्तः]; ते
च (पूर्वानुभूताः) तरलाः (चञ्चलाः) स्निग्धाः (स्नेहवर्षिणः)
दृशोः (चक्षुषोः) विभ्रमाः (विलासाः) [एतेन चक्षुरिन्द्रिय-
विषयासङ्गलाभः]; तद्वक्त्राम्बुज-सौरभं (तत् पूर्वानुभूतं वक्त्रमेव
अम्बुजं तस्य सौरभं) [एतेन घ्राणेन्द्रिय-विषयासङ्ग उक्तः]; स
च (पूर्वानुभूतः) सुधास्यन्दी (अमृतस्रावी) गिरां (वाचां)
वक्रिमा (वक्रता भङ्गिविशेष इत्यर्थः) [एतेन श्रवणेन्द्रिय-
विषयासक्तिः सूचिता]; सा च विम्बाधर-माधुरी (विम्बाधरस्य
माधुरी मधुरता) [एतेन रसनेन्द्रिय-विषयासक्तिः सूचिता]; सा
च विम्बाधर-माधुरी (विम्बाधरस्य माधुरी मधुरता) [एतेन
रसनेन्द्रिय-विषयासङ्गः प्राप्तः]। इति (एवं) विषयासङ्गेऽपि
(विषयेषु आसङ्गे व्यासक्तौ अपि) [मम] मानसं तस्यां
(राधायां) लग्नसमाधि (लग्नः समाधिरेकाग्रता यस्य तादृशं;
तदेकासक्तमित्यर्थः) हस्त (खेदे) विरहव्याधिः (विच्छेदयन्त्रणा)
कथं वर्द्धते [वियुक्तयोरेव विरहः स्यात् अत्र मनसः संयोगो
वर्त्तते तत्कथमियं यातना इत्यभिप्रायः] ॥ १३ ॥

१४६ श्रीगीतगोविन्दम्
अनुवाद—एकान्तमें प्रियाका ध्यान करते हुए मैं इसके
उसी सुविमल स्पर्शजनित सुखका अनुभव कर पुलकित हो
रहा हूँ, उसके नयनयुगलकी चञ्चलता, सुस्निग्ध भङ्गिमा,
विभ्रमता और दृष्टिक्षेपता मुझे संजीवित कर रही है, उसके
मुखारविन्दका सौरभ मुझे आप्लावित कर रहा है, उसकी
उस अमृत निस्यन्दी वचन-परम्पराकी वक्रिमाको श्रवण कर
रहा हूँ। उसके बिम्बफल सदृश मनोहर अधरका मधुर
सुधारसका मैं आस्वादन कर रहा हूँ। उसमें समाधिस्थ मेरे
मनकी विषयासक्ति बनी हुई है, फिर भी मुझमें विरह
व्याधिकी यातना अधिकाधिकरूपमें क्यों बढ़ती जा रही है?
पद्यानुवाद—
वे स्पर्शजनित सुख कोमल, चल दृष्टिक्षेप रस भीने
वह वदन कमल मधु सौरभ, वे वचन सुधा मधुलीने।
वे मधुर अधर बिम्बा सम, तन्मय करते यों मनको
जैसे समाधिमें योगी, विस्मृत कर देते तनको।
संलग्न ध्यान सखि! तुझमें पर विरह व्यथा यह मेरी
भूली है लेश न मुझको, घेरे हैं बनी अहेरी॥१३॥
बालबोधिनी—भावनाकी प्रबलतासे श्रीराधाके साथ विलासकी
स्फूर्त्ति होनेपर अन्तःकरणमें बहती हुई विरह-व्याधिकी
प्रतिकूलताका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं—श्रीराधामें
मेरा मन समाधिस्थ हो गया है, तथापि विरह क्यों मुझे सता
रहा है, क्योंकि विरह तो वहाँ होता है जहाँ खेद एवं वियोग
होता है, जबकि मेरा मन तो श्रीराधामें संलग्न है।
मनः संयोगके अभावमें विरह माना जा सकता है,
परन्तु मन तो यहाँ संयुक्त है, फिर भी विरह इसलिए है कि
इन्द्रिय संयोगका अभाव है। अतःपर यह भी कहा गया है
कि विषयोंके न रहने पर भी मन-ही-मन इन्द्रियसुखका
अनुभव होनेसे उसे संयोग कहा जा सकता है, परन्तु विरह
बना हुआ होता है।

यथार्थ क्या है? मिलनमें जो अनुभव होता था, वही
अनुभव विरहमें भी हो रहा है। त्वचासे श्रीराधाके स्पर्शजनित
पूर्वानुभूत सुखको ही अनुभव कर रहा हूँ, चक्षुसे उसके
प्रेमाद्रनेत्रोंकी तरल प्रीति रसधारको देख रहा हूँ, नासिकासे
श्रीराधिकाके मुखकमलके पूर्वानुभूत सौगन्धका आघ्राण कर
रहा हूँ। समाधिमें प्रत्यक्षमाणा श्रीराधाकी वाणीकी अमृत-स्राविणी
वक्रिमाका श्रवणास्वादन कर रहा हूँ, तथैव बिम्बफल सदृश
अरुणिम सुकुमार अधराधरकी मधुर सुधारस माधुरीमें अवगाहन
कर रहा हूँ। इसप्रकार पाँचों प्रकारके विषयोंका सम्बन्ध मेरे
साथ बना हुआ है। तथापि न जाने क्यों विरहजनित समाधि
बढ़ती जा रही है?
प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है, समुच्चयालङ्कार
तथा विप्रलम्भ शृङ्गार है ॥१३॥

तिर्यक्-कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंसस्य वंशोच्चरद्
गीति-स्थान-कृतावधान ललना-लक्षै र्न संलक्षिताः।
सम्मुग्धं मधुसूदनस्य मधुरे राधामुखेन्दौ सुधा-
सारे कन्दलिताश्चिरं ददतु वः क्षेमं कटाक्षोर्म्मयः ॥१४॥
अन्वय-[अधुना आशिषा सर्गं समापयति]-तिर्यक्-
कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंसस्य (तिर्यक् ईषद्वक्रः कण्ठः
यस्य सः विलोलः चञ्चलः मौलिः मस्तकं तत्रत्य चूड़ा वा
यस्य तथाभूतः तथा तरलो चञ्चलौ उत्तंसौ कुर्णकुण्डलौ
यस्य सः; विशेषण-समासः तादृशस्य) मधुसूदनस्य मधुरे
(मनोहरे) राधामुखेन्दौ (राधायाः मुखम् इन्दुरिव तस्मिन्)
मृदुस्पन्दम् (ईषच्चञ्चलं यथास्यात् तथा) कन्दलिताः (पल्लविताः,
अन्यगोपाङ्गनावदनोडुगणमपहारा तत्रैव उल्लसिताः (वंशोच्चरद्-
गीति-स्थान-कृतावधान-ललनालक्षैः (वंशात् वेणुतः उच्चरत्
या गीतिः तस्याः स्थानेषु पदेषु कृतम् अवधानं यैः तादृशैः

१४८ श्रीगीतगोविन्दम्
ललनानां गोपसुन्दरीणां लक्षैः) न संलक्षिताः (अविज्ञाता
इत्यर्थः) कटाक्षोर्म्मयः (कटाक्षाणाम् ऊर्म्मयः तरङ्गाः अपाङ्गदर्शन-
श्रेणीत्यर्थः) वः (युष्माकं) चिरं क्षेमं दधतु। [अतएव
मुग्धमधुसूदनो रसविशेषास्वाद-चतुरस्ततो मुग्धो मधुसूदनो यत्र
इत्ययं सर्गस्तृतीयः] ॥१४॥
इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये मुग्ध-मधुसूदनो नाम
तृतीयः सर्गः।
अनुवाद—त्रिभङ्ग भावसे अपनी ग्रीवाको बङ्किम करनेके
कारण जिनका शिरोभूषण (मुकुट) एवं कुण्डल दोलायमान
हो रहे हैं, लक्ष-लक्ष गोप-रमणियाँ वेणु-ध्वनिके सुदीप्त
उच्चारण स्थानपर ध्यान लगायी हुई उनके मध्यमें स्थित
श्रीराधाके मनोहर तथा अमृतमय मुखारविन्दको स्नेहातिशयताके
कारण स्थिरदृष्टिसे देखते हुए श्रीकृष्णकी कटाक्षपात राशिकी
ऊर्मियाँ आप सबका मङ्गल विधान करें॥
बालबोधिनी—तृतीय सर्गके अन्तिम श्लोकमें कविने
श्रीराधाके वचनोंको प्रमाणित किया है। गोपाङ्गनाओंके
मध्यमें अवस्थित श्रीकृष्णको श्रीराधा-दर्शनसे भावानुभूति हुई
है, उसीको यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। कविने पाठकों
एवं श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान किया है कि मुग्ध-मधुसूदन
आपका कल्याण विधान करें।
मधुसूदन—जो श्रीराधाके मुखकमलकी ईषत् चञ्चलता
एवं संमुग्धताका दर्शनकर अतिशय उल्लसित हुए हैं, सम्पूर्ण
इतर कामनाओंका परित्याग कर श्रीराधामें एकनिष्ठ हुए
हैं—उनके कटाक्षपातकी उर्मियाँ स्नेहातिशयताके कारण श्रीराधाके
सुललित एवं मधुमय मुखचन्द्रपर स्थिर हो गयी हैं।
संमुग्ध—पदसे श्रीराधाके मुखकी मनोज्ञ अतिशयता
बतायी गयी है। 'मधुर' पदसे श्रीराधाके मुखको अमृतसे भी
मधुर बताया गया है। मोहकता एवं माधुर्यके कारण
श्रीराधाके मुखको श्रीकृष्ण बड़े चावसे देखते हैं। 'सुधासार'

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १४९
से भी श्रीराधाके मुखका पीयूषत्व अभिव्यक्त हो रहा है।
श्रीकृष्णको आह्लादित करनेके कारण श्रीराधामें विधुत्वका
आरोप किया गया है।
स्थिर दृष्टिसे श्रीकृष्ण श्रीराधाके मुखको देख रहे थे,
परन्तु श्रीकृष्णकी इस क्रियाको वहाँ अवस्थित गोपियाँ देख
न सकीं। गोपियोंसे आवृत श्रीकृष्ण बाँसुरीके दीप्तस्थानसे
स्वरालाप कर रहे थे, सभीका ध्यान उन सुरोंमें ही लगा
हुआ था। सभी श्रवणजनित आनन्दमें मग्न थीं। वंशीध्वनिसे
सभीके चित्तको आकर्षित करनेके साथ श्रीकृष्णने अपनी
वंशीकी तानसे श्रीराधाको भी मोहित कर लिया, जिसका
अनुभव किसी गोपीको भी न हो सका—इससे श्रीकृष्णका
चातुर्य प्रकाशित होता है।
श्रीकृष्णकी मुखमुद्राका वर्णन करते हुए कवि कहते
हैं—'तिर्यक्-कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंस्य' अर्थात् श्रीकृष्णकी
ग्रीवाको तिरछे किये हुए बङ्किम मुद्राके कारण उनके मुकुट
तथा कर्णाभरण चञ्चल हो रहे थे। 'मौलि' पदसे मुकुट
और शिर दोनों वाच्य हैं, तथापि शिरका हिलना वेणुवादकका
दोष है और न हिलना दक्षता। श्रीकृष्णमें अद्भुत नैपुण्य था,
अतः शिर नहीं हिल रहा था। मुकुट और कर्णाभूषण ही
आन्दोलित हो रहे थे।
प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा रूपकालङ्कार
है।
इस प्रकार गीत गोविन्द महाकाव्यमें मुग्ध-मधुसूदन
नामक तृतीय सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या पूर्ण हुई।

“और सखीकी व्यथा-कथा सब धीरे-धीरे बोली।”

चतुर्थः सर्गः
स्निग्ध-मधुसूदनः
यमुना-तीर-वानीर-निकुञ्जे मन्दमास्थितम्।
प्राह-प्रेम-भरोद्भ्रान्तं माधवं राधिका-सखी ॥१॥
अन्वय—[अथ राधिकाविरहोत्कण्ठं श्रीकृष्णं] राधिकासखी
(राधिकायाः काचित् सहचरी) प्रेमभरोद्भ्रान्तं (प्रेम्णां भरेण
उद्भ्रान्तम् उन्मत्तं) [अतएव तदन्वेषणं विहाय] यमुनातीर-वानीर-
निकुञ्जे (यमुनातीरे यत् वानीरनिकुञ्जं वेतसलता-कुञ्जं
तस्मिन्) मन्दं (विषण्णं निरुद्यमं वा यथास्यात् तथा) आस्थितम्
(उपविष्टं) माधवं प्राह (उवाच) ॥१॥
अनुवाद—यमुनाके तटपर स्थित वेतसीके निकुञ्जमें
श्रीराधाप्रेममें विमुग्ध होकर विषण्ण (विषाद) चित्तसे बैठे हुए
श्रीकृष्णसे श्रीराधाकी प्रिय सखी कहने लगी।
पद्यानुवाद—
यमुनातीरे वेतसकुञ्जे, बैठे हैं यदुवंशी
राधाके चिन्तनमें अपनी भूले लकुटी-वंशी।
इसी समय सम्मुख हो कोई छाया-सी आ डोली
और सखीकी व्यथा-कथा सब धीरे-धीरे बोली॥
बालबोधिनी—अब दोनोंकी पृथक् कामावस्थाका निरूपण
करके उन दोनोंका संयोजन करानेकी इच्छासे दूतीयोगका
निरूपण करते हैं। श्रीराधिकाकी सखीने माधवसे कहा।
पूर्वरागमें श्रीराधाने अपनी सखीसे श्रीकृष्ण-मिलनकी
वासना अभिव्यक्त की थी। तब वह सखी श्रीराधाको
आश्वासन देकर श्रीकृष्णके पास गयी तो देखा, उनका चित्त
श्रीराधा-विषयक प्रेमाधिक्यके कारण उद्भ्रान्त अर्थात्

१५२ श्रीगीतगोविन्दम्
उन्मत्त-उद्विग्न हो रहा था। अन्वेषण करने पर भी जब
उनकी श्रीराधा नहीं मिलीं तो वे यमुना पुलिन पर विद्यमान
वेतसी निकुञ्जमें निरुत्साहित और उदास होकर बैठ गये।
गीतम् ८
कर्णाटरागैकतालीतालाभ्यां गीयते।
अनुवाद—यह आठवाँ प्रबन्ध कर्णाटराग तथा एकताली
तालसे गाया जाता है। जब शिखिकण्ठ—नीलकण्ठ महादेव एक
हाथमें कृपाण और दूसरे हाथमें एक विशाल गजदन्त धारणकर
दाहिने कन्धेमें रखकर चलते हैं, सुर-चारण आदि उनकी स्तुति
करते हैं, ऐसे समयमें कर्णाट राग प्रस्तुत होता है।
निन्दति चन्दनमिन्दु-किरणमनुविन्दति खेदमधीरम्।
व्याल-निलय-मिलनेन गरलमिव कलयति मलय-समीरम् ॥
सा विरहे तव दीना।
माधव मनसिज-विशिख-भयादिव भावनया त्वयि लीना ॥१॥
ध्रुवपदम्
अन्वय—हे माधव, तव विरहे दीना (कातरा) सा
(राधा) मनसिजविशिखभयादिव (मनसिजस्य कामस्य विशिखेभ्यः
बाणेभ्यः भयादिव) भावनया (उद्वेगेन) त्वयि लीना (ध्यानेन
लयप्राप्ता) [इव आस्ते इति शेषः, कामरूपे त्वयि प्रसन्ने
तद्भयं न करिष्यतीत्यभिप्रायः]; [सा अधुना] चन्दनम् इन्दुकिरणं
(चन्द्रमयुखं) निन्दति, [स्वभावशीतलो यन्मां दहतः तन्ममैव
दुर्दैवमिति] अनु (पश्चात्) अधीरं [यथा तथा] खेदं (तापं)
विन्दति (लभते); [तथा] मलय-समीरं व्याल निलयमिलनेन
(व्यालानां सर्पाणां निलयः चन्दनतरुः तस्य मिलनेन) गरलमिव
कलयति (सम्भावयति) [सर्पभुक्तोज्झितो वायुः विषमिलितत्वात्
विषवत् उत्प्रेक्षते] ॥१ ॥