गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः १७
क्षितिरतिविपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
धरणि–धरणकिण–चक्रगरिष्ठे ।
केशव धृत–कूर्मशरीर
जय जगदीश हरे ॥२ ॥
वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना।
केशव धृत–शूकररूप
जय जगदीश हरे ॥३ ॥
तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम्
दलितहिरण्यकशिपु–तनुभृङ्गम्।
केशव धृत–नरहरिरूप
जय जगदीश हरे ॥४ ॥
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन
पद–नख–नीर–जनितजनपावन।
केशव धृत–वामनरूप
जय जगदीश हरे ॥५ ॥
क्षत्रिय–रुधिरमये जगदपगत–पापम्
स्नपयसि पयसि शमित–भवतापम्।
केशव धृत–भृगुपतिरूप
जय जगदीश हरे ॥६ ॥
वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति–कमनीयं
दशमुख–मौलि–बलिं रमणीयम्।
केशव धृत–रामशरीर
जय जगदीश हरे ॥७ ॥
वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम्
हलहति–भीति–मिलित–यमुनाभम्।
केशव धृत–हलधररूप
जय जगदीश हरे ॥८ ॥