गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३३५
गतिसे उस मंजुल केलि-कुञ्जमें पधारो। अपने मणिमय
नूपुरोंसे सुसज्जित कदमोंको ऐसे विन्यस्त करो कि उनका
मधुर रस-वर्द्धक नाद होता रहे। हे मुग्धे ! अब इन शिथिल
पादारविन्दोंको पृथ्वी पर रखते हुए हंसकी चालको पराजित
करते हुए मधुसूदनके समीप चलो। देर मत करो। इन
मणिनूपुरोंको मुखरित होने दो।
शृणुरमणीयतरं तरुणीजनमोहन-मधु-रिपु-वरावम्।
कुसुम-शरासन शासन-वन्दिनि पिकनिकरे भज भावम् ॥
मुग्धे.... ॥३॥
अन्वय- [तत्र च गत्वा] - रमणीयतरं (अतिमनोहरं) [अतएव]
तरुणी-जन-मोहन-मधुरिपु-रावम् (तरुणीजनानां युवतीनां मोहनं
मोहजनकं मधुरिपोः कृष्णस्य रावं वचनं) शृणु; [तथा]
कुसुम-शरासन-शासन-वन्दिनि (कुसुम-शरासनस्य पुष्पधन्वनः
कामस्य शासनम् आदेशः “हे युवत्यः कान्तसङ्गाहमन्तरेण
मद्बाणात् अन्यो रक्षिता नास्ति, अतो मानं त्यजत" इति
कामाज्ञा तस्य वन्दिनि स्तावके) पिक-निकरे (कोकिलसमूहे)
भावं (अनुरागं) भज। [इदानीं कोकिल-समूहे कृतं विद्वेषं
त्यक्त्वा तेषामालापं सुखेन शृणु इत्यर्थः] ॥३॥
अनुवाद - तुम तरुणियोंके मन-मोहक भ्रमरों (श्रीकृष्ण)
के रमणीयतर सुमधुर वचनोंका श्रवण करो। कन्दर्पके
सुमधुर आदेशका प्रचार करनेवाले कोकिल समूहके गानमें
निज भावोंको प्राप्त करो।
पद्यानुवाद-
मधुवाणी मोहनकी सुन ले,
मोहित युवजन जिस पर गुन ले।
कुसुम शरासन शासन धुन ले ॥
कूक उठी कोकिल मधुवन में।
चल सखि। चल घनश्याम सदन में ॥