गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 366, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें३३४ श्रीगीतगोविन्दम्
करो, यह ध्रुव पद है। तज्जुल आदि विभावसे निकुंज
उपादान इत्यादि प्रकट हो रहा है।
घन-जघन-स्तन-भार भरे! दरमन्थरचरणविहारम्।
मुखरित-मणिमञ्जीरमुपैहि विधेहि मरालनिकारम्॥
मुग्धे.... ॥२॥
अन्वय—[एतन्निशाम्य मौनेन सम्मतिमूहमाना शीघ्रं
गमनप्रकारमाह]—अयि घन-जघन-स्तन-भारभरे (जघनेच स्तनौच
जघनस्तनं घनं संहतं यत् जघनस्तनं तस्य भारस्य भरः
अतिशयो यस्याः तत्सम्बुद्धौ) [अतएव] दर-मन्थर-चरण-विहारं
(दरमन्थरः ईषन्मन्दः चरणविहारः पादविक्षेपः यथा स्यात्
तथा) मुखरितमणिमञ्जीरं (मुखरितौ शब्दितौ मणिमञ्जीरौ
रत्ननूपुरौ यत्र तत् यथा तथा) उपेहि (कृष्णमुपगच्छ) [तेन]
मरालनिकारं (मरालानां राजहंसानां निकारं परिभवं) विधेहि
(गमनेन मरालं पराजयस्वेत्यर्थः); [नूपुर-ध्वनेर्हंसपरिभावित्वादिति
भावः]॥२॥
अनुवाद—हे परस्पर गुरु-भारयुक्त स्तन और जघन
युगल शालिनि राधे! तुम ईषत् मन्द-मन्थर गतिसे चरणोंको
विन्यस्त करते हुए मणिरचित नूपुरोंसे मनोहर शब्द करते
हुए मराल-गमनकी शोभाको भी पराजित करते हुए श्रीकृष्णके
समीप चलो।
पद्यानुवाद—
जीन पयो धन सघन नव, मणि नूपुरका
झन-झन-झन-खा ले मन्थर गति अति सखि।
अभिनव हर हंसोंकी चाल चरणमें
चल सखि! चल घनश्याम सदन में॥
बालबोधिनी—स्थूल ऊरुद्वय एवं पीन पयोधरोंसे विभूषित
श्रीराधा! तुम स्तन-भार एवं श्रोणी-भारसे झुकी जा रही हो।
तुम धीरे-धीरे चलो, तुम्हारी विलम्बित लयमयी चाल
हंसोंको भी लज्जित करनेवाली है। तुम धीरे-धीरे मन्थर