गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१७
श्रीजयदेव-कवेरिदमुदितम् ।
रसिकजनं तनुतामतिमुदितम्—
नाथ हरे! सीदति... ॥८॥
अन्वय—श्रीजयदेव-कवेः उदितम् (उक्तम्) इदं [शृङ्गार-रस
भावितान्तःकरणं] रसिकजनम् अतिमुदितं (अतिप्रीतं) तनुताम्
(कुरुताम्)। [एतेन शृङ्गार-रसाविष्टैर्भक्तैरेव श्रीजयदेवोक्तवचन-
मास्वादनीयमित्युक्तम्] ॥८॥
अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित इस गानसे रसिक
जनोंके हृदयमें अतिशय हर्षका उदय हो।
पद्यानुवाद—
सुनते हैं जो जन इस जगमें,
पाते गति कल्याणी ॥
हे हरि राधा आवास गृहे,
कब तक वियोगका त्रास सहे?
बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि सखीने जो
श्रीराधाकी चेष्टा निवेदन-विषयक गीत गाया है, वह गीत
शृंगार-रस द्वारा विभावित चित्तमय रसिक भक्तोंको अतिशय
आनन्द प्रदान करे।
प्रस्तुत गीतमें शृंगार-रसके विप्रलम्भ भाव-रसका चित्रण
है। समुच्चय स्वर है। शठ नायक है। चिन्तासे व्याकुल
होनेवाली वासकसज्जा नायिका है।
विपुल-पुलक-पालिः स्फीत-सीत्कारमन्त-
र्जनितजड़िमु काकु-व्याकुलं व्याहरन्ती।
तव कितव! विधायामन्द-कन्दर्प-चिन्तां
रस-जलनिधि-मग्ना ध्यानलग्ना मृगाक्षी ॥१॥
अन्वय—[स्व-सख्यार्त्ति-स्मरणेन व्याकुला सा सेर्षमिव
पुनराह]—हे कितव (धूर्त्त; गतप्राणामिव तां वनमानीय
निश्चिन्तोऽसीति धूर्त्ततया सम्बोधनम्) विपुल-पुलक-पालिः