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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 448 में से

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पृष्ठ 161

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १२९
इसप्रकार पश्चात्ताप करते हुए अनङ्गबाणसे आहत
श्रीराधाके लिए विषाद करने लगे।
माधवः यह श्रीकृष्णका नाम साभिप्राय है। मा—लक्ष्मी

  • धव—पति = लक्ष्मीपति; या मा—राधा + धव—प्रियतम
    = माधव; अर्थात् जो श्रीराधाके प्राणप्रियतम हैं, उनका
    श्रीराधाके विरहमें व्याकुल होना उनकी (श्रीराधाकी)
    सौभाग्य-अतिशयताका प्रतीक है।
    प्रस्तुत श्लोकमें 'वंशस्थविला' नामका वृत्त है। वदन्ति
    वंशस्थविले जतौ जरौ—यह वंशस्थविला वृत्तका लक्षण है।
    गीतम् ॥७॥
    गुर्जरी रागेण यति तालेन च गीयते।
    मामियं चलिता विलोक्य वृतं वधू-निचयेन।
    सापराधतया मयापि न निवारिताति भयेन ॥
    हरि हरि हतादरतया गता सा कुपितेव ॥१॥ध्रुवम्
    अन्वय—इयं (राधा) वधूनिचयेन (वधुनां नारीणां निचयेन
    समूहेन) वृतं (परिवेष्टितं) मां [दूरत्एव] विलोक्य चलिता
    [अनेन अन्योन्यावलोकनं जातमिति गम्यते]; कथं तदैव
    नानुनीता मया दृष्टापि] सापराधतया (आत्मानं सापराधं
    मन्यमानेन इत्यर्थः) अतिभयेन (अतिभीतेनेत्यर्थः) मयापि न
    वारिता (निवारिता)। हरि हरि (खेदसूचकमव्ययं—हा कष्टम्)
    हतादरतया (अनादरवशेन) सा (श्रीराधा) कुपितेव (सञ्जात-
    कोपेव) गता (प्रस्थिता) ॥१॥
    अनुवाद—वह श्रीराधा व्रजाङ्गनाओंसे परिवेष्टित मुझको
    देखकर मान करके चली गयीं। अपनेको अपराधी समझकर
    भयके कारण मैं उसे रोकनेका साहस भी न कर सका।