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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 448 में से

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११० श्रीगीतगोविन्दम्
तब वे रतिके उत्साहसे युक्त होकर समस्त दिशाओंको
उल्लसितकर हँसते-हँसते मेरे सामने प्रकट हो गये। सखी
री, उन्हीं कृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥
प्रथम समागम लज्जितया पटु-चाटु-शतैरनुकूलम्।
मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया शिथिलीकृत-जघन-दुकूलम्—
सखि हे केशीमथनमुदारम् ... ... ॥२॥
अन्वय—प्रथम-समागम-लज्जितया (प्रथमः आद्यः यः
समागमः सङ्गमः तेन लज्जितया जातलज्जया) [मया सह]
पटुचाटुशतैः (पटूनि नारी-मनोहरण-निपुणानि-निपुणानि यानि
चाटूनां प्रियवादनां शतानि तैः) अनुकूलं (अनुकूलयन्तं
कृतापराधं मां क्षमस्वेति असकृत् कथयन्तं) [केशिमथनम्..],
[तथा] मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया (मृदु मधुरं यत् स्मितम्
ईषद्धासः तेन सह भाषितं भाषणं यस्याः तथाभूतया) [मया
सह] शिथिलीकृत-जघन-दुकूलं (शिथलीकृतं प्रभ्रंशितं जघनस्थं
दुकूलं वसनं येन तादृशं) [केशिमथनम्.....] ॥२॥
अनुवाद—प्रथम मिलनमें स्वभावसुलभ लज्जासे अत्यन्त
विमुग्ध देखकर मेरी लज्जाको दूर करनेके लिए उन्होंने
अनेक प्रकारकी अनुनय-विनयरूप वचन परम्पराका प्रयोग
किया। उनकी चाटुकारितापूर्ण बातोंसे विमुग्ध होकर मैं
कोमल तथा मधुर मुस्कानके साथ उनसे वार्तालाप करने
लगी, उस समय मेरे जघन-प्रदेशके वस्त्रको हटानेवाले
विदग्ध श्रीकृष्णसे मुझे मिला दो॥१॥
पद्यानुवाद—
प्रथम मिलनकी बेला आयी, चढ़ व्रीड़ाके स्यन्दन री।
किन्तु मधुर बोलोंसे उनके, बनी स्वयं रस-रञ्जन री॥
बालबोधिनी—श्रीराधा सखीसे कहती हैं—यद्यपि प्रियतम
श्रीकृष्णसे यह मेरा प्रथम मिलन नहीं था, फिर भी मैं उनके
समक्ष ऐसी चेष्टा कर रही थी, जिस प्रकार कोई नायिका