गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ८१
बालबोधिनी-नितम्बवती किसी प्रौढ़ा नायिकाकी सौन्दर्या-
तिशयताको इस पद द्वारा सूचित किया गया है। सखियोंके
बीचमें प्रियतमका चुम्बन करना अनुचित है, इसलिए
कार्यान्तर बोधनका बहाना बनाकर उसने श्रीकृष्णके कपोलप्रान्तको
चूम लिया-इस वाक्यांशके द्वारा नायिकाके शृङ्गार वैदग्ध्यको
सूचित किया गया है, यहाँ श्रीकृष्ण अनुकूल नायक हैं ॥४॥
केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमूं यमुनावनकुले।
मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले-
[हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥५॥]
अन्वय-सखि, काचित् (गोपललना) यमुनाकूले (यमुनातीरे)
मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं (मञ्जुलः मनोहरः यः वञ्जुलकुञ्जः
लतादिपिहितो वेतसकुञ्जः तत्र गतं) अमुं (हरिं) केलिकला-
कुतुकेन (केलिकलायां सुरतनैपुण्ये यत् कुतुकम् औत्सुक्यं
तेन हेतुना) करेण (हस्तेन) दुकूले (पीताम्बरे) विचकर्ष
(आकृष्टवती) ॥५॥
अनुवाद-सखि ! देखो, यमुना पुलिनपर मनोहर वेतसी
(वञ्जुल या बेंत) कुञ्जमें किसी गोपीने एकान्त पाकर
काम रस वशवर्त्तिनी हो क्रीड़ाकला कौतूहलसे उनके
वस्त्रयुगलको अपने हाथोंसे पकड़कर खींच लिया।
पद्यानुवाद-
केलि कलाकुल कोई गोपी, यमुना जलके तीरे।
ले जाने हरि, वसन खींचती, वञ्जुल वनमें धीरे ॥
बालबोधिनी-सखी किसी अधीरा नायिकाका वर्णन
करते हुए श्रीराधासे कहती है, श्रीकृष्ण जब मनोहर वेतसी
लताकुञ्जमें गये हुए थे, तब वह अधीरा नायिका श्रीकृष्णका
वस्त्र पकड़कर उन्हें यमुना किनारे ले गयी; क्योंकि वह
रहकेलि कलाकौतूहलसे आविष्ट हो गई थी। 'च' कारसे
तात्पर्य है कि उसने विजन स्थान देखकर श्रीकृष्णके साथ
अनेक प्रकारसे परिहास किया।