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गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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॥ श्रीः ॥

काशी संस्कृत ग्रन्थमाला

१७२

॥ श्रीः ॥

गौतमधर्मसूत्राणि

हिन्दीव्याख्याविभूषित-

हरदत्तकृत-मिताक्षरावृत्ति-सहितानि

हिन्दी व्याख्याकार
डॉ० उमेशचन्द्र पाण्डेय
एम० ए०, पी-एच० डी०, साहित्यरत्न,

चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
१९६६

प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणसी-१
संस्करण : प्रथम, संवत् २०२३
मूल्य : १०-००


© The Chowkhamba Sanskrit Series Office.
P. O. Chowkhamba, Post Box 8,
Varanasi. ( INDIA )
1966
Phone : 3145

THE

KASHI SANSKRIT SERIES

172
****

THE

GAUTAMA-DHARMA-SŪTRA

With the
‘Mitākṣarā’ Sanskrit Commentary of Haradatta

Edited with
The Hindi Commentary and Introduction

by
Dr. UMESH CHANDRA PANDEY,
M. A., Ph. D., Sāhityaratna,

THE

CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE

Post Box 8. Varanasi-1 ( India ) Phone : 3145

First Edition
1966
Price : 10-00


45320
22-2-1967
Sa2VS3/ Gan Pan

दो शब्द

भारतीय साहित्य से परिचित सुधी पाठकों को 'गौतम-धर्म-सूत्र' का परिचय देने की आवश्यकता नहीं। धर्मग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। आज के युग में भारतीय धर्म के शाश्वत मूल्यों की स्थापना के बिना समाज को सही दिशा कठिनाई से मिल सकती है। आवश्यकता है अपने अतीत की सभी अच्छाइयों को ग्रहण कर वर्तमान जीवन में पिरोने की, और इसके लिए हमें उस अतीत को सही रूप में पहचानना होगा।

'गौतम-धर्म-सूत्र' का यह संस्करण उस अमूल्य निधि के एक अंश को आधुनिक पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास है। केवल सूत्रों में ही हिन्दी व्याख्या दी गयी है और इस बात का प्रयत्न किया गया है कि सूत्र का पूरा अर्थ सरलता से, स्पष्ट हो जाय। भूमिका में सूत्र साहित्य, भारतीय धर्म और इस ग्रन्थ की विषयवस्तु के कुछ पक्षों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार किया गया है।

मैं इस बात का दावा नहीं करता कि मेरा योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है। बहुधा लेखक कतिपय सीमाओं में बद्ध होता है। इस ग्रन्थ को वर्तमान कलेवर प्रदान करने का श्रेय चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ आफिस के सुयोग्य प्रबन्धकों को है, जो संस्कृत एवं संस्कृति की सेवा और प्रतिष्ठापना में चिरकाल से अहर्निश संलग्न हैं। मैंने उन्हीं की प्रेरणा से इस पुस्तक के वर्तमान संस्करण द्वारा भारतीय वाङ्मय की जो तुच्छ सेवा की है उससे मुझे संकोच है, किन्तु सन्तोष भी है।

अपनी ओर से दो शब्द कहते हुए मैं अपने कतिपय प्रियजनों का, जो मेरे जीवन के मधुर प्रेरणा-स्रोत हैं, प्रेम और कृतज्ञता से स्मरण करता हूँ। मेरा श्रम निष्फल नहीं होगा, यही मेरी आशा है।

'विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव॥'

विनीत-
उमेशचन्द्र पाण्डेय


२ गौ० भू०

उपरोक्त पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ उपलब्ध नहीं है (पृष्ठ रिक्त अथवा अत्यधिक धुंधला/अस्पष्ट है)।

भूमिका

सूत्र साहित्य

सूत्र साहित्य भारतीय वाङ्मय का एक अनूठा वर्ग है और इसकी विशेषता है इसकी अनोखी शैली। वैदिक साहित्य में सूत्रों का काल अध्ययन और चिन्तन की एक परम्परा का प्रतिनिधि है और भारतीय साहित्य में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह वैदिक साहित्य को परवर्ती संस्कृत साहित्य से जोड़ने वाली श्रृंखला है। जैसा कि माक्स म्यूल्लेर ने कहा है इन सूत्रों की शैली का परिचय उसी व्यक्ति को मिल सकता है जिसने इन्हें समझने का प्रयत्न किया है और इनका शाब्दिक अनुवाद तो संभव हो ही नहीं सकता। सूत्र का अर्थ है धागा और सूत्रों में छोटे, चुस्त, अर्थगर्भित वाक्यों को मानों एक धागे में पिरोकर रखा जाता है। संक्षिप्तता इनकी विशेषता है। पश्चिमी विद्वानों ने इन सूत्रों की शैली पर बहुत आलोचनात्मक ढंग से विचार किया है। प्रो० माक्स म्यूल्लेर ने प्राचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास नामक ग्रंथ में सूत्र साहित्य के सन्दर्भ में कहा है :—

“Every doctrine thus propounded, whether Grammar, metre, law, or philosophy, is reduced to a mere skeleton. All the important points and joints of a system are laid open with the greatest precision and clearness, but there is nothing in these works like connection or development of ideas.” ( Page 37 )

कोलेब्रूक ने भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया है :

“Every apparent simplicity of the design vanishes in the perplexity of the structure. The endless pursuit of exceptions and limitations so disjoins the general precepts, that the reader cannot keep in view their intended connection and mutual relation. He wonders in an intricate maze, and the clue to the labyrinth is continually slipping from his hands.”

सूत्र रचनाओं में अनेक शताब्दियों के ज्ञान का भण्डार एकत्र किया गया है। वे शताब्दियों के चिन्तन, मनन और अध्ययन के परिणाम हैं और उन्हें जो रूप प्राप्त हुआ है वह भी अनेक शताब्दियों की अनवरत परम्परा का परिणाम है। धर्मसूत्रों को श्रुति के अन्तर्गत नहीं माना जाता है, जैसा कि इसके पूर्ववर्ती साहित्य-संहिता और ब्राह्मण को, और इस प्रकार इसे अपौरुषेय न मानकर पौरुषेय माना जाता है। यदि ब्राह्मणों और परवर्ती काल के मन्त्रों के साथ तुलना करें तो हमें सूत्रों में ऐसी कोई बात नहीं मिलती जिसके कारण उन्हें श्रुति में सम्मिलित न किया

( ४ )

जाय। हाँ, इसका एक ठोस कारण हो सकता है उनकी बाद के समय की रचना। इनके मनुष्यों द्वारा लिखित होने का स्पष्ट ज्ञान है, यथा :

यथैव हि कल्पसूत्रग्रंथानितरांगस्मृतिनिबंधनानि चाध्येतृभ्यश्चापयितारः स्मरन्ति तथाश्वलायनबौधायनापस्तंबकात्यायनप्रभृतीन् ग्रंथकारत्वेन।

श्रुति के विपरीत स्मृति में न केवल सूत्र रचनाएं आती हैं अपितु मनु, याज्ञवल्क्य, पाराशर आदि के श्लोक में निबन्ध ग्रंथ भी आते हैं, जिन्हें स्पष्टतः स्मृति कहा जाता है।

स्मृति का आधार भी श्रुति ही है। श्रुति से स्वतन्त्र रूप में स्मृति की प्रामाणिकता नहीं होती। जैसाकि कुमारिल ने कहा है इसके नाम से ही यह तथ्य स्पष्ट है :

पूर्वविज्ञानविषयज्ञानं स्मृतिरिहोच्यते ।
पूर्वज्ञानाद्विना तस्याः प्रामाण्यं नावधार्यते ॥

इस प्रकार सूत्रों के दो विस्तृत वर्ग किये जाते हैं : श्रौतसूत्र और स्मार्तसूत्र। इनमें श्रौतसूत्र तो वे हैं जिनके स्रोत श्रुति में मिलते हैं और स्मार्त वे हैं जिनका कोई इस प्रकार का स्रोत नहीं है। यह स्मरणीय है कि जिन विषयों का विवेचन सूत्रों—श्रौत, गृह्य, और समयाचारिक—में किया गया है, उन्हीं का प्रतिपादन श्लोकबद्ध स्मृतियों में भी किया गया है। जैसा कि आगे बताया जायगा इनका अन्तर विषयवस्तु का नहीं अपितु उनके काल और उनकी शैली का है।

वैदिक-साहित्य में सूत्र-साहित्य को वेदांग के अन्तर्गत कल्प शीर्षक में रखा जाता है। चरणव्यूह के अनुसार—“शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषम्” ये वेदांग हैं। आपस्तम्ब ने भी इन्हें इस क्रम में गिनाया है—२, ४, ८ “षडंगो वेदः कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं शिक्षा”। कल्प सबसे पूर्ण वेदांग है, इसके अन्तर्गत सूत्रों का विशाल भण्डार समाहित है। ये सूत्र यज्ञ के नियमों के विषय में हैं। इनके महत्त्व के विषय में माक्स म्यूलेर ने ठीक ही कहा है—कल्पसूत्रों का वैदिक-साहित्य के इतिहास में अनेक कारणों से महत्त्व है। वे न केवल साहित्य के एक नये युग के द्योतक हैं और भारत के साहित्यिक एवं धार्मिक जीवन के एक नये प्रयोजन के सूचक हैं अपितु उन्होंने अनेक ब्राह्मणों के लोप में योग दिया, जिनका केवल नाम ही ज्ञात है। यज्ञ का सम्पादन केवल वेद द्वारा, केवल कल्पसूत्र द्वारा हो सकता था, किन्तु विना सूत्रों की सहायता के ब्राह्मण या वेद के याज्ञिक विधान का ज्ञान प्राप्त करना कठिन ही नहीं असम्भव था। कुमारिल ने कल्पसूत्र के महत्त्व के विषय में कहा है—

वेदादृतेऽपि कुर्वन्ति कल्पैः कर्माणि याज्ञिकाः ।
न तु कल्पैर्विना केचिन्मंत्रब्राह्मणमात्रकात् ॥

कल्पसूत्रों के महत्त्व के कारण ही इनके रचयिता स्वयं नयी शाखाओं के संस्थापक बन गये और उनकी शाखा में उनके सूत्र का ही प्रधान स्थान हो गया तथा ब्राह्मण और वेद का कुछ सीमा तक महत्त्व कम हो गया। सूत्र यद्यपि

( ५ )

स्मृति थे, श्रुति नहीं तथापि उन्हें स्वाध्याय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया। विभिन्न चरणों एवं शाखाओं में सूत्र साहित्य के विकास के संबन्ध में यह उल्लेखनीय है कि कभी-कभी कल्पसूत्र शाखाओं के अन्तर्गत भिन्न होते हैं और कभी भिन्न नहीं होते। शाखाओं के भेद का एक कारण उनके स्वाध्याय के भेद हैं और कुछ कारण सूत्र की भिन्नता भी है। अतः कई स्थानों पर जहाँ शाखा का भेद है वहाँ सूत्र का भी भेद है। यही बात महादेव ने हिरण्यकेशिसूत्र की टीका में कही है :—

"तत्र कल्पसूत्रं प्रतिशाखं भिन्नमभिन्नमपि क्वचित् शाखाभेदेऽध्ययनभेदाद्वा सूत्रभेदाद्वा। आश्वलायनीयं कात्यायनीयं च सूत्रं हि भिन्नाध्ययनयोर्द्वयोर्द्वयोः शाखयोरेकैकमेव। तैत्तिरीयके च समाम्नाये समानाध्ययने नाना सूत्राणि। अनेन च सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे च सूत्रभेद इति परस्पराश्रय इति वाच्यम् ॥"

इसी आचार्य ने अर्वाचीन कहे जाने वाले सूत्रों की प्राचीनता के विषय में भी एक नवीन बात कही है कि वे सूत्र भी जिनके रचयिता अर्वाचीन मालूम पड़ते हैं वस्तुतः शाश्वत हैं और प्राचीन ऋषियों से निःसृत हैं।

"न हि सूत्राणां कर्तृसंबंधिसंज्ञाघटनी किन्तु नानाकल्पगतासु तत्तन्नामक-र्षिव्यक्तिषु नित्या तन्प्रणीतसूत्रेषु च नित्यां जातिमवलम्ब्य तिष्ठति यथा पुरुषना-मांकितशाखासु संज्ञा ।"

कल्पसूत्र मुख्यतः चार प्रकार के हैं :—
१. श्रौतसूत्र—श्रौत अग्नि से होने वाले बड़े यज्ञों का विवेचन करने वाले सूत्र।
२. गृह्यसूत्र—गृह्याग्नि में होने वाले घरेलू यज्ञ का तथा उपनयन, विवाह आदि संस्कारों का विवेचन करने वाले सूत्र।
३. धर्मसूत्र—चारों आश्रमों, चारों वर्णों तथा उनके धार्मिक आचारों का तथा राजा के कर्त्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र।
४. शुल्वसूत्र—यज्ञ में वेदि आदि के निर्माण की विधि का वर्णन करने वाले सूत्र।

धर्मसूत्र

वैदिक साहित्य के एक महत्वपूर्ण अंग हैं—धर्मसूत्र। सामान्यतः वैदिक साहित्य के अन्य ग्रन्थों के समान धर्मसूत्र भी प्रत्येक शाखा में अलग-अलग होते हैं किन्तु अनेक शाखाओं के विशिष्ट धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं हैं। धर्मसूत्र कल्प की परम्परा में आते हैं और कल्प का अर्थ है "वेद में विहित कर्मों का क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र"। "कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्"—विष्णुमित्र, ऋग्वेदप्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति, पृ० १२। इस प्रकार धर्मसूत्रों का अटूट संबन्ध यज्ञ-यागादि बड़े कर्मों, विवाह इत्यादि गृह्य कर्मों का प्रतिपादन करने वाले साहित्य के साथ है और इस कल्प साहित्य के