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सर्वकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 360 में से

संदर्भ में पढ़ें
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है। धर्मशास्त्रों के पूर्व उपनिषदों में यह बात स्पष्ट की गई है कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए वैराग्य या निर्वेद धारण करना चाहिये। बृहदारण्यक ५।१ और मुण्डक० १।२।१२ इस प्रकार ये आश्रम स्वाभाविक रूप में थे इसमें सन्देह नहीं। इन्हें व्यवस्थित रूप धर्मशास्त्रकारों ने दिया और प्रत्येक आश्रम के दैनिक कर्मों का विस्तार से गिनाया। सारे समाज के लिए वर्णाश्रमधर्म के नाम से संविधान तैयार किया।

सभी आश्रमों में गृहस्थाश्रम को स्वाभाविक रूप में अधिक महत्त्व प्राप्त है। यह आश्रम वास्तविक लौकिक कर्म और श्रम का जीवन है और अन्य आश्रम इसी पर आश्रित होते हैं। ब्रह्मचर्य इसी जीवन की विशेष तैयारी है जिसमें ज्ञान के साथ संयम और आचार की शिक्षा दी जाती है। ब्रह्मचर्य अनुशासन और ज्ञानार्जन का जीवन है। गृहस्थाश्रम की उपक्रमणिका है। गौतमधर्मसूत्र में १. ३. १ और १. ३. ३५ में इस आश्रम की प्रधानता को स्वीकारा गया है। किन्तु साथ ही साथ यह भी कहा गया है कि जीवन की शिक्षा पाकर ब्रह्मचारी कोई भी आश्रम ग्रहण कर सकता है। ब्रह्मचर्य जीवन से वास्तविक आचार और धर्म का जीवन प्रारम्भ होता है। उसके पूर्व के जीवन में कोई आचार का नियम नहीं है और छूट है। ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थजीवन स्वीकारने का कारण यह है कि यह आश्रम ही सन्तानउत्पत्ति का आश्रम है और सन्तान का महत्त्व धर्मसूत्र में सर्वोपरि है। इस कारण गृहस्थाश्रम का वरण करना धर्म की दृष्टि से आवश्यक है किन्तु ब्रह्मचारी इस आश्रम का त्याग कर नैष्ठिक ब्रह्मचारी का जीवन भी व्यतीत कर सकता और सारा जीवन ज्ञानार्जन तथा तत्त्वचिन्तन में लगा सकता है। ब्रह्मचारी को भोग-विलास की वस्तुओं की और बाह्य अलंकरणों से दूर रहने का आदेश है, यहां तक कि स्वच्छता के नियमों में भी अनेक को वर्जित किया गया है। संभवतः इस कारण कि इस जीवन का मुख्य लक्ष्य है भोगविलास और भौतिक आनन्द की कल्पना न करना, केवल विद्यार्जन में ही तल्लीन रहना। मन को अपने लक्ष्य में लगाने के लिये मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि जीवन के प्रत्येक कार्य से बनती है। इन्हीं भोगविलास और सुखदायी उपकरणों को, वस्त्रादि के अलंकरण को गृहस्थ के लिए विहित किया गया है, क्योंकि वहां यह आवश्यक मनोवैज्ञानिक वातावरण प्रस्तुत करने में सहायक है। इस प्रकार के ब्रह्मचारी को समाज में सम्मान का स्थान मिला है और वैसे ब्रह्मचारी की राजा प्रत्येक तरह से रक्षा करता है। उसकी सहायता और भरणपोषण समाज के सभी अंग करते हैं।

ऊपर कहा जा चुका है कि गौतमधर्मसूत्र में गृहस्थाश्रम को अन्य आश्रमों से अधिक महत्त्व दिया गया है। यह स्पष्टतः कहा गया है कि “ऐक्याश्रम्यं त्वाचार्याः। प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्यैव”। १. ३. ३५.। प्रायः सभी संस्कार इसी आश्रम में सम्पादित होते हैं और यही आश्रम मानवजाति के विकास के लिए उसकी प्रजनन की प्रवृत्ति को सन्तुलित और संयमित करने का आश्रम है। गृहस्थ का धर्म है : “देवपितृमनुष्यर्षिपूजकः” हो अर्थात् सभी उस पर आश्रित होते हैं। गृहस्थाश्रम समाज की पहली इकाई है और समाज का सही निर्माण इसी जीवन में