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सर्वकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 360 में से

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पृष्ठ 36

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भौतिक सुखों का त्यागकर अक्षय शान्ति की खोज में निकल पड़े । एक पीढ़ी ने अपना एक कार्य पूरा किया, उसके आनन्दों और फलों का भोग किया और वह आगे बढ़ गयी । उसने दूसरी पीढ़ी को स्थान दिया । इस विभाजन और व्यवस्था से न तो कहीं असन्तोष उत्पन्न हुआ, न तो उनमें कोई संघर्ष हुआ। इस व्यवस्था के अभाव ने वर्तमान समाज में कितनी बुराइयाँ उत्पन्न की हैं सर्वविदित है । जीवन के अन्त तक पद का लोभ और उस पद को बनाये रखने के लिए होनहार लोगों का दमन एवं शोषण पुराने लोगों का एक खास हथकंडा बन गया है । ऐसे लोग जितने पुराने हैं, इस चाल में उतने ही कुशल हैं और वे उतने ही दीर्घकालतक पद के साथ-चिपटे रहने में सफल होते हैं। अधिकार और पद के लोभी बुजुर्ग एक लंगड़ी और असन्तुष्ट पीढ़ी का निर्माण करेंगे, जिसे योग्यता के विकास का अवसर नहीं मिल पायगा और जो उन पुराने ठेकेदारों के हाथ में खिलौना होगी, जिस पर वे मनमानी कर सकते हैं, प्रलोभन देकर अपना अधिक से अधिक काम निकाल सकते हैं। धर्मशास्त्रों की मौलिक आश्रमव्यवस्था में इन बुराइयों के लिए जगह नहीं थी । आश्रमव्यवस्था के पीछे जो उदात्त भावना है वह सार्वभौम है । भारतीय संस्कृति की यह विशेषता अद्वितीय है और धर्मशास्त्रकारों की दूरदर्शिता, व्यावहारिकता, बोध और चिन्तन की स्पष्टता का प्रमाण है ।

इस आश्रमव्यवस्था को धर्मसूत्रकारों ने स्पष्टतः गौरव प्रदान किया है। वर्णाश्रमधर्म से हीन व्यक्ति पतित होता है और ऐसे पतित के साथ बोलना भी निषिद्ध है । वर्णाश्रमधर्म से हीन व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नहीं है, वह किसी प्रकार का सम्मान प्राप्त करने का अधिकारी भी नहीं होता। १. ९. १७ । कर्मों के विभाजन का अनुशीलन न किया जाय तो आर्य और अनार्य में कोई भेद नहीं रह जाता । सभी वर्ण समान हो जाते हैं और सबके समान होने पर लोकव्यवस्था नहीं चल पाती, अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती है । “आर्याणार्ययोर्व्यतिषेषकर्मणः साम्यम्” । गौतमधर्मसूत्र २ १. ६९ । इस आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत विहित कर्म को करना कर्तव्य है और जो व्यक्ति उस आचरण का पालन नहीं करता वह राजा द्वारा दण्ड का भागी होता है। उसे किसी प्रकार की सम्पत्ति का अधिकार नहीं रह जाता और वह केवल जीवन चलाने योग्य भोजन ही राजा के यहाँ से प्राप्त करता है । “शिष्टाचारणे प्रतिषिद्धसेवायां च नित्यं चैल्पिण्डादूर्ध्वं स्वहरणम्” । २. ३. २४ ।

धर्मशास्त्रों में मनुष्यजीवन चार आश्रमों में विभक्त किया गया है—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। गौतमधर्मसूत्र में इन आश्रमों को इस क्रम में और इन नामों से गिनाया गया है—ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु, वैखानस । आश्रमों का इतिहास देखकर यह ज्ञात होता है कि आश्रम के विषय में धर्मशास्त्रकारों के विचार एक से नहीं हैं। इसे अलग-अलग नाम दिया गया है और इन आश्रमों का आपेक्षिक महत्त्व भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से किया गया है। उदाहरण के लिए कुछ आचार्यों ने एक ही आश्रम-गृहस्थाश्रम को वास्तविक बताया है। बौधायन की दृष्टि में भी अन्य सब आश्रम काल्पनिक हैं २. ६. १७ । हमारे धर्मसूत्रकार गौतम ने भी गृहस्थाश्रम को ही महत्त्व दिया है और उसे ही प्रथम स्थान दिया