गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणितसारसंग्रह ६३
षड्वर्गः ३६। पंचाशतवर्गः २५००। द्विशतवर्गः ४००००। सर्ववर्गसंयोगः ४२५३६। द्विशत-षट्पंचांषड्-
[ ०शद् ] घातः ११२००। पंचाशत्-षड्घातः ३००। तद्विगुणः २२४००।६००। तेन विमिश्रितः सर्व-
वर्गसंयोगः ६५५३६। तेषाम्—द्विप्रभृतिकल्पितस्थानानाम् । क्रमघातेन—द्विस्थानप्रभृतिराशीनाम्
अन्त्यस्थानं शेषस्थानैर्गुणयित्वा, पुनः शेषान्यस्थानं शेषस्थानैर्गुणयित्वा, तेन क्रमेण प्रथमस्थानपर्यन्त
गुणनक्षण क्रमघातः। तेन पुनः द्विस्थानप्रभृतीनां राशीनाम्, इत्यभिप्रायेण वर्गरचनां स्फुटयति ।
| ४ | द्विवर्ग ४ त्रिवर्ग ९ चतुर्वर्ग १६ तत्संयोगः २९ तेषां क्रमघातः द्विकत्रिकमिश्रेण चतुष्कं
| ३ | गुणयेत् २०। द्विकेन त्रिकं गुणयित्वा मिश्रितः सन् २६। द्विगुणो ५२। अनेन
| २ | मिश्रितेन वर्गः ८१।
श्लोक २-३१ अ कृत्वान्त्यकृतिम्-कृत्वा ७५ अन्त्यकृतिं ४९'५ अन्त्यं द्विगुणमुत्सार्य | ४३'५ / १४ | शेष
५ पदैर्हन्यात् | ४९'५ / ७० | शेषानुत्सार्य | ४९ X ५ / ७० | कृत्वा तस्यकृतिं | ४९२५ / ७० | लब्धः ५६२५ इति सर्वत्र
| ७ | X | ५ | कर्तव्यः द्वयंकानां वर्गकोष्ठः। पंचांकानां वर्गकोष्ठरचना
| ४ | ९ | ० | ५ |
| | ७ | २ | |
| ६ | X | ५ | X | ५ | X | ३ | X | ६ |
| ६ | ६ | ४ | ३ | २ | ० | ० | ६ | ६ | लब्धवर्गाः
| ६ | २ | ५ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ | | ४२९४९६७२९६॥ उ० १०
| | ५ | २ | ५ | ० | ३ | | | |
| | | | ३ | | | | | |
स अयमर्थः—अन्त्यराशिं वर्गे कृत्वा पुनरन्त्यराशिं द्विगुणं कृत्वा पुरो गमयित्वा शेषस्थानैर्गुणयेत् ।
शेषस्थानानि पुरो गमयित्वा पूर्वंकथितक्रिया कर्तव्या ।