गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २३१½-
ग्रासोनव्यासाभ्यां ग्रासे प्रक्षेपकाः प्रकर्तव्याः ।
वृत्ते च परस्परतः संपातशरौ विनिर्दिष्टौ ॥ २३१½ ॥
अत्रोद्देशकः
समवृत्तयोर्द्वयोर्हि द्वात्रिंशदशीतिहस्तविस्तृतयोः ।
ग्रासेऽष्टौ कौ बाणावन्योन्यभवौ समाचक्ष्व ॥ २३२½ ॥
इति पैशाचिकव्यवहारः समाप्तः ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ क्षेत्रगणितं नाम षष्ठव्यवहारः समाप्तः ।
प्रतिच्छेदित होने वाले वृत्तों के ऐसे दो व्यासों के दो मानों की सहायता से, जिन्हें वृत्तों के
अतिछादी ( overlapping ) भाग की सबसे अधिक चौड़ाई के मान द्वारा ह्रासित करते हैं
वृत्तों के अतिछादी भाग की महत्तम चौड़ाई के इस ज्ञात मान के संबंध में प्रक्षेपक क्रिया करना
चाहिये । ऐसे वृत्तों के संबंध में इस प्रकार प्राप्त दो परिणामों में से, प्रत्येक दूसरे का, अतिछादी वृत्तों
संबंधी दो बाणों का माप होता है ॥ २३१½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो वृत्तों के संबंध में, जिनके विस्तार-व्यास क्रमशः ३२ और ६० हस्त हैं । साधारण अतिछादी
भाग की महत्तम चौड़ाई ८ हस्त है । यहाँ उन दो वृत्तों के संबंध में बाण रेखाओं के मानों को
बतलाओ ॥ २३२½ ॥
इस प्रकार, क्षेत्र गणित व्यवहार में पैशाचिक व्यवहार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सार संग्रह नामक गणित शास्त्र में क्षेत्रगणित नामक षष्ठम्
व्यवहार समाप्त हुआ ।
( २३१½ ) इस नियम में अनुध्यानित प्रश्न आर्यभट्ट द्वारा भी साधित किया गया है । उनके
द्वारा दिया गया नियम इस नियम के समान है ।