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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

( ११४ ) गणेशगीता अ० ११.
अज्ञानात्क्रियमाणं यत्कर्म तामसमीरितम् ॥
कर्तारं त्रिविधं विद्धि कथ्यमानं मया नृप ।१७॥
तथा जो अज्ञानसे कर्म किया जाता है वह तामसी कहाता
है, इसी प्रकार हे राजन् ! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं ॥१७॥
धैर्योत्साही समोऽसिद्धौसिद्धौ चाविक्रियस्तुयः।
अहंकरविमुक्तो यः स कर्ता सात्त्विको नृप १८।
हे राजन् ! धैर्य उत्साह युक्त सिद्धि असिद्धिमें समान दृष्टि-
वाले, विकार और अहंकार रहित सात्त्विकी कर्ता कहाते हैं १८
कुर्वन्हर्षं च शोकं च हिंसां फलस्पृहां च यः ॥
अशुचिर्लुब्धको यश्च राजसोऽसौ निगद्यते १९॥
जो हर्ष शोक सहित कर्म करते, हिंसा और फलमें इच्छा
रखते हैं, जिनमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता
कहे जाते हैं ॥ १९ ॥
प्रमादाज्ञानसहितः परोच्छेदपरः शठः ॥
अलसस्तर्कवान्यस्तु कर्ताऽसौताम सो मतः २०
प्रमाद और अज्ञान सहित दूसरोंके नाश करनेहारे मूर्ख
आलसी और जो तर्क करनेवाले हैं वे तामसी कर्ता हैं॥२०॥