दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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मोह-महिमा
सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत ।
तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत ॥२५९॥
भावार्थ—वही सेमलका पेड़ है और वही तोते हैं (बार-बार
अनुभव कर चुके हैं कि इसके फलमें गूदा नहीं होता), तो भी मोह-
वश वसन्त ऋतु आनेपर सदा उसीपर मँडराये रहते हैं। (चोंच
मारते हैं, रुई उड़ जाती है, हाथ कुछ भी नहीं आता।) तुलसी-
दासजी कहते हैं कि इस बातको सुनकर संतलोग भी मोहकी
महिमाकी सराहना करते हैं ॥२५९॥
विषय-सुखकी हेयता
करत न समुझत झूठ गुन सुनत होत मति रंक ।
पारद प्रगट प्रपंचमय सिद्धिउ नाऊँ कलंक ॥२६०॥
भावार्थ—[बार-बार धोखा खानेपर भी] विषयी मनुष्य विषयोंके
लिये चेष्टा करते हुए यह नहीं समझते कि इनमें कहीं भी सुख नहीं
है; विषयोंके झूठे गुणोंको सुनते ही उनकी बुद्धिका दिवाला निकल
जाता है (उनका मन विषयोंके लिये ललचा उठता है)। यह
प्रपञ्चमय विषय-सुख प्रत्यक्ष पारेके समान है, जिसके सिद्ध होनेपर
भी उसका नाम 'कलङ्क' ही होता है ॥२६०॥
लोभकी प्रबलता
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार ।
केहि कै लोभ विडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥२६१॥
भावार्थ—ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, पण्डित और गुणोंका
धाम इस संसारमें ऐसा कौन मनुष्य है, जिसकी लोभने मिट्टी पलीद
न की हो? ॥२६१॥