दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकामनाओंके पूर्ण करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ! आप हमें अपनी
अविचल प्रेमा भक्ति दीजिये ॥ १२५ ॥
भजनकी महिमा
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥१२६॥
भावार्थ—जलके मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय तथा बालूके
पेरनेसे चाहे तेल निकल आवे; परंतु श्रीहरिके भजन बिना भवसागर-
से पार नहीं हुआ जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ॥ १२६ ॥
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।
भजिअ राम सब काम तजि अस बिचारि मन माहिं ॥१२७॥
भावार्थ—श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण
श्रीहरिके भजन बिना नहीं नष्ट होते । ऐसा मनमें विचारकर
सब कामनाओंको त्यागकर श्रीरामजीका भजन ही करना
चाहिये ॥ १२७ ॥
जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य ।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ॥१२८॥
भावार्थ—जो चेतनको जड़ कर देते हैं और जड़को चेतन, ऐसे
समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं वे धन्य हैं ॥ १२८ ॥
श्रीरघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥१२९॥
भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके प्रतापसे समुद्रमें पत्थर तर गये ।
अतएव वे लोग [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो ऐसे श्रीरामजीको
छोड़कर किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं ॥ १२९ ॥