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सर्वकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

२४ दोहावली
अभागे मनुष्यको भी परम भाग्यवान् बना देता है ॥ ३६ ॥
जल थल नभ गति अमित अति अग जग जीव अनेक ।
तुलसी तो से दीन कहँ राम नाम गति एक ॥३७॥
भावार्थ—जगत्में चर-अचर अनेक प्रकारके असंख्य जीव हैं
और चरोंमें कुछ ऐसे हैं जिनकी जलमें गति है; कुछकी पृथ्वीपर
गति है और कुछकी आकाशमें गति है; परंतु हे तुलसीदास !
तुझ-सरीखे दीनके लिये तो रामनाम ही एकमात्र गति है ॥ ३७ ॥
राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास ।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल माँगत तुलसीदास ॥३८॥
भावार्थ—तुलसीदासजी यही माँगते हैं कि मेरा एकमात्र रामपर
ही भरोसा रहे, रामहीका बल रहे और जिसके स्मरणमात्रहीसे
शुभ, मङ्गल और कुशलकी प्राप्ति होती है, उस रामनाममें ही विश्वास
रहे ॥ ३८ ॥
राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास ।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास ॥३९॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिसका रामनाममें प्रेम है,
राम ही जिसकी एकमात्र गति है और रामनाममें ही जिसका
विश्वास है, उसके लिये रामनामका स्मरण करनेसे ही दोनों ओर
(इस लोकमें और परलोकमें) शुभ, मङ्गल और कुशल है ॥ ३९ ॥
रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ है
रसना साँपिनि बदन बिल जे न जपहिं हरिनामु ।
तुलसी प्रेम न राम सों ताहि बिधाता बाम ॥४०॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो श्रीहरिका नाम नहीं