दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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मनुष्योंको [ उसी मुखसे खाने और उसीसे मलत्याग करनेवाले ]
चमगादड़ समझकर उनके कहनेसे अपने मनमें हर्ष-विषाद नहीं
करना चाहिये ॥ ३८७ ॥
डाह करनेवालोंका कभी कल्याण नहीं होता
पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे जड़ बिनु आगि।
तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि ॥ ३८८ ॥
भावार्थ—दूसरेकी सुख-सम्पत्तिको देख-सुनकर जो मूर्ख मनुष्य
बिना ही आगके जलने लगते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि उनके
भाग्यसे भलाई भागकर चली जाती है (उनका कभी भला नहीं
होता) ॥ ३८८ ॥
दूसरोंकी निन्दा करनेवालोंका मुँह काला होता है
तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागिहैं मिटिहि न मरिहैं धोइ ॥ ३८९ ॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो दूसरेकी कीर्तिको मिटा-
कर अपनी कीर्ति चाहते हैं, उनके मुखपर ऐसी कालिख लगेगी, जो
चाहे वे उसे धो-धोकर मर जायँ, कभी नहीं छूटेगी ॥ ३८९ ॥
मिथ्या अभिमानका दुष्परिणाम
तनु गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान।
तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान ॥ ३९० ॥
भावार्थ—सुन्दर शरीर, सद्गुण, पर्याप्त धन, बड़ाई और धर्ममें
निष्ठा—इनके न होनेपर भी जिसको मिथ्या अभिमान है—तुलसी-
दासजी कहते हैं—उसका जीवन विडम्बनामात्र है (जीवनकालमें
उसकी बदनामी ही होती है) और उसका परिणाम भी गया-बीता