ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 978, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं किया। इसने इंद्रकी अमरावती भी लूटी थी। नरकासुरके वधके लिये इंद्रने कृष्णसे प्रार्थना
की थी। इंद्रको साथ लेकर ही कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर गया। प्रथम इन्होंने गरुड पर बैठ कर
प्राग्ज्योतिषपुरका अवलोकन किया तब कृष्णने युद्धार्थ शंखनाद किया। शंखध्वनि सुनकर
नरकासुर संतप्त हुवा। वह अपने विशाल भव्य रथमें बैठकर युद्धके लिये आ गया। कई घोडे इनका
रथ खींचते थे। इसके साथ कृष्णका बडा ही घमासान युद्ध हुआ। अंतमें कृष्णने अपने सुदर्शनसे
इसका शिरच्छेद किया। नरकासुरकी माताने तब इसके कवच कुंडल और राज्य कृष्णार्पण किया।
इस युद्धसे कृष्णको अपार संपत्ति मिली। कृष्णने नरकासुरका पुत्र भगदत्तको सिंहासन पर
बिठाकर उसे प्राग्ज्योतिष्यपुरका राजा बनाया।
जैसे शिशुपाल कृष्णकी बुआका लड़का था वैसे पांडव भी कृष्णकी बुआके लडके। द्रौपदी
स्वयंवरमें सर्व प्रथम कृष्ण और पांडवोंकी भेंट हुई। तब कृष्णने वस्त्राभरण भूषणोंसे पांडवोंका
सत्कार किया था और पांडवोंने भी अत्यंत प्रेमसे उसका स्वीकार किया था। तबसे लेकर
पांडवोंसे कृष्णका संबंध बढ़ता गया। विशेषतः राजसूय-यज्ञमें युधिष्ठिरके बुलाते ही कृष्णका आना इस
संबंधका मधुर प्रारंभ है। इसके बाद जरासंघ वध, राजसूय-यज्ञमें कृष्णकी अग्र-पूजा, खांडववन
दहन आदिसे वह बढ़ने लगा। पांडव-वनवासमें कृष्ण कई बार उनसे मिलने गये। कभी कभी
सपत्नीक भी गये। अभिमन्युके विवाहमें जो राजा महाराजा आये थे उनसे कृष्णनेही पांडवोंके
वास्तविक अधिकारकी बात कही थी। कृष्णने ही सामोपचारसे सब मिटानेके लिये धृतराष्ट्रसे शिष्टाई
की। किंतु इसका कुछ भी उपयोग नहीं हुवा। कृष्ण शिष्टाईसे प्रथम जब दुर्योधन और अर्जुन
युद्धमें कृष्णकी सहायता मांगने आये तब कृष्णने दुर्योधनको अपनी तीन अक्षौहिणी नारायणी
सेना दी ओर स्वयं पांडवोंकी ओर गये। भारतीय युद्धमें कृष्णने ही धृष्टद्युम्न और सात्यकीकी
सहायतासे पांडवोंके मूल शिबिरकी स्थापना की थी। भारत-युद्धके प्रारंभमें ही दोनों ओर युद्धके
लिये खडे स्वजनोंको देख कर सं-भ्रममें पडे अर्जुनको अत्यंत मार्मिक उपदेश दे कर उसे युद्ध
सन्नद्ध किया। इसीको आज भगद्गीता कहते हैं। महाभारत के युद्धमें अर्जुनका सारथ्य करके
घोडोंकी भी सेवा की। युद्धमें भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा की। द्रोणवध के लिये कृष्णने
ही युधिष्ठिरको असत्य बोलनेकी प्रेरणा दी। जयद्रथ वधमें इसीने अर्जुन की सहायता की। कर्णके
सर्प मुख बाणसे कृष्णने ही अर्जुनकी रक्षा की। कृष्णने ही शल्यवधके लिये युधिष्ठिरको उकसाया।
भीमको दुर्योधनके जांघपर गदा मारनेको कृष्णने ही कहा। भारत-युद्धका सूक्ष्म अवलोकन किया
जाय तो वहां कृष्णकी मंत्रणा-शक्तिका सुंदर परिचय मिलता है।
इस प्रकार कुरुकुलके महायुद्धमें पांडवोंको विजय दिलाकर कृष्ण द्वारका गये। कृष्णने केवल
अर्जुनको ही गीतोपदेश दिया ऐसा नहीं, पुत्रोंकी मृत्युसे दुःखतप्त गांधारी, धृतराष्ट्र आदिका
सांत्वन कृष्णने ही किया। अभिमन्युकी मृत्युके बाद सुभद्राका सांत्वन भी कृष्णने ही किया था।
धर्मराजके अश्वमेध यज्ञमें भी कृष्ण आया था। किंतु ऐसा लगता है कि महाभारत युद्धके बाद
कृष्ण राजनीतिसे अधिक धर्मनीतीकी ओर झुके। अंतमें राज-सत्तासे मत्त यादव जब आपसमें ही
लड पडे तब प्रद्युम्नके वधका दृश्य देख कर कृष्ण इतने क्रोधाविष्ट हो गये कि बचे हुए सभी
यादवोंको कृष्णने खतम कर दिया। कृष्णका यह प्रचंड क्रोध देखकर दारुक-कृष्णका सारथी और
अक्रूरने कृष्णको प्रणाम करके कहा “ भगवन् ! आपने सभी यादवोंका संहार कर दिया अब
बकरासको ढूंढें कर्यों ? ! ” तब कृष्ण शांत हुए।
ज्ञानेश्वरी ३५