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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 968, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 968

करके दुर्योधनको पांडवोंसे सख्य करनेको कहा। इसका कोई उपयोग नहीं हुआ। कौरव पांडव युद्ध
अनिवार्य हुआ। भीष्मको तब कौरव-सेनाका सेनापति बनना पडा। सेनापतिका पद स्वीकार करते
समय भीष्माचार्यने कहा था "मैं पांडवसेनाका नाश करूंगा किंतु पांडवोंमेंसे किसीका वध नहीं
करूंगा ! जब मैं सेनापति रहूंगा तब कर्ण युद्धभूमि पर नहीं लडेगा !!" इतने शर्तके साथ
भीष्माचार्यने सेनापति पद स्वीकार किया; उसके प्रथम भीष्माचार्यने दुर्योधनको अपनी शक्ति,
अशक्ति तथा युद्धनीतिका संपूर्ण परिचय दिया था। इस समय उन्होंने कहा था "एक महीनेमें
मैं शत्रुसेनाको छिन्न विछिन्न कर दूंगा !"
अठारह दिनके युद्धमें दस दिन तक वे ही लडते रहे। उसके बादके आठ दिनोंमें तीन
सेनापति बने । कृष्णने प्रतिज्ञा की थी "युद्धमें मैं हथियार नहीं उठाऊंगा।" भीष्माचार्यने तब
कहा "मैं कृष्णको हथियार उठानेमें बाध्य करूंगा !" युद्धके तीसरे ही दिन भीष्माचार्यने
कृष्णको हथियार उठानेमें बाध्य किया ! भीष्माचार्यने अर्जुनको हतबल करके मूच्छित किया । यह
देख कर क्रुद्ध कृष्ण रथ-चक्र उठाकर जब भीष्माचार्य पर चढ दौडे तब भीष्माचार्य अपने हाथके
शस्त्र नीचे रख कर "प्रत्यक्ष परमात्मा ही मेरा वध करेगा !" कहकर हाथ जोड कर स्तवन
करने लगे। इसी प्रकार नौवे दिन भी हुआ !!
नौवे दिन दुर्योधनके कटु-वाक्योंसे तंग आकर भीष्माचार्यने कहा "कलके युद्धमें मैं या
पांडव दोनोंमेंसे एक रहेंगे !" "मैं निष्पांडव पृथ्वी करूंगा !" यह प्रतिज्ञा सुनकर पांडव घबरा
उठे; वे कृष्णको साथ लेकर भीष्माचार्यके वधका उपाय पूछनेके लिये भीष्माचार्यके पास गये ।
युधिष्ठिरने भीष्मकी प्रतिज्ञाका स्मरण दिलाकर उनके वधका उपाय पूछा । भीष्माचार्यने भी
अत्यंत प्रेमसे पांडवोंका अदरातिथ्य करके कहा "मैं उससे नहीं लडूंगा जिसका रथ-कलश रथ-ध्वज
अमंगल होगा, मैं किसी हीन व्यक्तिसे नहीं लडूंगा, अथवा मैं स्त्रीसे नहीं लडूंगा। तुम्हारी सेनामें
द्रुपद्-पुत्र जो शिखंडी है, वह जन्मतः स्त्री था, आगे चलकर पुरुष बना ! इसलिये शिखंडीका ढालसा
उपयोग करके अर्जुन मुझे मार सकता है ! तब मैं असहाय बनूंगा। तुम मेरा वध करके विजयी
बनोगे !" दूसरे दिन, अर्थात् युद्धके दसवे दिन अर्जुनने शिखंडीको आगे रख कर भीष्मसे लडना
प्रारंभ किया । भीष्माचार्यका शरीर बाणोंसे छिदसा गया। यह मार्गशीर्ष वद्य सप्तमीका दिन
था । उस दिन फाल्गुनी नक्षत्र था । संध्याका समय था, अर्जुनके बाणोंसे भिदकर भीष्माचार्यका
शरीर रथसे बाहर जा पड़ा ! वह रथके नीचे शर शैया पर पडा। उनका सिर लटकने लगा ।
सिरके पास तीन बाण मार करके अर्जुनने सिर उन बाणों पर टिका दिया। तब भीष्मने कहा मुझे बडी
प्यास लगी है और अर्जुनने अपने बाणसे पृथ्वी भेद कर गंगा प्रवाह उनके मुखमें पडे ऐसा किया ।
भीष्माचार्य इससे अत्यंत संतुष्ट हुए । उन्होंने कहा "भीष्म-वधसे कौरव पांडवोंका वैर शांत हो !"
किंतु दुर्योधन नहीं माना । उसके बाद, वहां दूसरा कोई नहीं था तब कर्ण भीष्माचार्यका दर्शन
करने आया । तब दोनों मुक्त हृदयसे मिले। भीष्माचार्यने कर्णसे कहा "कौरव-पांडवोंका सख्य
हो ऐसा कर ! अथवा पांडवोंकी ओरसे लड़ !!" किंतु उसका अस्वीकार करके कर्णने लड़नेकी
आज्ञा मांगी ! भीष्मने कर्णको वैसी आज्ञा दी। युद्ध समाप्तिके बाद युधिष्ठिर कुलक्षय देख कर
जब अत्यंत दुःखित हो गया था तब भीष्माचार्यका शरीर अत्यंत निःसत्व हुआ था। फिर भी, युधि-
ष्ठिरका मन स्वस्थ हो इसलिये भीष्माचार्यने उसको धर्मोपदेश दिया। उसके बाद माघ शुद्ध
ज्ञानेश्वरी २२