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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 951, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 951

पाँच दिन तक ये सेनापति रहे और पांडव सेनाके बड़े बड़े महारथी इसी कालमें मारे
गये । उनमें अभिमन्यु और घटोत्कच मुख्य हैं । इन्होंने प्रतिज्ञापूर्वक अभिमन्यु वध किया ।
अभिमन्यु वधसे संतप्त अर्जुनने जयद्रथ-वधकी प्रतिज्ञा की और वह पूर्ण की । द्रोणाचार्यने जयद्रथकी
रक्षाके लिये विशिष्ट व्यूह रचना की थी फिर भी अर्जुनने जयद्रथका वध किया इससे संतप्त
होकर द्रोणाचार्यने रात्रीके समय भी युद्ध चालू रखा । वह युद्धका पंद्रहवा दिन था। दिन भर
लडकर थके हुए वीरोंने बड़े आवेशसे रातको भी लडाई की । इसी युद्धमें घटोत्कच और भीमने
त्राही मचा दी । रात दिन लडकर थके हुए वीरों पर जब निद्रा देवीने अपना जाल बिछाया
भीमने इसका पूरा लाभ लिया । उसने इंद्र वर्माका अश्वत्थामा नामका हाथी मारा ! सारी
पांडवी सेना "अश्वत्थामा मारा गया !" कह कर चीखने चिल्लाने लगी । यह सुन कर द्रोणाचार्य
दुःखी हुए । आचार्यने निर्णयके लिये युधिष्ठिरसे पूछा । कृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरने "अश्वत्थामा
मारा गया !" कहते हुए भी धीरेसे "हाथी !" कहा जो द्रोणाचार्य नहीं सुन सके । उन्होंने
पुत्रशोकमें शस्त्रसंन्यास लिया । इसी समय भरद्वाज आदि पितरोंने " तू ब्राह्मण होकर भी
युद्धमें शस्त्र उठानेका पाप किया !" कहते हुए शस्त्र छोड कर योगमार्गका आसरा लेनेको कहा और
धृष्टद्युम्नने "यही ठीक समय !" जान कर द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया । ये मार्गशीर्ष वद्य
द्वादशीको दोपहर मारे गये । मृत्यूके समय इनकी आयू ९५ वर्षके आस पास थी ।
कृष्णाजिन और कमंडलु इनका ध्वज चिन्ह था ।
इन्होंने द्रुपदराजा, विराट, द्रुपदपुत्र शंख, और वसुदानका वध किया है ।
गीता अ० १. श्लो. ३-द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न
द्रुपदराजाका पुत्र ! अयोनिंसभव ! द्रोणाचार्यने अपने शिष्योंसे द्रुपदराजाको बंदी बना कर
उसका आधा राज्य छीनकर छोड़ दिया था । परिणामस्वरूप द्रुपदराजा दुम पर पैर देकर छोडे हुए
सांपकी भांति द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये पागल हो गया । द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये
द्रुपदराजाने जो यज्ञ किया उस यज्ञसे धृष्टद्युम्न पैदा हुवा और द्रौपदी भी ।
द्रोणाचार्य ही इसके अस्त्र-गुरु थे । यह युद्धमें अत्यंत पराक्रमी था । वैसे ही चतुर भी ।
जब द्रौपदी स्वयंवरमें ब्राह्मणकी वेष-भूषामें आये पांडवोंने द्रौपदीको जीता तब सारी राज-सभा
उद्विग्न हो गयी । "ब्राह्मणोंने क्षत्रिय-कन्या कैसे जीती ?" यह उद्विग्नता इतनी तीव्र थी कि उसी
समय महा-युद्ध होनेकी नौबत आयी किंतु धृष्टद्युम्नने अत्यंत योग्यता पूर्वक पांडवोंका परिचय
देकर प्रसंग निभा लिया ।
भारत युद्धमें आदिसे अंत तक यही सेनापति रहा । और अत्यंत कुशलतासे सेना-संचालन
करता रहा । युद्धके अंतमें बचे हुए कुछ सेनानियोंमें यह भी एक था ।
युद्धके पंद्रहवे दिन दोपहरको भीमने अश्वत्थामा नामका एक हाथी मारा । और सारी पांडव
सेनामें भीमने अश्वत्थामाको मारा "कोलाहल मच गया ।" द्रोणाचार्यने सोचा "मेरा पुत्र
अश्वत्थामा मारा गया" और शोक-मग्न द्रोणाचार्यने शस्त्र रख दिया । "यही मौका" जान कर
धृष्टद्युम्नने गुरु द्रोणाचार्यका शिरच्छेद किया ! यह देखकर सात्यकीने "असहाय स्थितिमें निःशस्त्र
५ परिशिष्ट १.