ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 948, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीता अ. १. श्लो० १-संजय
गावल्गण सूतका पुत्र । धृतराष्ट्रका सारथी और सलाहकार । दुर्योधनने भीष्मादिकी बात
नहीं मानी, द्रौपदीका अपमान किया तब इसने दुर्योधनकी निंदा की थी । व्यासने संजयको
दिव्य दृष्टि देकर धृतराष्ट्रको युद्ध-वार्त्ता कहनेके लिये बिठाया । यह रणभूमि पर जाता था । इसको
व्यासने श्रम रहित अथक कर्म करनेकी शक्ति दी थी । साथ ही साथ "रणमें तू सदैव अवध्य
रहेगा " ऐसा वर दिया था । इसने एक बार धृष्टद्युम्न पर, जब उसने स्वस्थ बैठे हुए निहत्थे
द्रोणका वध किया तब, आक्रमण भी किया था किंतु धृष्टद्युम्नने इसे भगा दिया । सात्यकीने भी
इसको युद्धभूमिसे मार भगाया था । दुर्योधन इसके साथ धृतराष्ट्रको संदेश भेजता था । इस
परसे ऐसा लगता है कि यह स्वयं युद्ध-भूमिपर "वार्ताहर" के रूपमें रहता था और सब बातों
पर अपनी दृष्टि रखता था । कृष्णार्जुन संवाद रूप गीता इसीने धृतराष्ट्रको सुनायी है । युद्धके
बाद धृतराष्ट्रके साथ यह युधिष्ठिरके पास भी रहा । अंतमें जब धृतराष्ट्र वनमें गया तब विदुरकी
सम्मतिसे उसे छोड़कर वनमें गया । यह अपने साथीके वियोगसे नारदकी दी हुई जानकारीके
बल बूते पर धृतराष्ट्रके पीछे पीछे उनके शोधमें भी गया था ।
गीता अ. १. श्लो० २-दुर्योधन
धृतराष्ट्रसे उत्पन्न गांधारीके सौ पुत्रोंमें प्रथम पुत्र । उत्तम रथी, शस्त्रविद्या निपुण, उत्तम
सारथी, दुर्योधन और भीम एक ही दिन पैदा हुए थे । इसके जन्मके समय बहुत ही असगुन
हुए थे । इसके जन्म-कालमें जो अपशकुन हुए वह देखते हुए ब्राह्मणोंने धृतराष्ट्रसे कहा था "यह
कुलक्षयका कारण बनेगा । इसलिये इसका त्याग करनेमें ही भला है । यदि कुलका हित चाहते हैं
तो इसका त्याग करें । कुल और राज्यकी रक्षा करें ।" बचपनमें, हर बातमें पांडव श्रेष्ठ होते थे
इससे दुर्योधन उनसे द्वेष करने लगा । इस द्वेषसे दुर्योधन पांडवोंका नाश करनेकी योजनायें
बनाने लगा । दुर्योधन भीमको विष खिला कर, उसके साथ खूब जल केली करने लगा और
भीमके थककर बेसुध होने पर उसको हाथ पैर बांधकर गंगा में फेंकके घर आया । इस घटनासे
दुर्योधनको बड़ा हर्ष हुवा था किंतु भीम लौट आया और उसने सारी बात अपने भाइयोंसे कही ।
कौरव और पांडव दोनों द्रोणके पास शस्त्रविद्या सीखे । विद्याध्ययन पूर्ण हुवा । कुमारोंके
रण कौशल्यसे सभी प्रसन्न हुए । द्रोणने द्रुपदको युद्धमें जीतकर लानेकी गुरु दक्षिणा मांगी । तब
दुर्योधन अपने भाइयोंके साथ आगे गया और मार खा कर लौटा । फिर अर्जुन उसको जीत कर
बंदी बनाकर लाया । दुर्योधन बलरामसे गदायुद्धकी कला सीखा । जब धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको
युवराज पद देनेका निश्चय किया तब यह द्वेषसे बेभान हो गया और इसने पांडवोंको मारनेके
लिये लाक्षागृहकी योजना बनाई किंतु विदुरकी पूर्व सूचनाके कारण पांडव इससे बच निकले । यहां
भी दुर्योधन हारा और धृतराष्ट्रने पांडवोंको इंद्रप्रस्थमें ला रखा ।
काशीराजाकी लड़की भानुमती इसकी पत्नी थी । यह कलिंग देशका राजा चित्रांगदकी
पुत्रीको स्वयंवरमें से उठाकर लाया था ।
पांडवोंने इंद्रप्रस्थमें राज्य करते हुए राजसूय यज्ञ किया । उस यज्ञमें यह कोषाध्यक्ष था ।
दुर्योधनने वहां अत्यधिक व्यय किया फिर भी धनकी कोई तंगी नहीं हुई । सारा खर्च करके भी
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