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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 712

स्पर्शमें जो है अति मृदु । मुखमें लिया तो सुस्वादु ।
घ्राणमें वैसे ही सुगंधु । अंगोंसे उज्ज्वल ॥ ७१ ॥
यदि चाहे जितना भी लेता । कोई नुकसान नहीं होता ।
उसको तब है कहा जाता । कर्पूरसा वह ॥ ७२ ॥
महाभूत अपनेमें समालेता । तथा परमाणुमें भी जो समाता ।
जैसे विश्व है वैसे ही बन जाता । आकाश जैसा ॥ ७३ ॥
क्या कहूं मैं ऐसोंका जीवन । विश्वके लिये जीव धारण ।
उसको कहता हूं अर्जुन । मार्दव मैं ॥ ७४ ॥
१९ दैवी-गुण, मर्यादा : लज्जा—
तथा पराजयसे राजा । हीन दशामें जो सलज्ज ।
स्वाभिमानी होता निस्तेज । निकृष्टतामें ॥ ७५ ॥
या आया चंडालका सदन । अकस्मातही संन्यासी जान ।
होता है जैसे सलज्जमन । उत्तम जो ॥ ७६ ॥
क्षत्रियको रणसे भागना । कैसे सहना निर्लज्ज जीना ।
विधवा नामसे पुकारना । महासतीको जैसे ॥ ७७ ॥
सुरूपको महारोग भया । या शिष्टको कलंकित किया ।
प्राण संकटमें लजा गया । उसी भांति ॥ ७८ ॥
साडे तीन हाथका देह बना । तथा शवसा बनकर जीना ।
जनम ले लेकर मरना । पुनः पुनः जो ॥ ७९ ॥
गर्भके मेद सांचेमें । रक्त मूत्रके रसमें ।
पुतला बन जीनेमें । आती लज्जा ॥ १८० ॥
लेकर यह देहपन । नाम रूपका धारण ।
रहनेसे न कुछ भिन्न । लज्जा जनक ॥ ८१ ॥
ऐसेमें देहसे उकताकर । रहते हैं सूज्ञ पांडुकुमार ।
तथा मानते निर्लज्ज अपार । उसीमें सुख ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४०