ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूज कर जैसे देव देखना । बुवाई करके खेतमें जाना ।
संतुष्ट करके प्रसाद लेना । अतिथिका जैसे ॥ ४८ ॥
ऐसे लगाकर अपने गुण । दूर कर औरके अवगुण ।
देखा करता है जो अर्जुन । सबकी ओर ॥ ४९ ॥
न करना मर्माघात । न उलझाना पापमें पार्थ ।
सदोष नामसे उल्लिखित । न करना कभी ॥ १५० ॥
तथा करके कोई उपाय । पतित खडा हो धनंजय ।
ऐसे ही करना सभी कार्य । न हो मर्माघात ॥ ५१ ॥
अधमको भी मान । उत्तम ही अर्जुन ।
कभी इसके बिन । न देखें दोष ॥ ५२ ॥
अनिंदाका यह लक्षण । जान तू होता है अर्जुन ।
मोक्ष-मार्गका सुखासन । मुमुक्षुओंका ॥ ५३ ॥
१६ दैवी-गुण, दया—
अब दया है ऐसी । पूर्ण चंद्रिका जैसी ।
शीतलता एकसी । देती सबको ॥ ५४ ॥
वैसे दुखितोंका कष्ट । दूर करना है इष्ट ।
उसमें श्रेष्ठ कनिष्ठ । देखता नहीं ॥ ५५ ॥
जगतमें जीवन जैसे । नाश होता है अंगसे ।
किंतु बचाना अपनेसे । तृणजात ॥ ५६ ॥
वैसे अन्योंका देख ताप । चटपटाता हो सकृप ।
सर्वस्व देकर भी आप । कुछ भी मानता नहीं ॥ ५७ ॥
जैसे गढ़ा देखकर अपूर्ण । पानी आगे नहीं बहता जान ।
वैसे श्रांतको तोष दिये बिन । आगे नहीं जाता ॥ ५८ ॥
पैरोंमें जब कांटा चुभता । उससे हृदय तडपता ।
वैसे कष्टोंसे चटपटाता । अन्योंके यह ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३८