ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१ दैवी-गुण, अभय—
अब जो दैवी गुणके श्रेष्ठ । आसन पर बैठता ज्येष्ठ ।
गुण कहलाता है वरिष्ठ । अभय ऐसे ॥ ६८ ॥
कूदा ही नहीं महा-पूरमें । तब डूबना कहो किसमें ।
या रोग नहीं आता घरमें । पथ्यके कभी ॥ ६९ ॥
वैसे कर्माकर्मका अहंकार । उठने नहीं देता धनुर्धर ।
तथा संसार भय तजकर । रहना सदैव ॥ ७० ॥
अथवा ऐक्य भावसे भरकर । अपनेसे अन्य नहीं मानकर ।
भय-वार्ताको करता सीमा पार । पूर्ण रूपसे ॥ ७१ ॥
जब लवणको पानी डुबाता । तब लवण ही पानी बनता ।
वैसे आप ही अद्वय बनता । नाशता भय ॥ ७२ ॥
जिसको कहते हैं अभय । वह समझनेसे अद्वय ।
चलता रहता धनंजय । सदा सर्वत्र ॥ ७३ ॥
२ दैवी-गुण, सत्त्वसंशुद्धि—
तथा सत्त्वशुद्धि जो कहलाता । एसे लक्षणोंसे है जाना जाता ।
जो न जलता या नहीं बुझता । राखके जैसे ॥ ७४ ॥
या शुक्लमें जो न बढ़ता । या कृष्णमें जो न घटता ।
वैसे सूक्ष्म होके रहता । चंद्रमा जैसे ॥ ७५ ॥
या वर्षाका उतरा महापूर । ग्रीष्मका शुरू न हुआ उतार ।
वैसे निज रूपमें हो सुंदर । गंगा प्रवाहसा ॥ ७६ ॥
वैसे संकल्प विकल्पका खींचाव । रज तमका तज बोझ दबाव ।
अनुभवता निज-धर्म स्वभाव । बुद्धिमात्र ॥ ७७ ॥
इन्द्रिय-समूहसे जो दर्शित । उचित अथवा हो अनुचित ।
देख चित्त नहीं होता स्पंदित । किंचितमात्र ॥ ७८ ॥
घरसे दूर गया वल्लभ । पतिव्रताका विरह क्षोभ ।
भुला देता अन्य हानि लाभ । मनमें न डसता वैसे ॥ ७९ ॥
६३१ देवासुर-संपद्विभाग योग