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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 702

जिज्ञासु-जन आप समस्त । सोचते ऐसे अपने चित्त ।
यह पूर्ण करने यथार्थ । बोलेंगे श्रीहरि ॥ ५८ ॥
जिससे होगा ज्ञान उत्पन्न । आप होंगे विश्रांतिसे पूर्ण ।
ऐसे दैवी-गुणोंका वर्णन । करेंगे श्रीहरि ॥ ५९ ॥
ज्ञानका कर अनादर । राग-द्वेषको दे आधार ।
वे आसुरी गुण भी घोर । कहेंगे स्पष्ट ॥ ६० ॥
इष्टानिष्ट दोनों स्वाभाविक । करता है जिनका कौतुक ।
उनका कथन किया देख । पहले नवममें ॥ ६१ ॥
वहां करना था इसका विस्तार । वहां अन्य विषय हुवा गोचर ।
तब यहां किया प्रसंगानुसार । उसका निरूपण ॥ ६२ ॥
इसका अब निरूपण । सोलहवेमें करेंगे पूर्ण ।
क्रमानुगत संख्या जान । पहलेसे जो ॥ ६३ ॥
रहने दो यहां है जो प्रस्तुत । जाननेमें ज्ञानका हिताहित ।
देवासुर संपदा है समर्थ । कहेंगे अब ॥ ६४ ॥
जो है मुमुक्षुओंका पथ दर्शक । तथा मोह-रात्रिका तम नाशक ।
कहती दैवी संपदा अलौकिक । सुनो वह प्रथम ॥ ६५ ॥
जहां परस्पर पोषक । ऐसे पदार्थ जो अनेक ।
एकत्र करते हैं लोक । कहते हैं संपदा ॥ ६६ ॥
सुख संभावना जो दैवी । तथा दैवी गुणोपजीवी ।
होती है इसीलिये दैवी । संपत्ति है वह ॥ ६७ ॥
भगवान उवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
श्री भगवानने कहा
निर्भयत्व मनःशुद्धि व्यवस्था ज्ञानयोगमें ।
यज्ञ निग्रह दातृत्व स्वाध्याय ऋजुता तप ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ६३०