ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यासादिकोंका शुद्धज्ञान । शोभता मेखला समान ।
उसकी दिशा है महीन । झलकती सदा ॥९॥
कहलाते जो षड्दर्शन । जैसे भुजदंड महान ।
तभी है असंगत-पूर्ण । आयुध करमें ॥१०॥
तर्क ही है परशु । नीति-भेद अंकुश ।
वेदांत महारस । शोभता मोदक ॥११॥
एक हाथमें हैं दन्त । स्वभावसे ही खंडित ।
जो बौद्धमत संकेत । वार्तिकोंका ॥१२॥
सहज सत्कारवाद । है पद्मकर वरद ।
धर्मप्रतिष्ठामें सिद्ध । अभयहस्त ॥१३॥
विवेकवंत सुविमल । वही शुंड-दंड सरल ।
है परमानंद केवल । महासुखका ॥१४॥
अजी संवाद है दशन । जो है समता शुभ्रवर्ण ।
देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षण । विघ्नराज ॥१५॥
पूर्व उत्तर मीमांसा मान । उसके हैं दो श्रवणस्थान ।
मुनिमन बोधामृत पान । करते अमरसे ॥१६॥
प्रमेयप्रवालसुप्रभ । द्वैत अद्वैत हैं निकुंभ ।
तुल्यबल हैं जो सुलभ । मस्तक पर ॥१७॥
उस पर हैं दस उपनिषद् । जिसके उदार ज्ञान-मकरंद ।
मुकुट पर जो सुमन-सुगंध । सुहाते हैं ऐसे ॥१८॥
अकार चरण युगल । उकार उदर विशाल ।
मकार है महामंडल । मस्तकाकार ॥१९॥
जहां ये तीनो हुए एक । शब्दब्रह्म प्रकटा नेक ।
गुरु-कृपासे जाना देख । यह आदिबीज ॥२०॥
सरस्वती वंदन—
अजी अभिनव वाग्विलासिनी । जो चातुर्य-अर्थ-कलाकामिनी ।
वह है शारदा विश्व-मोहिनी । नमस्कार मेरा ॥२१॥
ज्ञानेश्वरी २