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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 571

जानता है सभी नीति । वैद्यकमें खासी गति ।
काव्यमें है पक्व-मति । तथा न्यायमें भी ॥ ३१ ॥
होता स्मृतियोंका तज्ञ । गारुडी विद्याका मर्मज्ञ ।
शब्दकोशका महा-प्राज्ञ । माना कोश है दास ॥ ३२ ॥
व्याकरण-ज्ञानमें अगाध । तर्क-शास्त्रका है पूर्ण बोध ।
किंतु आत्म-ज्ञानमें जन्मांध । होता है धनंजय ॥ ३३ ॥
इस एकके बिन जो सभी शास्त्र । जानता वह मूल सिद्धांत-सूत्र ।
जलने दो लगा है मूला नक्षत्र । न देखो वह ॥ ३४ ॥
मोर-पंखके शरीर पर । उसपे होती आंख सुंदर ।
दृष्टि नहीं होती एक पर । वैसा है यह ॥ ३५ ॥
अध्यात्म-ज्ञानके बिन सब व्यर्थ—
यदि परमाणु जितना । संजीवनी जड पा जाना ।
अन्य औषध क्या करना । ढेरोंका जो ॥ ३६ ॥
आयुष्य बिन सब लक्षण । अथवा शरीर बिन आभूषण ।
बरात जैसे वैभव-पूर्ण । दूल्हा बिन निंदित ॥ ३७ ॥
सब शास्त्र वैसे ज्ञान । सर्वथा है अप्रमाण ।
अध्यात्म ज्ञान बिन । स्वयंपूर्ण जो ॥ ३८ ॥
इसीलिये जान तू अर्जुन । जो है अध्यात्म-बोध विहीन ।
उसको कहते प्राज्ञ जान । शास्त्र-मूढ ॥ ३९ ॥
मानो उसका जो शरीर । अज्ञान-बीजका अंकुर ।
उसका हुवा जो विस्तार । अज्ञान-वृक्ष ॥ ८४० ॥
होते हैं उसके सभी बोल । आज्ञानके खिले हुये फूल ।
फले तो उसके पुण्य-फल । अज्ञानके ही ॥ ४१ ॥
अध्यात्ममें जिसे रस नहीं । उसको ज्ञेय दीखता नहीं ।
यह कहना अवश्य नहीं । जान तू यह ॥ ४२ ॥
४९९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग