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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 569

ऐसा जिसका चित्त । विषम होता पार्थ ।
होके भी बुध्दिवंत । अज्ञानी वह ॥ ६ ॥
फलमें रखके आसक्ति । करता वह मेरी भक्ति ।
जैसे करते हैं धनार्थी । विरक्तिका स्वांग ॥ ७ ॥
अथवा पतिके मनमें घुसकर । उसका विश्वास संपूर्ण पाकर ।
यत्न करती जाना जारके घर । स्वैरणी जैसे ॥ ८ ॥
जैसे मेरी उपासना । मनमें भोग-कामना ।
करता है वह अर्जुना । विषयार्थी हो ॥ ९ ॥
ऐसी भक्ति करने पर । फलको नहीं प्राप्त कर ।
छोड़ता है सब सत्वर । निरर्थक मान ॥ ८१० ॥
नित नयी भूमी किसान । बुआयी करता अर्जुन ।
ऐसे वह देवतार्चन । करता सदैव ॥ ११ ॥
देख किसी गुरुकी शान-मान । करता उसका मार्गानुगमन ।
तथा अन्योंको अति-क्षुद्र मान । उसका मंत्र लेता ॥ १२ ॥
प्राणि-जातसे जो निष्ठुर । पूजता है मूर्ति-स्थावर ।
ऐसी भक्ति तो अपार । निष्ठा कहीं नहीं ॥ १३ ॥
मेरी मूर्ति है बनवातां । घरके कोनमें रखता ।
आप यात्रामें है जाता । तीर्थ-क्षेत्रकी ॥ १४ ॥
प्रति-दिन मेरा आराधन । कार्यमें कुलदेवतार्चन ।
करता अन्य-देव पूजन । पर्व विशेषमें ॥ १५ ॥
घरमें है मेरा अधिष्ठान । अभिष्ठयर्थ अन्यका पूजन ।
पित्र-कार्यमें होता तर्पण । पितरोंका भी ॥ १६ ॥
जैसे एकादशीका पूजन । होता वैभवसे मेरा जान ।
वैसे नगापंचमीके दिन । नागोंका भी ॥ १७ ॥
गणेश-चतुर्थी देवता । गणेशका भक्त बनता ।
चतुर्दशी देख कहता । जै दुर्गे तेरा मै ॥ १८ ॥
४९७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
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