सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 121

कौरवोंका हुआ अनुचित । अथवा तेरा ही हुआ घात ।
या मानो हो गया है युगांत । तो भी यहां ॥ ८१ ॥
स्वधर्मे यह रहता एक । सदा जो आचरणीय नेक ।
तुझे वह है कृपा पूर्वक । तारेगा ही ॥ ८२ ॥
अर्जुन तेरा जो चित्त । हुआ यदि द्रवीभूत ।
किंतु यह अनुचित । संग्राममें ॥ ८३ ॥
हुवा यदि गायका दूध । पथ्यमें हुआ इससे बाध ।
करेगा विषसा प्रमाद । नव ज्वरमें ॥ ८४ ॥
वैसे असमयमें अनुचित । इससे होगा हितका घात ।
इसलिये हो सावध चित । कार्यकर ऊठ ॥ ८५ ॥
व्याकुल है तू अकारण । कर स्वधर्मका आचरण ।
उससे होगा सब रक्षण । तीनों कालमें ॥ ८६ ॥
जैसे सरल पथपे चलना । उपाय है अपायसे बचना ।
या है दीप प्रकाशमें चलना । न लगे ठोकर ॥ ८७ ॥
वैसे सुन तू अर्जुन । करस्वधर्माचरण ।
सकल कामना पूर्ण । होती हैं ॥ ८८ ॥
देखो इससे अन्य नहीं । क्षत्रियकेलिये जो सही ।
रणके बिन कछु कहीं । उचित धर्म ॥ ८९ ॥
हो करके निष्कपट । लडना अति विकट ।
देखना क्या रही बाट । प्रत्यक्षमें यहां ॥ १९० ॥
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥
स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि—
यह है युद्ध आजका । फल है तेरे दैवका ।
धरोहर है धर्मका । हुआ प्रकट ॥ ९१ ॥
हुवा प्राप्त अनायास स्वर्गका द्वार है खुला ।
भाग्य शाली क्षत्रियोंको मिलता धर्म-युद्ध है ॥ ३२ ॥
५३ सांख्ययोग