ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
हैं यहां ये भूत समस्त । जन्मके पहले अमूर्त ।
फिर किया व्यक्तित्त्व प्राप्त । जन्म लेके ॥ ६४ ॥
मिटाकर अपना आकार । नाशसे बनते निराकार ।
जाते हैं मूल-रूपमें और । यथा स्थिति ॥ ६५ ॥
मध्यमें जो प्रतिभासे । निद्रितका स्वप्न जैसे ।
वैसे आकार मायासे । है सत्यरूपका ॥ ६६ ॥
न तो वायुने छेड़ा नीर । बना जैसे तरंगाकार ।
परापेक्षासे अलंकार । दीखता सोनेमें ॥ ६७ ॥
वैसे सकल हैं यह मूर्त । जान ले तू मायाका है रीत ।
जैसे आकाशमें है बिंबित । बादल सारे ॥ ६८ ॥
नहीं यहां जो मूलता । उसके लिये है रोता ।
देख तू नित तत्वता । चैतन्यएक ॥ ६९ ॥
उसकेलिये होकर पार्थ । विषय तज करके संत ।
रहते हैं सदैव विरक्त । एकांतमें ॥ १७० ॥
दृष्टि रखकर जिस पर । ब्रह्मचर्यादि व्रतको कर ।
तपाचरते मुनीश्वर । अनन्य हो ॥ ७१ ॥
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
अव्यक्त मूल भूतोंका मध्य है व्यक्त भासता ।
पुनः है अंत अव्यक्त इसमें शोक है कहां ॥ २८ ॥
आश्चर्य कोयी अवलोकता है
आश्चर्य कोयी कहता यही है ।
आश्चर्य है वर्णित अन्य बातें
सुने भी ना जान पाता इसे हैं ॥ २९ ॥
५१ सांख्ययोग