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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1170

स्तवन- स्तुति.
स्ताव्य- स्तुतिका विषय.
स्तोत्र- स्तुति, ईश्वर-स्तवनार्थ बनायेगये
विशिष्ट प्रकारके काव्य.
स्थावर- अचल हलचल न कर सकनेवाला
स्थित- स्थिर, अस्तित्व, अपने स्थान
पर अधिष्ठित, स्वप्रमाणपर जमा
हुवा.
स्थितप्रज्ञ- जिसकी बुद्धि समाधिमें स्थिर है
वह, आदर्श-सिद्धांत तथा उसके
व्यवहार-कुशलतामें जो प्रवीण है
ऐसा, सभी इच्छाओंका अतिक्र-
मण करके अपनेमें अपनेसे निरा-
लंब आनंदमे स्थिर है वह,
गीताका आदर्श पुरुष.
स्नेहाद्रंचित्त-स्नेह वात्सल्यपूर्ण चित्त.
स्फुरदमंदामंदवत्सल-सदैव स्फुरनेवाले
आनंदसे भरा हुवा.
स्वजनवनचंदन-अपने भक्तोंके समूहमें
चंदनरूप.
स्वसंविद्रुमबीजप्रसभूमिरूप स्वसंवित् रूप
स्वरूपज्ञानरूपी वृक्षका बीज पडने
योग्य भूमिरूप.
स्वसंवेद्य अपने आप जानने योग्य.
ह
हडप — मूल शब्द कन्नड भाषाका, क्षौर
सामग्री रखनेका नाईका थैला.
किंतु महाराष्ट्रमें इसको पानदानके
रूपमें स्वीकार किया गया है.
हरना- हरण करना, दूर करना, फैलाना,
पीछे हटाना.

हरित-हरे रंगका.
हर्ष-आनंद.
हवि-हवनद्रव्य.
हस्तोदक-हाथपर पानी छोड़कर दान देना,
हतोदक देना.
हिमवंत-हिमाचल.
हिय-हृदय.
हृदयकमल आराम-हृदयरूपी कमलमें
विश्रांति लेनेवाला.
हृदयस्थ-हृदयमें रहनेवाला.
हेतुमंत-युक्तित्राला.
क्ष
क्षमा-सहनशीलता अपराध, सहिष्णुता.
क्षय- मरण, नाश
क्षर- नाशवंत.
क्षितीश- राजा.
क्षीण- क्षय होनेवाला, समाप्त होनेवाला.
क्षीरसागर- दूध का सागर.
क्षीरार्णवकल्लोल-लहरानेवाले दूध-सागरका
कल्लोल.
क्षुद्रघंटिका- घुंगरू.
क्षुब्ध- चंचल, अधीर, क्रुद्ध, भीत.
क्षेत्र- खेत, मैदान, पवित्रस्थान, गीतामें
जीवात्माका क्षेत्र शरीर, भूतोंका
उत्पत्तिस्थल.
क्षेत्रसंन्यास- स्थान निष्ठा संन्यास, यह
अंतिमस्थान स्थान है इस भावसे
एकही स्थान पर रहनेका निश्चय
और प्रयत्न करना.
क्षेत्रसंन्यासी- क्षेत्रसंन्यास लिया हुवा.
क्षेत्रज्ञ- शरीररूप क्षेत्रका साक्षीरूप जीव.
क्षेम- मोक्ष विषयक उपलब्धीका रक्षण.

ॐ
ज्ञानेश्वरी २२४