ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1132, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहलाता है । (३) चित्त शुद्धि करके चिंतन शक्तिद्वारा निर्वृत्त चित्तमें समाधिमें लीन होकर
आत्मसाक्षात्कार करना ध्यानयोग अथवा राजयोग कहलाता है । (४) बुद्धि शक्तिद्वारा अपने
आपको जानकर उसीमें लीन होना ज्ञानयोग कहलाता है । (५) और भाव शक्तिद्वारा आत्मासे
निष्काम और निःसीम प्रेम करके तद्रूप हो जाना भक्तियोग । ये पांच महान योग हैं । इसके
अलावा जप-सातत्यसे अपनेमें उठनेवाली शब्दतरंगोंद्वारा जीवन शुद्ध करते करते शब्द ब्रह्ममें
लीन हो जाना जपयोग कहलाता है । तथा अनेक प्रकारसे कुंडलिनी शक्तिको जगा कर तद्द्वारा
आत्मदर्शन करना कुंडलिनी योग कहलाता है । इन सभी योग साधनामें यम-नियम हित-मित
आहार विहार, सतत ध्येय निष्ठा साधना, चिंतन और प्रयोग, स्वाध्याय आदिकी समान आवश्यकता
है । बिना इसके कोई योग संभव नहीं है ।
योगशब्दका धात्वर्थ जुडना है । कर्म करते करते स्वरूप लीन होना हो, अथवा चित्तवृत्ति
निरोधसे स्वरूपमें लीन होना हो या भगवद्चिंतन करते करते स्वरूपमें लीन होना हो सब एक
है । याज्ञवल्क्य ऋषिने “ जीवात्मपरमात्मसंयोग ही योग” कहा है । किंतु जहां दो तत्व नहीं
है एक ही तत्व है वहां कौन किससे जुडेगा ? यह प्रश्न उठता है । इस प्रश्नका उत्तर देते समय
अद्वैतानुभवी कहते हैं “योगका अर्थ चित्तकी निरुद्धावस्थामें स्फुरणरूप बिंबका अनुभव करना
योग है !” किसी किसीने योगको मनोलय कहा है । योगमें प्राप्त समाधिका वर्णन करते समय
अद्वैतावस्थाका सुंदर विवेचन किया हुवा मिलता है । पातंजल योगसूत्रोंमें कहे गये समाधिप्रकारोंके
अलावा भी अन्य योग-ग्रंथोंमें अन्य अनेक समाधि प्रकार कहे गये हैं । अन्यान्य योग प्रकारोंके
विवेचन इसी ग्रंथमें पाठक देख सकेंगे ।
रस—रस दो प्रकारके हैं । एक षड्रस दूसरा नवरस । षड्रस विषय पंचकका एक
विषय है । वह रसनेंद्रिय-ग्राह्य है । रसनेंद्रिय ग्राह्य षड्रस हैं मधुर=मीठा, आम्ल=खट्टा, लवण=
नमकीन, कटु=तीखा, कषाय=कसैला, तिक्त=कडुवा । ये षड्रस रसनेन्द्रियके विषय हैं।
ऐसे ही साहित्यमें नवरस कहे गये हैं । ये अंतःकरणकी वृत्तियोंके कारण अंतःकरणसे
अनुभव किये जाते हैं । रसका अर्थ अंतःकरणकी टीस । अंतर्मनका खिंचाव अथवा चाह भी कह
सकते हैं जो उसके अनुकूल परिस्थितिमें जैसे साहित्यवाचन, दृश्यदर्शन, कथा श्रवणादिसे-उद्दीपन
होते हैं । ये रस नौ हैं । शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रोद्र और शांत ।
इन रसोंके स्थायीभाव भी और होते हैं ।
राग-द्वेष—योगशास्त्रमें इन दो शब्दोंकी परिभाषा करते समय कहा गया है “सुख
दायक बातोंका चिंतन, उस विषयक लोभ तथा आसक्ति राग है तो दुःख दायक बातोंके
चिंतनसेद्वेष ” उत्पन्न होता है ।
राजयोग—अष्टांगयोग इस शब्दके विवेचनमें इसका बाह्यविवेचन आया ही है । यहां
कुछ अंतरंगका दर्शन करना है । शरीरमें स्थित अणुमय पिच्छक्ति पर अपना स्वामित्व रख कर
अनंत पिच्छक्तिसे समरसैक्य अनुभव करना इस योगका उद्देश है । जिस ब्रह्मको आदि मध्य
अंतमें कहीं द्वैतका स्पर्श भी नहीं होता वही विजन है । विजनका अर्थ “एकांत स्थान ।” जो
साधनाका धरातल है । इस धरातल पर सभी भूतमात्रोंका जो जो अधिष्ठान है तथा सभी सिद्ध
पुरुष जहां लीन होते हैं वह “सिद्धासन” डालकर योगारंभ होता है । सारे विश्वके मूलमें जो
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