सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1128, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1128

मायासे-दीखता इंद्र आप विविध रूपसे !"
यहां माया एक आवरण है जिससे इंद्र विविध रूपसे दीखता है। आवरण की यही कल्पना
ईशावास्योपनिषदमें—
आवृत्त है सत्यका मुख जो हिरण्मय पात्रसे ।
पूषा कर तू निरावृत्त सत्य-धर्म रतके हित ॥ १५ ॥
ऐसे ही १७ वे मंत्रमें ऋषि प्रार्थना करता है—
पूषा तू एकाकी ऋषि यम सूर्य प्रजापति
निरावृत्त कर तेरे रश्मि-व्यूह-समूहको ॥
परम-कल्याणमय रूप देख करता मैं
“वह पुरुषही मै हूं" ऐसी ही बोधानुभूति ॥
इसमें संदेह नहीं कि उपनिषदमें बार बार यह शब्द नहीं आया है किंतु माया के मूलमें जो
कल्पना है उसको पर्याप्त मात्रामें देखनेको मिलती है । इतनाही नहीं आद्य-शंकराचार्यजीके
मायावादके लिये आवश्यक सारी विचार सामग्री वहां विद्यमान है। इसके बाद गीतामें भी—
रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर ।
मायासे ही चलाता जो यंत्रों पर चढा कर ॥
यहां भगवान अपनी मायासे सभी भूतोंको चलाता है तो गीताके सातवे अध्यायमें—
हीन मूढ दुराचारी मेरा आश्रय छोडके ।
भ्रांत होकर मायासे पाते हैं भाव आसुरी ॥
मायामें भ्रांत हो कर भगवानको भूल जाते है ।
माया शब्दका यहां एक अर्थ नहीं है। यहां मायाके भिन्न भिन्न अर्थ दीखते हैं। वेदमें जो
इंद्रकी माया है वह इंद्रकी शक्ति है। ईशावास्यका हिरण्मय आवरण ईश्वरकी शक्ति है, और
मुंडकोपनिषदकी गांठ है वह जीवकी माया है, जो अविद्या रूप है। प्रश्नोपनिषदमें भी इस
प्रकारके आवरणका उल्लेख है जिससे जीव छल कपटादिमें लिपट जाता है। प्रश्नोपनिषदका यह
आवरण तथा ईशावास्यका रश्मिव्यूहसमूह एक है जिसके निरावृत्त करनेसे "वह पुरुषही मैं हूँ
ऐसा बोधानुभव" होता है। यही श्री आद्य शंकराचार्यके मायावादका प्रेरणास्रोत है। यह “उसे”
ढकनेवाला स्वर्ण पात्र-चमकीला है जिसके विषयमें, देखने वालेको मोह हो ! जो देखने वालेकी
आंखोंको चौंधिया देता है ! फिर रश्मि व्यूह समूह है जो विविध नाम रूपसे बुना गया है ! इसी
प्रकार कठोपनिषदमें, मुंडकोपनि षद्में, भिन्न उपमाएँ देकर "सत्य पर आवरण” होनेकी बात
कही गयी है और इस "आवरणको" अविद्या अथवा “अज्ञान” नाम दिया गया है। आगे
मुंडकोपनिषदमें इसे गांठकी उपमा देते हुए कहा है।
रहता हृदय गुहामें तू जान उस पुरुषको ।
वहां है जो अविद्या ग्रंथी खोले बिन नहीं दीखता ॥
इसीलिये उपनिषद विद्याको सामर्थ्य मानकर अविद्याको दौर्बल्य मानते हैं। अपने ही
सामर्थ्यसे यह हृदय-ग्रंथी खोलनी पडती है। इसका भी वर्णन है।
ज्ञानेश्वरी १८२