ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1090, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह उपनिषदोंका कहना है। किंतु बुद्धने अपने सिद्धांतकी नींव ही दुःख पर रखी है। बुद्धके
उत्तरकालीन तत्त्वज्ञानपर इस बातका गहरा असर पडा है। भारतीय तत्त्वज्ञानने अविद्याको
दुःखका मूल माना है। जैसे अविद्या घटते जाती है अथवा दूर होते जाती है वैसे दुःख मिटता
जाता है। ज्ञानके प्रकाशसे मनकी प्रसन्नता बढ़ते जाती है। जैसे जैसे प्रसन्नता बढ़ती जाती है
अपने आप शांति मिलती है। यही आध्यात्मिक आनंद है। वासनापूर्तिजन्यआनंद क्षणिक है।
इसलिये वासनाके कारणीभूत अविद्याको दूर करना शाश्वत सुखका साधन है। निरालंब शाश्वत सुख
जीवनका अंतिम लक्ष्य है। सारी आध्यात्मिक साधना इस लक्ष्यके प्रति ले जाती है। किसी भी
सुखके मूलमें जब तक वासना है तब तक वह सुख क्षणिक होगा। क्यों कि वही दुःखका मूल है।
इसलिये वासनाक्षय, वासनाका कारणीभूत मूल अविद्याका नाश, आध्यात्मिक साधनाका मूले कुठारः
पद्धति है। इसीको संतोंने अपने पारमार्थिक साधनाका आधारशिला माना है। इसलिये संतोंने
प्रापंचिक सुखोंसे अर्थात् वासनापूर्ति जन्य क्षणिक सुखोंसे विरक्ति और भगवद् भक्तिमें अनुरक्तिका
नया मार्ग सिखाया। विरक्तिसे वासनाक्षय, भक्तिसे आनंद प्राप्ति, ऐसा यह दुहरा मार्ग है !
देव—दिव्य देह धारण करनेवाला। दान देना, चमकना, प्रकाश देना, ऐसे अर्थके दा,
दीप अथवा द्युत धातुसे देव शब्द बना है। इसलिये देव शब्दके साथ दिव्यता का बोध होता है।
अदृश्य रूपसे वास करनेवाली दिव्य शक्ति देव ! ऐसा अर्थ हो गया है। यह अदृश्य शक्ति सर्वत्र
संचार करके भक्तोंकी एक निष्ठ भक्तिके कारण प्रकट होकर भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करती है। यह
सदैव भक्तोंके पास रहकर उसका रक्षण करती है। इनमें अनेक प्रकार हैं। वेदकालसे लेकर इस
चराचर सृष्टिके परे एक दिव्य सृष्टिकी कल्पना की है। देव इस दिव्य सृष्टिके निवासी हैं। इनकी
विविध शक्ति मनुष्यको सुख दुःख देती है। इस परसे देव-धर्म शब्द रूढ हुआ। देव, धर्म और
तत्त्वज्ञान यह संस्कृतिका तिहरा रूप है। प्रत्येक देशकी संस्कृतिका यह त्रिकोण है।
देह—इसीको शरीर, काया, तन, क्षेत्र आदि कहा गया है। जीवका भला बुरा भोग
भोगनेका स्थान देह है। सभी प्रकारकी चेष्टाओंका आश्रय, ज्ञानेंद्रिय तथा कर्मेंद्रियोंके कर्मका
आश्रय, हाथ पैर आदि सभी अवयवोंसे युक्त जो है वह, शरीरकी ऐसे अनेक प्रकारकी व्याख्यायें
की गयी हैं।
मानव देह किसका और कैसे बना है ? इसके विषयमें अनादि कालसे जिज्ञासा बनी रही है।
पुराणोंसे लेकर आदिवासियोंके साहित्य तक सर्वत्र इसके विषयमें विस्तृत और चित्रविचित्र विचार
आये हैं। ऋग्वेदमें शरीर तथा उसके अवयवोंके शब्द मिलते हैं। इस परसे ऐसे लगता है कि
वैदिक ऋषियोंने भी शरीर रचना समझनेका प्रयास किया था। अथर्ववेदमें इसकी विस्तृत चर्चा
है। आयुर्वेदके चरक सुश्रुतने भी वही नाम स्वीकार किये हैं। आजसे चार पांच हजार वर्ष पहले
लिखे गये शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथमें मानवदेहके शरीरमें जो हड्डियां हैं उसकी संख्या ३६०
होनेकी बात कही गयी है। गर्भोपनिषदमें स्त्रीके गर्भमें मानवका शरीर किस तरह बनता है इसका
विस्तृत विवेचन है। पुराणोंमें अयोनिज मानव देहका विचार आया है। सीता, द्रौपदी, धृष्टद्युम्न,
सप्तऋषि, आदि सभी अयोजित हैं। केवल पुराणोंमें ही नहीं आदिवासियोंके साहित्यमें भी
अयोजित शरीरधारियोंकी कथायें प्रसिद्ध है। इस देहमें भी देह है। यह जो देह दीखता है वह
स्थूल देह है।
ज्ञानेश्वरी १४५