ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1038, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंलगा । मौका बेमौका कृष्णका विरोध करने लगा । उनको भला बुरा कहने लगा । वह रुक्मिणीसे
विवाह करना चाहता था किंतु कृष्णने रुक्मिणीको जीता ! इससे वह अधिक ही चिढ़ गया । रुक्मिणीके
स्वयंवरमें भी वह कृष्णसे लड़ने जाकर आग गया था । किंतु आगे जब पांडवोंके राजसूय यज्ञमें
कृष्णको अग्र पूजाका मान मिला तब यह भड़क उठा । वहीं पर यह कृष्णको भला बुरा कहने लगा !
जब जीभकी लगाम टूटी तब भला सौ अपराध भरनेमें कितनी देर लगती है। कृष्णको गालियां
दे देकर थका हुआ शिशुपाल यज्ञ शालाके सभा-भवनके बाहर जाने लगा-राज-सभाका अपमान
करके-तब दरवाजेमें ही कृष्णके सुदर्शनने इसका शिरच्छेदन किया !! कृष्ण विरोधकी परमावधिमें
कृष्णसे मृत्यु ही कृष्णमें विलीनता है ।
नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार ।
भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुआ प्राप्त ॥ ज्ञा० ९-४६ ॥
नारद । पहले परिशिष्टमें परिचय आया है ।
ध्रुव-पिता उत्तानपाद राजा । माता सुनीति । सुनीतिको सूनृता भी कहा गया है । राजा
उत्तानपाद सुनीतताको नहीं चाहता था । उसकी प्रिय-पत्नी थी सुरुची । राजा इसीके साथ रहता
था । उसके आधीनसा रहता था । एक बार उत्तानपाद राजा अपनी प्रिय-पत्नी सुरुचीके पुत्र
उत्तमको गोदमें बिठाकर उससे प्यार करता था तब ध्रुव भी पिताकी गोदमें जा बैठ गया । तब
उत्तानपादने उससे लाड़ प्यार नहीं किया और सुरुचीने तो उसको "यदि तुमको राजा की गोदमें
बैठना है तो भगवानकी उपासना करके मेरी कोखसे जन्म लो !" कह कर नीचे उतार दिया ।
विमाताकी कठोर बात सुनकर ध्रुव खिन्न हुआ । तब भी राजा कुछ नहीं बोला । ध्रुव रोता
हुआ अपनी मांके पास आया । स्वाभाविक ही माने उसको गोदमें उठा लिया । ध्रुवसे सब बात
जान कर सुनीतिको बड़ा दुःख हुआ । किंतु वह समझ नहीं पायी कि ध्रुवके दुःखका अंत कैसे
किया जाय ।
इसके बाद ध्रुव भगवानकी आराधना करनेके लिये पिताके राज्यसे निकल गया । इस समय
भी राजा कुछ नहीं बोला । नारदको जब इस बातकी जानकारी मिली तब वह ध्रुवसे मिलने गये ।
नारदने ध्रुवसे बातें कीं । ध्रुवका क्षात्रतेज और स्वात्माभिमान देख कर नारद प्रभावित हो गये ।
उन्होंने ध्रुवके सिर पर हाथ रख कर उसको द्वादशाक्षरी मंत्र दिया और यमुना किनारे पर मधुवनमें
जा साधना करनेको कहा । ध्रुव मधुवन गया और नारद उत्तानपादके पास । उत्तानपादसे नारदने
कहा "तुम्हारा ध्रुव महापद् पाकर तुम्हारे पास आयेगा !" ध्रुवकी भगदाराधना प्रारंभ हुई । बाल
हठ ! भविष्यके अज्ञानके कारण निर्माण होनेवाला असीम धैर्य । ध्रुवने अन्न जल भी छोड़ दिया ।
वह एक पैर पर खड़ा हुआ । ध्रुवके तपके पुण्य-भारसे पृथ्वी कांपने लगी । उसके निग्रहसे इंद्रादि
देवता अकुला उठे । देवताओंने भगवानकी प्रार्थना की और भगवान विष्णु ध्रुवके सम्मुख प्रत्यक्ष
हुए । विष्णुने उसके गालको वेद-शंखका स्पर्श किया और ध्रुव वेद-वाणीसे स्तवन करने लगा ।
विष्णुसे इसने अचल-स्थान मांग लिया ।
ध्रुव घर लौट आया । ध्रुवकी लौटनेकी बात सुनकर राजाको सच नहीं लगा । फिर उसको
नारदकी बात याद आयी । तब उसको महान आनंद हुआ । उसी आनंदमें यह शुभ संवाद
लानेवालेको राजाने गलेका हार उतार कर दिया और ध्रुवका स्वागत करने दौड़ा । सजाये हुये
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