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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1035

बात भस्मासुरको जच गयी । उसने नारदको प्रणाम किया । "आपने बढ़िया बात बताई ।
और किसीने ऐसी बात नहीं बतायी थी" कहकर वह एक साथ कैलासपति और उमापति
बननेकी उमंगमें शंकर पर दौड़ गया ! नारदने भस्मासुरमें लोभ जगाया और लोभका अंधा
अपनी ही जड़ काटने चल पड़ा ।
शंकर पर अब संकट आया । वे विष्णुकी ओटमें गये । बिना सोचे समझे "मांगा वरदान,
दिया वरदान" का परिणाम भी चखनेको मिल गया उनको । तब विष्णुने, नारदके जगाये हुए
लोभके अनुरूप पार्वतीसे भी सुंदर, मोहिनीके रूपमें सामने आकर भस्मासुरको नृत्यमें उलझा
कर अपने हाथसे अपनी राख बननेको बाध्य किया । इसीको उदाहरणके रूपमें रख कर अर्जुन
श्रीकृष्णसे पूछ रहा है "मैं भस्मासुर जैसा पाप करूं क्या ?"
देख तू जनकादिक । कर्मजात हैं अशेष ।
न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ज्ञा० ३-१५२ ॥
मिथिलेश जनकराजा कर्मयोगी, अनासक्त न करनेकासा सब कुछ कर्म करनेमें कुशल ।
इसलिये वह क्षत्रियोचित सब कुछ कर्म करने पर भी फलासक्त न होनेसे-मुक्तावस्थाको प्राप्त हुआ ।
यह श्रीकृष्णने कहा है । जनकराजाने कर्म-द्वारा मोक्ष प्राप्तिका आदर्श विश्वके सामने रखा है ।
मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान् ।
औ' मैं कर रहा कर्म स-लगन । प्रसन्न चित्तसे ॥ ज्ञा० ३-६३ ॥
"कर्म बंधन कारक नहीं । वह अनिवार्य साधन है !" इस बातको कहते हुए अपना ही
उदाहरण अर्जुनके सम्मुख रखकर यह बात कही है । कृष्ण सांदीपनीके शिष्य । बलरामके साथ
श्रीकृष्ण धनुर्वेद सीखनेके लिये अवंती नगरके पास रहनेवाले आचार्य सांदीपनीके पास गये । वह
शस्त्राभ्यासके साथ शास्त्राभ्यास भी किया । धनुर्विद्याके साथ वेद वेदांगोंका भी अध्ययन किया ।
विद्याभ्यास पूरा हुआ । स्नातक बन कर आते हुए श्रीकृष्णने गुरूसे आग्रहपूर्वक पूछा "पूज्यवर !
आपको गुरुदक्षिणा क्या दूं !" आचार्य सांदीपनीका जीवन कृतार्थ जीवन था । किंतु उसमें एक
व्यथा थी । उनका इकलौता पुत्र दत्त ! अकस्मात समुद्रमें डूब गया था । आचार्य सांदीपनी को
वही एक दुःख था । आचार्यने अपना दुःख प्रिय शिष्यसे कहा । शिष्य भी लोकोत्तर था । गुरुकी
इच्छा पूर्ण करनेकी शक्ति रखता था ।
गुरुकी इच्छा सुनते ही श्रीकृष्ण बलरामको साथ लेकर गुरु पुत्रके शोधार्थ यमलोक गये ।
वहां प्रत्यक्ष कालसे युद्ध किया और उसको जीत कर गुरु-पुत्रको ले आये । ऐसा लोकोत्तर पराक्रम
करनेके बाद भी मैं लगनसे सभी कर्म करता हूं । यह कहते हुए अर्जुनको कर्मकी प्रेरणा देते हैं ।
शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो भार्त ।
दिया जैसे दूधभात । क्षीराब्धी ही ॥ ज्ञा० ५-११ ॥
उपमन्यु व्याघ्रपादका ज्येष्ठपुत्र । व्याघ्रपाद वसिष्ठ गोत्रोत्पन्न एक अकिंचन ब्राह्मण । बड़ाभाई
उपमन्यु छोटा धौम्य । माता दोनोंको आटा घोलकर दूध कहकर पिलाती थी । दोनों इसी
पर प्रसन्न थे ।
(7) ८९ परिशिष्ट ४