ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहनुमानजी उस सेतु पर चढे, उछले, कूदे । किंतु कुछ नहीं हुआ । हनुमानजीने अनुभव किया
राम और कृष्ण एक हैं। मैंने पहले जो स्वामीकार्य किया था वही अब यह अर्जुन कर रहा है ।
“हनुमानजीने जब मुझे तुम बुलाओ तब सहायतार्थ आऊंगा !” ऐसा वचन दिया और अर्जुननें
“महाभारतके युद्धमें आप मेरे रथ पर बैठ कर ध्वज संभालिये !” ऐसा वर मांग लिया ! इसलिये
ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं—ध्वज स्तंभपर वानर ।
सारथी स्वयं शांर्गधर—भारत युद्धका जब निश्चय हो गया तब दुर्योधन और अर्जुन दोनों
श्रीकृष्णकी सहायता मांगने गये थे, तब भगवान सो गये थे, । दुर्योधन अपने पदानुसार श्रीकृष्णके
सिरहाने बैठ गया और अर्जुन चरणोंमें । श्रीकृष्णके जागते ही स्वाभाविक ही अर्जुन पर दृष्टि पडी,
फिर दुर्योधन पर । दोनोंने भारत-युद्धमें श्रीकृष्णकी सहायता मांगी । श्रीकृष्णने कहा “अब
मैं वृद्ध हो गया हूं। हाथमें हथियार नहीं उठाता । शस्त्रसंन्यास लिया है। तुम दोनों मेरी
सहायता मांगने आये हो । दोनों मेरे आप्त । आपसमें बांधव । फिर भी आपसमें लड़ रहे
हो । यदि कोई युद्धमें सहायता मांगने क्षत्रियके पास आये तो उनको सहायता देना क्षत्रियका
कर्तव्य है। मैं अपनी शक्तिके दो विभाग करता हूं एक ओर मैं निःशस्त्र कृष्ण दूसरी ओर मेरी
तीन अक्षौहिणी सशस्त्र नारायणी सेना ! इन दोनोंमेंसे जो जिसको चाहिये वह चुन लें । किंतु तुम
दोनोंमें अर्जुन छोटा है । इस लिये मांगनेका प्रथम अधिकार अर्जुनका है ।”
यह सुन कर अर्जुनने कहा “मैं केवल निःशस्त्र श्रीकृष्ण चाहता हूं !” अर्जुनकी मांग सुनकर
दुर्योधन मन ही मन प्रसन्न हुआ । उसने सोचा अर्जुनने आयी हुई स्वर्ण-संधि खोई है । उसने
अत्यंत प्रसन्नतासे तीन अक्षौहिणी नारायणी सेनाका स्वीकार किया । महाभारतके युद्धमें कृतवर्माके
आधिपत्यमें यह सेना पांडवी सेनासे लडी ।
तब श्रीकृष्णने अर्जुनसे पूछा “तू कितना मूर्ख है ! तीन अक्षौहिणी सशस्त्र नारायणी
सेनाको मांगना छोड़कर निःशस्त्र वृद्ध कृष्णहीं मांग लिया ? निःशस्त्र और वृद्ध कृष्ण क्या करेगा ?”
अर्जुनने नम्र होकर कहा “मार्गदर्शन ! सारथ्य !!” इसी बातको लेकर ज्ञानेश्वर महाराज
कहते हैं सारथी स्वयं शांर्गधर ! शांग श्रीकृष्णका धनुष्य है—
जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको ॥ ज्ञा० १-२०० ॥
उन दिनोंमें पाशुपतास्त्र अत्यंत महान अस्त्र था । “जिसके पास पाशुपतास्त्र उनकी विजय
निश्चित !” ऐसी स्थिति थी और पांडव , वनवासके बाद कौरव पांडव युद्ध अनिवार्य हो गया था ।
यह जानकर दूरदृष्टि अर्जुनने पाशुपतास्त्र प्राप्त करनेका निश्चय किया । इसके लिये वह इंद्रकील
पर्वत पर जाकर शिवजीकी आराधना करने लगा ।
शिवजीने अर्जुनकी परीक्षा लेना चाहा । पाशुपतास्त्र जैसे महान विश्वसंहारक अस्त्र देनेके
पहले उसको धारण करने वालेकी “धारणा शक्ति” देखना अत्यंत अवश्य था । शिवजी किरात
बने और शिकारीके रूपमें एक वराहका पीछा करते करते अर्जुनके सामने आये । वराह-पूर्व
संकेतानुसार-झपट्टा मारकर तपस्वी अर्जुनको धक्का देकर-क्षत्रिय अर्जुनको शिकारीमें प्रवृत्त करके
अथवा आव्हान देकर-आगे दौडा । अर्जुनने तुरंत वराह पर शस्त्र चलाया, तभी किरातने भी उस
पर भाला फेंका । वराह अर्जुनके तीर और किरात-शिवजीके भालेसे मृत हुआ और शिवजी और
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