ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
प्रथम उद्योतः ३९
लोचनम्
व्याख्येयम् । तत्स्वरूपशब्दं व्याचक्षाणः संक्षेपेण तावत्पूर्वोदीरितविकल्पपञ्च-
कोद्धरणं सूचयति-सकलेत्यादिना । सकलशब्देन सत्कविशब्देन च प्रकारलेशे
कस्मिंश्चिदिति निराकरोति । अतिरमणीयमिति भाक्ताद्व्यतिरेकमाह । न हि
‘सिंहो वटुः’ ‘गङ्गायां घोषः’ इत्यत्र रम्यता काचित् उपनिषद्भूतशब्देन तु
अपूर्वसमाख्यामात्रकरण इत्यादि निराकृतम् । अणीयसीभिरित्यादिना गुणाल-
ङ्कारानन्तर्भूतत्वं सूचयति । अथ चेत्यादिना ‘तत्समयान्तःपातिन’ इत्यादिना
यत्सामयिकत्वं शङ्कितं तन्निरवकाशीकरोति । रामायणमहाभारतशब्देनादिकवेः
प्रभृति सर्वैरेव सूरिभिरस्यादरः कृत इति दर्शयति । लक्ष्यतामित्यनेन वाचां
स्थितमविषय इति परास्यति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षो लक्षणम् । लक्षणेन निरू-
पयन्ति लक्षयन्ति, तेषां लक्षणद्वारेण निरूपयतामित्यर्थः । सहृदयानामिति । येषां
व्याख्या करते हुए, संक्षेप से, जो पहले पाँच विकल्प कहे जा चुके हैं, उनका निराकरण
सूचित करते हैं—सकल इत्यादि द्वारा । ‘सकल’ शब्द द्वारा और ‘सत्कवि’ शब्द द्वारा
‘किसी प्रकार लेश में’ इसका निराकरण करते हैं । ‘अतिरमणीय’ इस विशेषण द्वारा
‘भाक्त’ से व्यतिरेक ( वैलक्षण्य ) कहा । क्योंकि ‘सिंहो वटुः’ और ‘गङ्गायां घोषः’
इस स्थल में कोई रम्यता नहीं है । ‘उपनिषद्भूत’ इस विशेषण शब्द द्वारा ‘अपूर्व
समाख्या ( ध्वनि यह नया नाम ) मात्र करना’ इत्यादि का निराकरण किया है ।
अणुतर ( अणीयसी ) इत्यादि इस ( बुद्धि के विशेषण ) द्वारा ( ध्वनि का ) गुण और
अलङ्कार में अन्तर्भाव का न होना सूचित करते हैं । ‘और भी’ इत्यादि से ‘उस समय
के होने वाले’ इत्यादि द्वारा जो सामयिक होने की शङ्का की थी उसे निरवकाश करते
हैं । ‘रामायण-महाभारत’ शब्द से यह दिखाते हैं कि आदिकवि से लेकर समस्त
सूरियों ( विद्वानों ) ने इस ध्वनि का आदर किया है । ‘लक्षित करते हुए’ इससे
‘वचनों के अविषय में स्थित’ इसे निराकरण करते हैं । ‘लक्षित करते हैं इससे, अतः
‘लक्ष’ लक्षण है । लक्ष के द्वारा निरूपण करते हैं, लक्षित करते हैं, उनका अर्थात् लक्षण
द्वारा निरूपण करते हुए का । सहृदयों का—। काव्यों के अनुशीलन के अभ्यासवश
जिनके विशदीभूत मन के दर्पण में वर्णनीय वस्तु के साथ तन्मय हो जाने की
कह कर आचार्य ने तीसरे अलक्षणीयतावादी के मत का निराकरण किया । इस प्रकार प्रायः सभी
विप्रतिपत्तियाँ ‘ध्वनिस्वरूप’ के इन विशेषणों द्वारा निराकृत हो जाती हैं ।
१. ‘लक्ष्यताम्’ (‘लक्षित करते हुए’) इस शब्द का अर्थ करते हुए लोचनकार लिखते हैं—
‘लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षो लक्षणम् , लक्षणेन निरूपयन्ति लक्षयन्ति, तेषां लक्षणद्वारेण निरूपयतामित्यर्थः ।’
यहाँ लोचनकार ने ‘करण’ में घञ् करके ‘लक्ष’ को ‘लक्षण’ के अर्थ में लिया है, किन्तु पाणिनीय
शास्त्र के नियम के अनुसार ‘करण’ में ‘घञ्’ नहीं होता है क्योंकि ‘ल्युट्’ उसे बाध लेता है ।
फिर भी इसका साधारण समाधान यह है कि जब महाभाष्यकार ने स्वयं ‘करण’ में ‘घञ्’ बाहुलक
के अनुसार मान लिया है । ऐसी स्थिति में यहाँ भी कोई विशेष त्रुटि नहीं कहीं जा सकती । किन्तु
‘दिव्याञ्जना’ में मेरे पूज्यपाद गुरु जी ( महादेव शास्त्री जी ) ने ‘लक्ष्यताम्’ इसका ही अर्थ ‘निरूप-
यताम्’ करके अगतिकगति ‘बाहुलक’ पक्ष को सुधीजनों के विचारणीय बताया है ।
४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
काव्यानुशीलनाभ्यासवशाद्विशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयीभवनयोग्यता
ते स्वहृदयसंवादभाजः सहृदयाः । यथोक्तम्—
योऽर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भवः ।
शरीरं व्याप्यते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना ॥ इति ॥
आनन्द इति । रसचर्वणात्मनः प्राधान्यं दर्शयन् रसध्वनेरेव सर्वत्र मुख्य-
भूतमात्मत्वमिति दर्शयति । तेन यदुक्तम्—
ध्वनिनीमापरो योऽपि व्यापारो व्यञ्जनात्मकः ।
तस्य सिद्धेऽपि भेदे स्यात्काव्येऽशत्वं न रूपता ॥
इति तदपहस्तितं भवति । तथा ह्यभिधाभावनारसचर्वणात्मकेऽपि त्र्यंशे
काव्ये रसचर्वणा तावज्जीवितभूतेति भवतोऽप्यविवादोऽस्ति । यथोक्तं त्वयैव—
काव्ये रसयिता सर्वो न बोद्धा न नियोगभाक् । इति ।
तद्वस्त्वलङ्कारध्वन्यभिप्रायेणांशमात्रत्वमिति सिद्धसाधनम् । रसध्वन्यभि-
योग्यता हो वे, अपने हृदय के साथ संवाद¹ को भजन करने वाले जन 'सहृदय' हैं।
जैसा कि कहा है—
'जो अर्थ (विभावादि रूप वस्तु) हृदय के साथ संवाद रखने वाला होता है
उसका भाव (भावना) रस की अभिव्यक्ति का कारण होता है। वह (सहृदय के)
शरीर को उस प्रकार व्याप्त कर लेता है जिस प्रकार सूखे काठ को अग्नि।'
आनन्द—। रसचर्वणा रूप प्राधान्य को दिखाते हुए, 'रसध्वनि' का ही सर्वत्र
मुख्य रूप से आत्मत्व है—यह दिखाते हैं। इसलिए जो कि कहा है—
'ध्वनि नाम का जो भी अन्य व्यञ्जनात्मक व्यापार है उसका (अभिधा और
भावना से) भेद सिद्ध होने पर भी उसका काव्य में अंशत्व होगा, रूपता नहीं।'
वह निराकृत हो जाता है, क्योंकि अभिधा, भावना और रसचर्वणा रूप तीन अंश
वाले काव्य में रसचर्वणा प्राणभूत है, यह आपके मत में भी निर्विवाद है। जैसा कि
तुमने ही कहा है—
'काव्य में रस लेने वाले सब हो जाते हैं, पर जानने वाला नहीं होता और आज्ञा-
पालन करने वाला (नियोगभाक्) नहीं होता।'
वस्तु-ध्वनि और अलङ्कार-ध्वनि के अभिप्राय से (उसका) अंशमात्रत्व² है तो
-- १. काव्य को पढ़ते हुए वर्णनीय वस्तु के साथ तन्मयता होने पर ही 'आनन्द' स्थिति आती
', यही 'हृदय का संवाद' है अर्थात् समान हृदय ही सहृदय होता है।
२. आचार्य भट्टनायक ने काव्य के तीन अंश माने हैं--अभिधा, भावना और ध्वनि। उनका
यह तात्पर्य है कि ध्वनि व्यञ्जनात्मक व्यापार है और अभिधा एवं भावना से भिन्न है तथापि उसे
काव्य में 'अंशत्व' ही प्राप्त है 'रूपता' नहीं 'अंशत्व' से अभिप्राय शब्द के एक व्यापार का जो
महत्त्व है वही है और 'रूपता' अर्थात् अंशित्व या आत्मत्व। कहने का तात्पर्य यह कि काव्य में
'ध्वनि' अंशी या आत्मा की स्थिति में आने के योग्य नहीं, बल्कि वह भी एक शब्द का व्यापार है
जैसे अभिधा और भावना शब्द के व्यापार हैं। इस पर लोचनकार यह विचार करते हैं कि यदि
: प्रथम उद्योतः ४१
लोचनम्
प्रायेण तु स्वाभ्युपगमप्रसिद्धिसंवेदनविरुद्धमिति । तत्र कवेस्तावत्कीर्त्यापि
प्रीतिरेव सम्पाद्या । यदाह—‘कीर्तिं स्वर्गफलामाहुः’ इत्यादि । श्रोतॄणां च
व्युत्पत्तिप्रीती यद्यपि स्तः, यथोक्तम्—
धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च ।
करोति कीर्तिं प्रीतिं च साधुकाव्यनिषेवणम् ॥ इति ॥
तथापि तत्र प्रीतिरेव प्रधानम् । अन्यथा प्रभुसंमितेभ्यो वेदादिभ्यो मित्र-
संमितेभ्यश्चेतिहासादिभ्यो व्युत्पत्तिहेतुभ्यः कोऽस्य काव्यरूपस्य व्युत्पत्तिहे-
तोर्जायासंमितत्वलक्षणो विशेष इति प्राधान्येनानन्द एवोक्तः । चतुर्वर्गव्युत्पत्ते-
रपि चानन्द एव पार्यन्तिकं मुख्यं फलम् ।
आनन्द इति च ग्रन्थकृतो नाम । तेन स आनन्दवर्धनाचार्य एतच्छास्त्र-
द्वारेण सहृदयहृदयेषु प्रतिष्ठां देवतायतनादिवदनश्वरीं स्थितिं गच्छत्विति
भावः । यथोक्तम्—
उपेयुषामपि दिवं सन्निबन्धविधायिनाम् ।
आस्त एव निरातङ्कं कान्तं काव्यमयं वपुः ॥ इति ॥
यह (कहना) सिद्धसाधन है। और यदि रसध्वनि के अभिप्राय से है तो अपने ही
मानी हुई प्रसिद्धि रूप सहृदयानुभव संवेदन के विरुद्ध हो जाता है। कवि कीर्ति से भी
प्रीति का ही सम्पादन करता है। जैसा कि कहा है—‘कीर्ति को स्वर्ग रूप फल वाली
कहते हैं’ इत्यादि । और श्रोताओं को व्युत्पत्ति और प्रीति दोनों होती हैं, जैसा कि
कहा है—
‘साधु काव्य के निषेवण से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और कलाओं में कुशलता तथा
कीर्ति और प्रीति फल प्राप्त होते हैं।’
तथापि, वहां प्रीति ही प्रधान है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रभुसम्मित वेदादि
और मित्रसम्मित इतिहासादि, जो व्युत्पत्ति के हेतु हैं, उनसे व्युत्पत्ति के हेतु काव्य
रूप का जायासंमितत्व रूप विशेष क्या रहेगा ? अतः प्रधान रूप से आनन्द ही कहा
है। धर्मादि चारों वर्गों की व्युत्पत्ति का भी आनन्द ही पार्यन्तिक मुख्य फल है।
और, ‘आनन्द’ यह ग्रन्थकार का नाम है। इससे यह भाव है कि वह आनन्द-
वर्धनाचार्य इस शास्त्र के द्वारा सहृदयों के हृदय में प्रतिष्ठा को, अर्थात् देवालय में देवता
की भांति कभी नष्ट न होने वाली शाश्वत स्थिति को, प्राप्त करें। जैसा कि कहा है—
‘स्वर्ग में पहुँचे हुए भी सत्काव्य का निर्माण करने वाले कवियों का, बिना किसी
आतङ्क का, सुन्दर काव्यमय शरीर (प्रतिष्ठित) ही रहता है।’
भट्टनायक ने वस्तुध्वनि और अलङ्कार ध्वनि के अभिप्राय से ‘ध्वनि’ को ‘अंश’ ही माना है अंशी
नहीं, वह तो स्वीकार्य है क्योंकि यह बात पहले से सिद्ध हो चुकी है। किन्तु यदि रसचर्वणा रूप
ध्वनि को मन में रखकर उसके अंशित्व या रूपता (आत्मत्व) का निराकरण करते हैं तो यह
उनके ही स्वीकृत सिद्धान्त के विरुद्ध होता है।
४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
यथा मनसि प्रतिष्ठा एवंविधमस्य मनः, सहृदयचक्रवर्ती खल्वयं ग्रन्थकृ-
दिति यावत् । यथा—'युद्धे प्रतिष्ठा परमार्जुनस्य' इति । स्वनामप्रकटीकरणं
श्रोतृणां प्रवृत्त्यङ्गमेव सम्भावनाप्रत्ययोत्पादनमुखेनेति ग्रन्थान्ते वक्ष्यामः । एवं
ग्रन्थकृतः कवेः श्रोतुश्च मुख्यं प्रयोजनमुक्तम् ॥ १ ॥
ननु 'ध्वनिरूपं ब्रूम' इति प्रतिज्ञाय वाच्यप्रतीयमानाख्यौ द्वौ भेदावर्थस्येति
वाच्याभिधाने का सङ्गतिः कारिकाया इत्याशङ्क्य सङ्गतिं कर्तुमवतरणिकां
जैसे 'मन में प्रतिष्ठा' उसी प्रकार इसका मन है, मतलब यह कि ग्रंथकार तो
सहृदयचक्रवर्ती है । जैसे—'युद्ध में अर्जुन की परम प्रतिष्ठा है'। अपने नाम का
प्रकटीकरण श्रोताओं की प्रवृत्ति का अङ्ग सम्भावना-प्रत्यय उत्पन्न करने के द्वारा है,
यह हम ग्रन्थ के अन्त में कहेंगे । इस प्रकार ग्रन्थकार, कवि और श्रोता का मुख्य
प्रयोजन' कहा गया ॥ १ ॥
'ध्वनि का स्वरूप कहेंगे' यह प्रतिज्ञा करके 'वाच्य और प्रतीयमान ये अर्थ के
दो भेद हैं' इस प्रकार 'वाच्य' के कहने में कारिका की क्या सङ्गति है ? यह आशङ्का
१. यहाँ कवि, श्रोता और ग्रन्थकार तीनों का पार्यन्तिक उद्देश्य या फल प्रीति या आनन्द को
ही आचार्य ने सिद्ध किया है । कारिका में 'प्रीति' शब्द और वृत्ति में 'आनन्द' शब्द का प्रयोग
है । यद्यपि कवि के लिए कीर्ति आदि अनेक फलों का निर्देश किया गया है किन्तु कीर्ति से भी
प्रीति ही कवि के द्वारा सम्पाद्य होती है। वचन भी है—'कीर्ति को स्वर्गरूप फल वाली कहते हैं'
'स्वर्ग' क्या है ? निरतिशय आनन्द, जिस आनन्द से बढ़ कर कोई आनन्द की स्थिति नहीं रह
जाती हो । जो कि श्रोताओं की बात है, उन्हें व्युत्पत्ति (निपुणता) और प्रीति ये दोनों फल प्राप्त
होते हैं, उनमें भी प्रधानता प्रीति को ही है । क्योंकि व्युत्पत्ति तो इतिहास आदि के पढ़ने से भी
प्राप्त हो जाती है । उपदेश तीन प्रकार के माने गये हैं—प्रभुसम्मित, मित्रसम्मित और जाया-
सम्मित । वेद प्रभुसम्मित उपदेश करता है, अर्थात् वेद जो आज्ञा कर दे उसमें तर्क करने का
अवसर ही नहीं रहता जैसे कि स्वामी की आज्ञा में । इतिहास आदि मित्रसम्मित उपदेश करते हैं,
अर्थात् मित्र की भाँति अच्छे बुरे को स्पष्टरूप से निर्देश कर देते हैं और स्वयं निर्णय कर लेने के
लिए छोड़ देते हैं । किन्तु इन सब में विलक्षण काव्य जायासम्मित उपदेशक है, उसकी विशेषता
यह है कि उसके उपदेश में व्युत्पत्ति के साथ प्राधान्य रूप से आनन्द भी रहता है । धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष—इस चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति का भी पार्यन्तिक फल प्रीति या आनन्द ही है ।
साथ ही आचार्य ने ग्रन्थकार का उद्देश्य भी 'आनन्द' इस नाम के प्रकटीकरण से प्रकट कर
दिया । यहाँ ग्रन्थकार का उद्देश्य है कि वह सहृदयजनों के हृदयों में उस प्रकार प्रतिष्ठा या
बहुमान लाभ करे जो किसी देवता के मन्दिर में देवता को प्राप्त होती है । मन्दिर में प्रतिष्ठा तो
शाश्वत नहीं होती किन्तु मन में प्रतिष्ठा निश्चय ही शाश्वत होती है। इस प्रकार जब वह (ग्रन्थकार)
सहृदयजनों के मन में प्रतिष्ठित रहेगा तो उसके इस सम्भावनाप्रत्यय अर्थात् बहुमान के प्रति
विश्वास करके श्रोतृवर्ग अवश्य उसके नाम से प्रवृत्त होगा । इसी उद्देश्य से आचार्य ने प्रस्तुत ग्रंथ
के अन्त में भी अपना नाम स्थापित किया है। प्रायः ऐसा होता है कि लोग परम्परा से जिस
आचार्य के गौरव सुने होते हैं उसी के प्रति उसके नाम से आकृष्ट होकर उसके ग्रन्थ का श्रवण
प्रथम उद्योतः ४३
ध्वन्यालोकः
तत्र ध्वनेरेव लक्षयितुमारब्धस्य भूमिकां रचयितुमिदमुच्यते—
योऽर्थः सहृदयश्लाघ्यः काव्यात्मेति व्यवस्थितः ।
वाच्यप्रतीयमानाख्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ ॥ २ ॥
अब लक्षित करने के लिए आरम्भ किए गए ध्वनि की ही भूमिका रचने के लिए
यह कहते हैं—
'सहृदय जनों के द्वारा प्रशंसनीय जो अर्थ 'काव्य की आत्मा' के रूप में व्यवस्थित
है उसके वाच्य और प्रतीयमान नाम के दो भेद माने गए हैं ॥ २ ॥
लोचनम्
करोति-तत्रेति । एवंविधेऽभिधेये प्रयोजने च स्थित इत्यर्थः । भूमिरिव
भूमिका । यथा अपूर्वनिर्माणे चिकीर्षिते पूर्वं भूमिर्विरच्यते, तथा ध्वनिवरूपे
प्रतीयमानाख्ये निरूपयितव्ये निर्विवादसिद्धवाच्याभिधानं भूमिः । तत्पृष्ठेऽधि-
कप्रतीयमानांशोल्लिखनात् । वाच्येन समशीर्षिकया गणनं तस्याप्यनपह्नव-
नीयत्वं प्रतिपादयितुम् । स्मूतावित्यनेन 'यः समाम्नातपूर्व' इति द्रढयति ।
'शब्दार्थशरीरं काव्यम्'ति यदुक्तं, तत्र शरीरग्रहणादेव केनचिदात्मना तद-
नुप्राणकेन भाव्यमेव । तत्र शब्दस्तावच्छरीरभाग एव सन्निविशते सर्वजन-
संवेद्यधर्मत्वात्स्थूलकृशादिवत् । अर्थः पुनः सकलजनसंवेद्यो न भवति । न
ह्यर्थमात्रेण काव्यव्यपदेशः, लौकिकवैदिकवाक्येषु तदभावात् । तदाह-सहृदय-
करके सङ्गति करने के लिए अवतरणिका देते हैं—अब—। अर्थात् इस प्रकार के
अभिधेय और प्रयोजन के स्थित होने पर । भूमि के समान = भूमिका । जैसे अपूर्व (वस्तु)
का निर्माण करना चाहें तो पहले भूमि बना ली जाती है, वैसे प्रतीयमान नायक
ध्वनि-स्वरूप का निरूपण करिष्यमाण होने पर, उसके लिए निर्विवाद सिद्ध वाच्य का
कथन यहां भूमि है, क्योंकि उस ( वाच्य ) की पीठ पर अधिक प्रतीयमान का उल्लेखन
होगा । वाच्य के साथ बराबरी के सिरे से गणन का उद्देश्य है उसके अनपह्नवनीयत्व
का प्रतिपादन । ( कारिका में ) 'स्मृतौ' इससे 'पहले कहे गए हैं' (यः समाम्नात-पूर्वः)
इसे दृढ़ करते हैं। जैसा कि कहा है 'शब्द और अर्थ काव्य के शरीर हैं'; उसके
अनुसार शरीर ग्रहण से ही उसे अनुप्राणित करने वाले किसी आत्मा को होना ही
चाहिए । ऐसी स्थिति में, शब्द तो शरीर के भाग में ही सन्निवेश प्राप्त करता है
क्योंकि ( वह ) स्थूल और कृश आदि ( शरीर ) की भाँति सभी लोगों द्वारा संवेद्य है ।
अर्थ सभी लोगों द्वारा संवेद्य नहीं होता । न कि अर्थ मात्र से काव्य का व्यपदेश
( व्यवहार ) होता है, क्योंकि लौकिक और वैदिक वाक्यों में वह ( काव्य का व्यपदेश )
नही होता । इस लिए कहते हैं—सहृदय जनों द्वारा प्रशंसनीय— । वह एक ही अर्थ
करते हैं । इसीलिए ग्रन्थकार अपना नाम दिया करते हैं । इस प्रकार ग्रन्थकार, कवि और श्रोता
का मुख्य प्रयोजन आनन्द कहा गया ।
४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
श्लाघ्य इति। स एक एवार्थो द्विशाखतया विवेकिभिर्विभागबुद्ध्या
विभज्यते ।
तथाहि-तुल्येऽर्थरूपत्वे किमिति कस्मैचिदेव सहृदयाः श्लाघन्ते। तद्भवित-
तव्यं तत्र केनचिद्विशेषेण। यो विशेषः, स प्रतीयमानभागो विवेकिभिर्विशेष-
हेतुत्वादात्मेति व्यवस्थाप्यते । वाच्यसंवलनाविमोहितहृदयैस्तु तत्पृथग्भावे
विप्रतिपद्यते, चार्वाकैरिवात्मपृथग्भावे। अत एव अर्थ इत्येकतयोपक्रम्य सहृद-
यश्लाघ्य इति विशेषणद्वारा हेतुमभिधायापोद्धारदृशा तस्य द्वौ भेदावंशावित्यु-
क्तम्, न तु द्वावप्यात्मानौ काव्यस्येति ।
दो शाखाओं (अंशों) वाला होने के कारण विवेचनशील लोगों द्वारा विभाग-बुद्धि से
विभाजित किया जाता १ है।
जैसा कि—दोनों का अर्थरूप होना समान है तब क्यों किसी एक के लिए सहृदय
जन प्रशंसा करते हैं? अतः, वहाँ किसी विशेष को होना चाहिए। जो विशेष है वह
प्रतीयमान भाग, विशेष होने के कारण विवेकी लोगों द्वारा आत्मा के रूप में
व्यवस्थापित किया जाता है। वाच्य अर्थ की संवलना (वासना) से विमोहित
हृदय वाले लोग उस (प्रतीयमान) के अलग होने में विप्रतिपत्ति करते हैं, जिस प्रकार
चार्वाक लोग आत्मा को (शरीर से) अलग मानने में। अत एव 'अर्थः' इस एकवचन
के रूप से उपक्रम करके 'सहृदयश्लाघ्य' (सहृदय जनों द्वारा प्रशंसनीय) इस विशेषण
द्वारा हेतु कहकर विभाग (अपोद्धार) की दृष्टि से उसके दो भेद अर्थात् अंश हैं, यह
कहा है; न कि काव्य के दोनों ही अर्थ आत्मा हैं।
१. प्रस्तुत 'कारिका' साधारण विचार वालों को भ्रम में डाल देने वाली है। कुछ लोग भ्रम में
पड़ कर समझ जाते हैं कि आचार्य ने यहाँ 'ध्वनि' का ही भेद करना आरम्भ कर दिया है, फिर
यह सोच कर और भी परेशानी होती है कि ध्वनि का भेद है तो 'वाच्य' अर्थ ध्वनि के भेद के
अन्तर्गत कैसे आ सकता है? इस भ्रम का निवारण 'लोचन' में बड़ी योग्यता से किया गया है।
लोचनकार का कहना है कि यहाँ ग्रन्थकार अपने साध्य प्रतीयमान अर्थ को निर्विवाद सिद्ध वाच्य
अर्थ की सामान्य कोटि में लाकर प्रतीयमान का भी वाच्य अर्थ की भाँति 'अनपह्नवनीयत्व'
(प्रतिषेधनीयत्व) प्रतिपादन करना चाहते हैं। शब्द और अर्थ को काव्य का शरीर माना गया है,
ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि उस काव्य-शरीर का कोई आत्मा भी हो। शब्द और अर्थ में
अर्थ की अपेक्षा शब्द अधिक स्थूल होता है, इसलिए साधारण लोग भी उसे जान लेते हैं किन्तु
अर्थ को साधारण लोग नहीं समझ पाते। किन्तु केवल अर्थ के आधार पर कभी किसी रचना को
'काव्य' नहीं कहा गया है इसलिए अपेक्षित है कि वह अर्थ 'सहृदयजनों के द्वारा प्रशंसा के योग्य'
हो--सहृदयश्लाघ्य हो। इस प्रकार सामान्य अर्थ और सहृदयश्लाघ्य अर्थ का भेद हर विचारशील
व्यक्ति समझ सकता है। इसीलिए आचार्य ने एक ही अर्थ को दो भागों में विभक्त किया। किन्तु
अर्थ की दृष्टि से वाच्य और प्रतीयमान दोनों एक होने पर भी जहाँ तक सहृदयश्लाघ्यत्व की बात
है उसके अनुसार काव्य की आत्मा प्रतीयमान अर्थ ही होगा, वाच्य अर्थ नहीं। कुछ लोग
अवश्य यह विप्रतिपत्ति खड़ी कर सकते हैं कि प्रतीयमान अर्थ ही क्यों, वाच्य अर्थ भी सहृदयश्लाघ्य
हो सकता है ? जिस प्रकार चार्वाकों ने शरीर को लेकर ही पृथक् आत्मा स्वीकार करने का वाद
प्रथम उद्योतः ४५
ध्वन्यालोकः
काव्यस्य हि ललितोचितसन्निवेशचारुणः शरीरस्येवात्मा सार-
रूपतया स्थितः सहृदयश्लाघ्यो योऽर्थस्तस्य वाच्यः प्रतीयमानश्चेति
द्वौ भेदौ।
ललित और उचित सन्निवेश के कारण चारु काव्य का, शरीर की आत्मा की
भाँति, सार रूप में स्थित होकर सहृदय जनों द्वारा प्रशंसा के योग्य जो अर्थ है,
उसके वाच्य और प्रतीयमान, ये दो भेद हैं।
लोचनम्
कारिकाभागगतं काव्यशब्दं व्याकर्तुमाह—काव्यस्य हीति। ललितशब्देन
गुणालङ्कारानुग्रहमाह। उचितशब्देन रसविषयमेवौचित्यं भवतीति दर्शयन्
रसध्वनेर्जीवितत्वं सूचयति। तदभावे हि किमपेक्षयेदमौचित्यं नाम सर्वत्रोद्घो-
ष्यत इति भावः। योऽर्थ इति यदानुवदन् परेणाप्येतत्तावदभ्युपगतमिति दर्श-
यति। तस्येत्यादिना तदभ्युपगम एव द्वयंशत्वे सत्युपपद्यत इति दर्शयति।
तेन यदुक्तम्-‘चारुत्वहेतुत्वाद् गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो न ध्वनिः' इति, तत्र
ध्वनेरात्मस्वरूपत्वाद्वेतुरसिद्ध इति दर्शितम्। न ह्यात्मा चारुत्वहेतुर्देहस्येति
कारिका-भाग में आए हुए 'काव्य' शब्द को व्याकृत करने के लिए कहते हैं—
काव्य का—। 'ललित' शब्द से गुण और अलङ्कार का अनुग्रह (सहायकत्व) कहा
है। 'उचित' शब्द से रसविषयक ही औचित्य होता है यह दिखाते हुए रसध्वनि का
जीवितत्व सूचित करते हैं। भाव यह कि उस (रस) के अभाव में किस अपेक्षा से
इस औचित्य को सब जगह उद्घोषित करते हैं? 'योऽर्थः' यह 'यत्' शब्द द्वारा
अनुवाद करते हुए यह दिखाते हैं कि दूसरे ने भी इसे माना है। 'तस्य' इत्यादि
द्वारा उसका स्वीकार (अभ्युपगम) ही दो अंशों के होने पर उपपन्न हो सकता है,
यह दिखाते हैं। उस कारण जो कि कहा है—'चारुत्व के हेतु होने के कारण ध्वनि,
गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त (पृथक्) नहीं है'; वहाँ यह दिखा दिया कि
'ध्वनि' के आत्मस्वरूप होने के कारण हेतु असिद्ध है। आत्मा शरीर के चारुत्व का
खड़ा किया था। इस प्रकार प्रस्तुत कारिका में आचार्य ने 'अर्थ' के रूप में उपक्रम करके 'सहृदय-
श्लाघ्य' इस विशेषण 'विभाग' की दृष्टि से उस अर्थ के दो भेद बताये हैं न कि यह कहा है कि
काव्य के दो आत्मा हैं।
१. यह 'काव्यलक्ष्मविधायिभिः' इस वृत्तिभाग का अनुवाद है। कुछ संस्करणों में इसे कारिका-
भाग ही मानकर छापा है किन्तु 'लोचन' के अनुसार यह वृत्तिभाग है और 'ततो नेह प्रतन्यते' यह
कारिका भाग।
ललित और उचित सन्निवेश से चारु काव्य—काव्य में ललित सन्निवेश की सिद्धि गुण और
अलङ्कार के अनुग्रह से सम्भव होती है और उचित सन्निवेश तब बनता है जब 'रस' की स्थिति
अनुकूल होती है। इसी से प्रकट होता है कि रसध्वनि आत्मा है, क्योंकि रस का औचित्य रस के
४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्र वाच्यः प्रसिद्धो यः प्रकारैरुपमादिभिः ।
बहुधा व्याकृतः सोऽन्यैः—
काव्यलक्ष्मविधायिभिः ।
—ततो नेह प्रतन्यते ॥ ३ ॥
केवलमनूद्यते पुनर्यथोपयोगमिति ॥ ३ ॥
अब जो वाच्य अर्थ उपमा आदि के प्रकारों से प्रसिद्ध है उसे अन्य लोगों ने
बहुधा व्याख्यान किया है।
काव्य के लक्षणकारों ने ।
उसकारण से यहाँ विस्तार नहीं करते हैं ॥ ३ ॥
केवल फिर उपयोग के अनुसार अनूदित करेंगे ॥ ३ ॥
लोचनम्
भवति । अथाप्येवं स्यात्तथापि वाच्येऽनैकान्तिको हेतुः । न ह्यलङ्कार्य एवाल-
ङ्कारः, गुणी एव गुणः । एतदर्थमपि वाच्यांशोपक्षेपः । अत एव वक्ष्यति—
‘वाच्यः प्रसिद्धः’ इति ॥ २ १॥
तत्रेति । द्व्यंशत्वे सत्यपीत्यर्थः । प्रसिद्ध इति । वनितावदनोद्यानेन्दूदया-
दिलौकिक एवेत्यर्थः । ‘उपमादिभिः प्रकारैः स व्याकृतो बहुधे’ति सङ्गतिः ।
अन्यैरिति कारिकाभागं काव्येत्यादिना व्याचष्टे । ‘ततो नेह प्रतन्यत’ इति
विशेषप्रतिषेधेन शेषाभ्यनुज्ञेति दर्शयति—केवलमित्यादिना ॥ ३ ॥
हेतु नहीं होता है । अगर ऐसा हो भी जाता है तथापि वाच्य में हेतु १व्यभिचारी
(अनैकान्तिक) है, क्योंकि अलङ्कार्य ही अलङ्कार नहीं होता । गुणी ही गुण नहीं
होता । इस लिए भी वाच्य-अंश का त्याग है । अत एव कहेंगे—, वाच्य अर्थ
प्रसिद्ध है’ ॥ २ ॥
अब— । अर्थात् दो अंशों वाला होने पर भी । प्रसिद्ध— । अर्थात् वनिता का
मुख, उद्यान, चन्द्रोदय आदि लौकिक ही । ‘उपमादि प्रकारों से वह बहुत प्रकार
व्याकृत है’ यह सङ्गति है । ‘अन्य’ इस कारिका-भाग की ‘काव्य०’ इत्यादि द्वारा
व्याख्या करते हैं । ‘उस कारण उसका यहाँ विस्तार नहीं करते हैं’ इस प्रकार विशेष के
प्रतिषेध द्वारा शेष की अभ्यनुज्ञा (अनुवाद) है, यह दिखाते हैं—केवल० इत्यादि ॥ ३ ॥
प्राधान्य में ही बन सकता है, अन्यथा जो ध्वनि नहीं स्वीकार करते हैं किसकी अपेक्षा करके
औचित्य का उद्घोष करेंगे ? उनके यहाँ तो रस ही नहीं है ।
१. यहाँ भी वही प्रश्न है कि जब कारिका में वाच्य और प्रतीयमान दोनों एक अर्थ के भेद हैं
फिर यह क्या कि वाच्य को काव्य की आत्मा की सीमा से बाहर कर देते हैं ? इसका समाधान पहले
दिया जा चुका है, यहाँ केवल यह कहना है कि जो पहले अभाववाद के प्रसंग में चारुत्व का हेतु
प्रथम उद्योतः ४७
ध्वन्यालोकः
प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् ।
यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥४॥
प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वाच्याद्वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् ।
यत्तत्सहृदयसुप्रसिद्धं प्रसिद्धेभ्योऽलङ्कृतेभ्यः प्रतीतेभ्यो वाऽवयवेभ्यो
व्यतिरिक्तत्वेन प्रकाशते लावण्यमिवाङ्गनासु । यथा ह्यङ्गनासु लावण्यं
पृथङ्निर्वर्ण्यमानं निखिलावयवव्यतिरिक्तं किमप्यन्यदेव सहृदयलोचना-
मृतं तत्त्वान्तरं तद्वदेव सोऽर्थः ।
महाकवियों के वचनों में प्रतीयमान कुछ और ही वस्तु है, जो वह प्रसिद्ध
अवयवों से अतिरिक्त रूप में स्त्रियों में लावण्य की भाँति विशेष भासित होता है ॥४॥
प्रतीयमान ( अर्थ ) महाकवियों के वचनों में पुनः कोई अन्य ही वस्तु है ।
सहृदय जनों में सुप्रसिद्ध जो वह प्रसिद्ध अर्थात् अलङ्कृत अथवा प्रतीत अवयवों
से सर्वथा अतिरिक्त रूप में स्त्रियों में लावण्य की भाँति प्रकाशित है । जैसे स्त्रियों
में लावण्य पृथक् होकर दिखाई देता हुआ, सारे अङ्गों से व्यतिरेक ( पार्थक्य )
रखने वाला, कोई दूसरा ही सहृदय जनों की आँखों का अमृत, एक तत्त्व है उसी
प्रकार वह ( प्रतीयमान ) अर्थ है ।
लोचनम्
अन्यदेव वस्त्विति । पुनःशब्दो वाच्याद्विशेषद्योतकः । तद्व्यतिरिक्तं सारभूतं
चेत्यर्थः । महाकवीनामिति बहुवचनमशेषविषयव्यापकत्वमाह । एतदभिधास्य-
दूसरी ही वस्तु— । 'पुनः' शब्द वाच्य से विशेष का द्योतक है, अर्थात् ( प्रतीयमान
अर्थ ) उस ( वाच्य ) से व्यतिरिक्त और सारभूत है । 'महाकवियों की' यहाँ बहुवचन
सारे विषयों में ( प्रतीयमान का ) व्यापकत्व बताता है । भाव यह कि जिसकी चर्चा
होने के कारण ध्वनि गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त नहीं है । यह बात तो ध्वनि के आत्मा सिद्ध
होते ही स्वयं खण्डित हो गई, क्योंकि आत्मा कभी शरीर का चारुत्वहेतु नहीं हो सकता । यदि
किसी प्रकार मान भी लिया जाय तो भी यहाँ वाच्य अंश को तो छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि शरीरभूत
वाच्य अर्थ अलङ्कार्य एवं गुणी होने से स्वयं किसी प्रकार अलंकार और गुण की कोटि में नहीं लाया
जा सकता, अर्थात् वाच्य के अंश में चारुत्वहेतु रूप हेतु अनैकान्तिक (अर्थात् व्यभिचारी) हो जाता
है, कहने का मतलब यह कि वाच्य को चारुत्व का हेतु बना कर गुण अथवा अलङ्कार के अन्तर्गत
नहीं लाया जा सकता, क्योंकि वह स्वयं अलङ्कार्य एवं गुणी है । न्याय शास्त्र के अनुसार हेतु
व्यभिचारी तभी होता है जब वह वहाँ भी चला जाय जहाँ साध्य का अभाव है, प्रस्तुत में वाच्य
गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है, किन्तु हेतु चारुत्वहेतुत्व प्रतीयमान के साथ सम्बद्ध होने के
कारण वाच्य में भी प्राप्त है । कहने का तात्पर्य यह कि किसी प्रकार वाच्य को प्रतीयमान के सम-
कोटिक नहीं बनाया जा सकता ।
४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
मानप्रतीयमानानुप्राणितकाव्यनिर्माणनिपुणप्रतिभाभाजनत्वेनैव महाकवि-
व्यपदेशो भवतीति भावः । यदेवंविधमस्ति तद्भाति । न ह्यत्यन्तासतो भानमुप-
पन्नम्; रजताद्यपि नात्यन्तमसद्भाति । अनेन सत्त्वप्रयुक्तं तावद्भानमिति
भानात्सत्त्वमवगम्यते । तेन यद्भाति तदस्ति तथेत्युक्तं भवति । तेनायं
प्रयोगार्थः—प्रसिद्धं वाच्यं धर्मि, प्रतीयमानेन व्यतिरिक्तेन तद्वत्, तथा
भासमानत्वात् लावण्योपेताङ्गनाङ्गवत् । प्रसिद्धशब्दस्य सर्वप्रतीतत्वमलङ्कृ-
आगे की जायगी उस प्रतीयमान अर्थ से अनुप्राणित काव्य के निर्माण में निपुण प्रतिभा
का भाजन होने के कारण ही 'महाकवि' यह व्यपदेश (नाम) होता है। जिस कारण
वह (प्रतीयमान) अर्थ इस प्रकार का (व्यतिरिक्त एवं सारभूत) है उस कारण प्रकाशित
होता है। क्योंकि जो बिलकुल असत् है उसका भान उपपन्न नहीं, रजत आदि भी अत्यन्त
असत् होकर भासित नहीं होता। इस कारण भान वस्तु के अस्तित्व से प्रयुक्त होता है।
इस प्रकार भान से (प्रतीयमान) का सत्त्व (अस्तित्व) अवगत होता है। इससे यह
कहा गया कि जो प्रकाशित होता है वह उस प्रकार है। इसलिए यह प्रयोग रूप अर्थ
हुआ—प्रसिद्ध जो वाच्य धर्मी है वह अपने से व्यतिरिक्त प्रतीयमान से युक्त है, क्योंकि
वह उस प्रकार भासित होता है, जैसे लावण्य से युक्त अङ्गना का अङ्ग। 'प्रसिद्ध' शब्द
का अर्थ 'सबको प्रतीत होना' तथा 'अलंकृत होना' है। जो' वह— । यह दो
१. प्रस्तुत में आचार्य के सामने प्रतीयमान को 'सत्' सिद्ध करना है। जब कि आचार्य ने उसे
'सत्' सिद्ध करने के लिए उसका 'भान' होना ही प्रमाण बताया तब उनके सामने यह प्रश्न
उपस्थित हुआ कि वह प्रतीयमान, जिसका 'भान' हो रहा है, क्या कोई अपने अस्तित्व की पुष्टि
में कोई अपना दृष्टान्त भी रखता है ? इस प्रश्न के समाधान में आचार्य ने कामिनियों के अङ्ग के
लावण्य को प्रतीयमान का दृष्टान्त बनाया उनका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार लावण्य कामिनी के
अङ्ग से अपृथग्भूत रहते हुए भी उससे भिन्न और कुछ विशेष चमत्कार की वस्तु सा प्रतीत होता
है वही स्थिति यहाँ प्रतीयमान अर्थ की है, जो महाकवियों की वाणियों में वाच्य से कुछ अतिरिक्त
ही भासित होता है। 'लावण्य' को केवल देख कर समझा जा सकता है, उसे व्यक्त करने के लिए
किसी शब्द में सामर्थ्य नहीं, इसी लिए आचार्य ने उसके लिए दो सर्वनाम 'यत्-तत्' ('जो-वह')
का प्रयोग किया और वृत्ति ग्रन्थ में 'किमपि' ('कुछ') के द्वारा उसकी व्याख्या की। इससे
आचार्य को दो बातें लोचनकार के अनुसार अभिप्रेत है। एक तो यह कि जिस प्रकार लावण्य
शब्द के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता, अर्थात् उसका व्यपदेश नहीं किया जा सकता,
उसी प्रकार प्रतीयमान भी वस्तुतः अव्यपदेश्य तत्त्व है (यह ध्यान रखना चाहिए कि यह बात
'रसध्वनि' के अभिप्राय से कही गयी है)। दूसरे, आचार्य यह निर्देश करना चाहते हैं कि जिस
प्रकार अङ्गना के अङ्ग और लावण्य में लोगों को सामान्यतः अव्यतिरेक या अभेद का भ्रम हो जाता
है उसी प्रकार वाच्य और प्रतीयमान में भी लोग भेदबुद्धि खो बैठते हैं और दोनों को एक ही
समझने लगते हैं। इन दोनों बातों में प्रतीयमान को 'अव्यपदेश्य' निर्दिष्ट करने का लाभ यह
है कि प्रतीयमान अर्थ लावण्य की भाँति ही एक चमत्कार सार तत्त्व है, बस उसे अनुभव ही किया
जा सकता है।
तत्त्वं चार्थः । यत्तदिति सर्वनामसमुदायश्चमत्कारसारताप्रकटीकरणार्थमव्य-
पदेश्यत्वमन्योन्यसंवलनाकृतं चाव्यतिरेकभ्रमं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्दर्शयति ।
एतच्च किमपीत्यादिना व्याचष्टे । लावण्यं हि नामावयवसंस्थानाभिव्यङ्ग्यमव-
यवव्यतिरिक्तं धर्मान्तरमेव । न चावयवानामेव निर्दोषता वा भूषणयोगो वा
लावण्यम्, पृथङ्निर्वर्ण्यमानकाणादिदोषशून्यशरीरावयवयोगिन्यामप्यलङ्कृ-
तायामपि लावण्यशून्येयमिति, अतथाभूतायामपि कस्याञ्चिल्लावण्यामृत-
चन्द्रिकेयमिति सहृदयानां व्यवहारात् ।
ननु लावण्यं तावद् व्यतिरिक्तं प्रथितम् । प्रतीयमानं किं तदित्येव न
जानीमः, दूरे तु व्यतिरेकप्रथेति । तथा भासमानत्वमसिद्धो हेतुरित्याशङ्क्य
स ह्यर्थे इत्यादिना स्वरूपं तस्याभिधत्ते । सर्वेषु चेत्यादिना च व्यतिरेकप्रथां
सर्वनामों का ( प्रतीयमान अर्थ का ) चमत्कार का सार होना प्रकट करने के लिए
व्यपदेश ( नामकरण ) की अशक्यता एवं परस्पर मिश्रण से उत्पन्न ( वाच्य और
व्यङ्ग्य तथा अङ्गना का अङ्ग और लावण्य ) दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में अव्यतिरेक
( अभेद ) का भ्रम दिखाता है । और इसे 'कुछ' इत्यादि द्वारा व्याख्यान करते हैं ।
'लावण्य'१ तो वह धर्म-विशेष ही है जो अवयवों के संघटन ( संस्थान ) से अभिव्यक्त
होकर अवयवों से व्यतिरिक्त ( पृथक् ) रहता है । अवयवों की निर्दोषता ही अथवा
उनका भूषणों से संयोग 'लावण्य' नहीं है, क्योंकि जो पृथक् दिखाई देते हुए काणत्व
आदि दोषों से शून्य स्त्री में सहृदय लोगों का व्यवहार 'यह लावण्यशून्य है' यह होता
है और जो उस प्रकार की नहीं है उस किसी स्त्री में ( उनका यह व्यवहार होता है
कि ) यह लावण्यरूपी अमृत की चन्द्रिका है ।
लावण्य तो ( अङ्गों से ) व्यतिरिक्त रूप में प्रसिद्ध है, ( किन्तु ) वह प्रतीयमान
क्या है, यही नहीं जानते, व्यतिरेक ( भेद ) की स्थिति तो दूर रहे ! उस प्रकार
भासमानत्व रूप हेतु असिद्ध२ है, यह आशङ्का करके 'वह अर्थ' इत्यादि द्वारा उस
( प्रतीयमान ) अर्थ का स्वरूप कहते हैं । 'और सब उनके प्रकारों में' इत्यादि द्वारा
१. 'लावण्य' के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध श्लोक यहाँ स्मरणीय है—
मुक्ताफलेषु च्छायायास्तरळत्वमिवान्तरा ।
प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥
अर्थात् मुक्ताओं में जो छाया की तरलता की भाँति अङ्गों में कुछ झलकता या दिपता
हुआ मालूम पड़ता है वह 'लावण्य' कहलाता है।
२. ऊपर प्रतीयमान अर्थ की सिद्धि के लिए 'भासमानत्व' को 'हेतु' दिया गया है, अर्थात्
प्रतीयमान अर्थ इसलिए है क्योंकि वह भासित होता है, किन्तु हम यदि यहाँ यह कहें कि यह हेतु
'असिद्ध' है, अर्थात् प्रतीयमान अर्थ की सिद्धि इससे नहीं होगी ऐसी स्थिति में क्या समाधान है ?
न्याय-शास्त्र में 'हेतु' के पाँच दोष बताये गये हैं जिनमें 'असिद्धि' भी एक दोष है । पाँच दोषों में
किसी एक की भी हेतु में शङ्का मात्र के हो जाने पर उस 'हेतु' से साध्य का निर्णय नहीं किया
जा सकता ।
४ ध्व०
५० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
साधयिष्यति। तत्र प्रतीयमानस्य तावद् द्वौ भेदौ—लौकिकः, काव्यव्यापारै-
कगोचरश्चेति। लौकिको यः स्वशब्दवाच्यतां कदाचिदधिशेते, स च विधि-नि-
षेधाद्यनेकप्रकारो वस्तुशब्देनोच्यते। सोऽपि द्विविधः—यः पूर्वं क्वापि
वाक्यार्थेऽलङ्कारभावमुपमादिरूपतयान्वभूत्, इदानीं त्वनलङ्काररूप एवान्यत्र
गुणीभावाभावात्, स पूर्वप्रत्यभिज्ञानबलादलङ्कारध्वनिरिति व्यपदिश्यते
ब्राह्मणश्रमणन्यायेन। तद्रूपताभावेन तूपलक्षितं वस्तुमात्रमुच्यते। मात्रग्रहणेन
हि रूपान्तरं निराकृतम्। यस्तु स्वप्नेऽपि न स्वशब्दवाच्यो न लौकिकव्यव-
हारपतितः, किं तु शब्दसमर्प्यमाणहृदयसंवादसुन्दरविभावानुभावसमुचितप्रा-
ग्विनिविष्टरत्यादिवासनानुरागसुकुमारस्वसंविदानन्दचर्वणाव्यापाररसनीयरूपो
रसः, स काव्यव्यापारैकगोचरो रसध्वनिरिति, स च ध्वनिरेवेति, स एव
मुख्यतयात्मेति।
व्यतिरेक की स्थिति को सिद्ध करेंगे। प्रतीयमान के दो भेद हैं—लौकिक और
काव्यव्यापारैकगोचर। लौकिक वह है जो कभी स्वशब्दवाच्य होने की स्थिति को
प्राप्त करता है; वह विधि-निषेध आदि अनेक प्रकार का होता और 'वस्तु' शब्द
से कहा जाता है। वह भी दो प्रकार का है—जो पहले (वाच्य की अवस्था में)
किसी वाक्यार्थ में उपमादिरूप से अलङ्कारभाव को प्राप्त हुआ; इस समय (व्यङ्ग्य
होने की अवस्था में) अलङ्काररूप नहीं ही है, क्योंकि अन्यत्र (वाक्यार्थ में) जो
उसका गुणीभाव हो जाता था वह नहीं होता। वह पूर्व प्रत्यभिज्ञान (पूर्व ज्ञात का
पुनः ज्ञान) के बल से 'अलङ्कारध्वनि' के नाम से 'ब्राह्मणश्रमणन्याय'१ के अनुसार
व्यपदिष्ट होता है। उस रूप के (अलङ्काररूप के) अभाव से उपलक्षित वह 'वस्तुमात्र'
कहा जाता है। ('वस्तु' के साथ) 'मात्र' को ग्रहण करके दूसरे (अलङ्कार) रूप का
निराकरण किया है। जो स्वप्न में भी स्वशब्द से वाच्य नहीं होता और लौकिक के
अन्तर्गत नहीं आता। किन्तु शब्दों द्वारा समर्प्यमाण और सहृदयों के हृदय से संवाद
(संगति) रखने के कारण सुन्दर विभाव-अनुभाव उनकी समुचित एवं पहले से
(आत्मा में विशेषरूप से) रहनेवाली रत्यादि वासनाओं के अनुराग (उद्बोध) के
द्वारा सुकुमार एवं सहृदय की संवित् (मन) का, आनन्दमय चर्वणारूप व्यापार के
१. ब्राह्मणश्रमणन्याय—ब्राह्मण जाति का कोई व्यक्ति जब श्रमण अर्थात् बौद्ध भिक्षु बन जाता
है तब वह 'ब्राह्मण' नहीं रह जाता, फिर भी पूर्वज्ञान (प्रत्यभिज्ञान) के बल से उसे 'ब्राह्मण' कहते
हैं। यही प्रस्तुत न्याय का अभिप्राय है। प्रस्तुत में 'अलङ्कारध्वनि' इस व्यपदेश को लेकर प्रश्न यह
उपस्थित हुआ कि जब प्रतीयमान उपमादिरूप से पहले कहीं वाच्य होकर भी अब वही चमत्कारी
होने के कारण वाच्य की अपेक्षा प्रधान हो जाता है ऐसी स्थिति में वह किसी का अलङ्कार न होकर
स्वयं अलङ्कार्य की स्थिति में पहुँच जाता है, फिर उसे 'अलङ्कारध्वनि' के नाम से क्यों व्यपदिष्ट
किया जाता है? प्रस्तुत 'ब्राह्मणश्रमण' न्याय इसी प्रश्न का समाधान है। कहने का तात्पर्य यह कि
वह प्रधानभूत अलङ्कार्य ही यहाँ पूर्वप्रत्यभिज्ञान के बल से 'अलङ्कार' कहा गया है।
प्रथम उद्योतः ५१
ध्वन्यालोकः
स ह्यर्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तं वस्तुमात्रमलंकाररसादयश्चेत्यनेक-
प्रभेदप्रभिन्नो दर्शयिष्यते। सर्वेषु च तेषु प्रकारेषु तस्य वाच्यादन्यत्वम्।
तथा ह्याद्यस्तावत्प्रभेदो वाच्याद् दूरं विभेदवान् । स हि कदाचिद्वाच्ये
विधिरूपे प्रतिषेधरूपः । यथा—
वह अर्थ वाच्य के सामर्थ्य से वस्तुमात्र, अलङ्कार और रस आदि के, आक्षिप्त
होकर अनेक प्रभेदों से प्रभिन्न रूप में दिखाया जायगा । और समस्त उन प्रकारों में
वह वाच्य से अतिरिक्त है । जैसा कि पहला प्रभेद वाच्य से बहुत दूर तक का भेद
रखने वाला है । क्योंकि वह कभी वाच्य अर्थ के विधि रूप होने पर प्रतिषेध रूप
होता है । जैसे—
लोचनम्
यदूचे भट्टनायकेन—'अंशत्वं न रूपता' इति, तद्वस्त्वलङ्कारध्वन्योरेव यदि
नामोपालम्भः, रसध्वनिस्तु तेनैवात्मतयाङ्गीकृतः, रसचर्वणात्मनस्तृतीयांश-
शस्याभिधाभावनांशद्वयोत्तीर्णत्वेन निर्णयात्, वस्त्वलङ्कारध्वन्यो रसध्वनिपर्य-
न्तत्वमेवेति वयमेव वक्ष्यामस्तत्र तत्रेत्यास्तां तावत् । वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तमिति
द्वारा रसन ( आस्वादन ) के योग्य रस¹ है । काव्य के व्यापार का एकमात्र गोचर
'रसध्वनि' है और वह ध्वनि ही ( ध्वनिमात्र ) है, वही मुख्यरूप से आत्मा है ।
जो कि भट्टनायक ने कहा है—'अंशत्व है रूपता² नहीं' यदि वह वस्तुध्वनि और
१. 'आगे 'रस' का विशद् रूप से सैद्धान्तिक विवेचन होगा, किन्तु प्रस्तुत 'रसध्वनि' के प्रसंग
में 'रस' का सामान्य रूप आचार्य अभिनवगुप्त ने एक ही 'समास' में व्यक्त कर दिया है । यहाँ
प्रयुक्त 'शब्दसमर्प्यमाण', 'हृदयसंवाद', 'सुन्दर', 'विभावानुभावसमुचित', 'प्राग्विनिविष्टरत्यादि-
वासनानुराग', 'सुकुमार', 'स्वसंविदानन्द', 'चर्वणाव्यापार' ये शब्द 'रससिद्धान्त' की विशेष
परिभाषा के अनुकूल हैं । जैसा कि आचार्य भरतमुनि का प्रसिद्ध 'रससूत्र' है—'विभावानुभाव-
संचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः', इसकी लोचनकार-सम्मत व्याख्या के अनुसार सहृदय के हृदय
में जन्म-जन्मान्तर की वासना या संस्कार रूप से रति आदि स्थायी भाव विद्यमान होते हैं, काव्य
के शब्दों से विभाव-अनुभाव को ग्रहण करके सहृदय अपने हृदय के साथ उनका संवाद कर लेता
है, इस प्रकार सहृदय के रत्यादि और काव्य के द्वारा अर्पित विभावानुभाव आदि से सहृदय के
सुकुमार आनन्दमय चित्त का उद्बोध होता है, इसे ही शास्त्रीय परिभाषा में चर्वणारूप व्यापार
कहते हैं, इस स्थिति में पहुँचते ही सहृदय जो एक प्रकार का विशेष आस्वादन अनुभव करता
है वही 'रस' कहलाता है । 'रस' की स्थिति में स्वशब्दवाच्यता का जरा भी सम्पर्क नहीं होता,
इसलिए इसे सर्वथा अलौकिक ही कहते हैं, दूसरे यह 'ध्वनि' ही है, इसमें न तो वस्तु है और न
अलंकार । अतः 'रसध्वनि' को ही मुख्य रूप से काव्य की आत्मा का व्यवहार है, अलङ्कारध्वनि
और वस्तुध्वनि में आत्मव्यवहार औपचारिक है ।
२. भट्टनायक का यह पूरा श्लोक पहले 'लोचन' में आ चुका है—
ध्वनिर्मानापरो योऽपि व्यापारो व्यञ्जनात्मकः ।
तस्य सिद्धेऽपि भेदे स्यात्काव्येऽंशत्वं न रूपता ॥
५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
भम धम्मिअ वीसत्थो सो सुणओ अज्ज मारिओ देण ।
गोलाणइकच्छकुडङ्गवासिणा दरिअसीहेण ॥
‘बाबा जी, तुम इतमीनान से घूमो । वह कुत्ता गोदावरी नदी के लता गहन में
रहने वाले पागल शेर द्वारा आज मार डाला गया ।’
लोचनम्
भेदत्रयव्यापकं सामान्यलक्षणम् । यद्यपि हि ध्वननं शब्दस्यैव व्यापारः,
तथाप्यर्थसामर्थ्यस्य सहकारिणः सर्वत्रानपायाद्वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तत्वम् । शब्द-
शक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्येऽप्यर्थसामर्थ्यादेव प्रतीयमानावगतिः, शब्दशक्तिः
केवलमवान्तरसहकारिणीति वक्ष्यामः । दूरं विभेदवानिति । विधिनिषेधौ विरुद्धा-
विति न कस्यचिदपि विमतिः । एतदर्थं प्रथमं तावेवोदाहरति—
‘भ्रम धार्मिक विस्रब्धः स शुनकोऽद्य मारितस्तेन ।
गोदावरीनदीकूललतागहनवासिना दृप्तसिंहेन ॥’
कस्याश्चित्सङ्केतस्थानं जीवितसर्वस्वायमानं धार्मिकसञ्चरणान्तरायदोषा-
अलङ्कारध्वनि का ही सम्भवतः उपालम्भ है तो ( ऐसी स्थिति में ) उन्होंने ही
‘रसध्वनि’ को आत्मा के रूप में स्वीकार कर लिया, क्योंकि उनका निर्णय है कि
रस-चर्वणारूप तीसरा अंश अभिधा और भावनारूप दो अंशों से अतिरिक्त ( उत्तीर्ण )
है। वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि का रसध्वनि में ही पर्यवसान है यह हम ही उन-उन
स्थलों में कहेंगे, बस । ‘वाच्य की सामर्थ्य से आक्षिप्त’ यह ( १वस्तु, अलङ्कार और रस )
इन तीनों भेदों में व्याप्त रहनेवाला सामान्य लक्षण’१ है । यद्यपि ध्वनन शब्द का
ही व्यापार है, तथापि सहकारी अर्थसामर्थ्य के सब जगह विद्यमान होने से वाच्य-
सामर्थ्याक्षिप्तत्व है। शब्दशक्तिमूल अनुरणनव्यङ्ग्य में भी अर्थ की सामर्थ्य से ही
प्रतीयमान का ज्ञान होता है, शब्दशक्ति केवल अवान्तर सहकारिणी होती है, यह
कहेंगे । ‘बहुत दूर तक भेद रखनेवाला—’ । विधि और निषेध के परस्पर विरोध में
किसी की विमति नहीं है। एतदर्थ पहले उन्हें ही उदाहृत करते हैं—
‘बाबा जी, तुम इतमीनान से घूमो । वह कुत्ता गोदावरी नदी के लतागहन में
रहनेवाले पागल शेर द्वारा आज मार डाला गया ।’
प्राणों के सर्वस्व अपने सङ्केत स्थान की, धार्मिक ( बाबाजी ) के संचाररूप विघ्न के
अर्थात् ध्वनि नाम का जो अन्य व्यञ्जना रूप व्यापार है उसका ( वाच्य से ) भेद सिद्ध होने
पर भी काव्य में अंशत्व होगा रूपता या अंशित्व ( आत्मत्व ) नहीं ।
१. लोचनकार का तात्पर्य यह है कि यहाँ ग्रन्थ में ‘वाच्यसामर्थ्याक्षिप्त’ को नपुंसक विशेषण
समझ कर कोई भ्रम से केवल इसे ‘वस्तुमात्र’ में अन्वित न करने लग जाय, बल्कि यह वस्तु,
अलङ्कार और रसादि इन तीनों में अनुगत सामान्य रूप है । लिङ्ग और वचन का विपरिणाम
करके सबके साथ इसका अन्वय बैठा लेना चाहिए ।
प्रथम उद्योतः ५३
लोचनम्
तदवलुप्यमानपल्लवकुसुमादिविच्छायायीकरणाच्च परित्रातुमियमुक्तिः । तत्र
स्वतःसिद्धमपि भ्रमणं श्वभयेनापोदितमिति प्रतिप्रसवात्मको निषेधाभावरूपः,
न तु नियोगः प्रैषादिरूपोऽत्र विधिः; अतिसर्गप्राप्तकालयोर्ह्ययं लोट् । तत्र
भावतदभावयोर्विरोधाद् द्वयोस्तावन्न युगपद्वाच्यता, न क्रमेण, विरम्य व्यापारा-
भावात् । ‘विशेष्यं नाभिधा गच्छेत्’ इत्यादिनाभिधाव्यापारस्य विरम्य
व्यापारासंभवाभिधानात् ।
दोष एवं उसके तोड़े जाते हुए फूल-पत्तों से छायाहीन कर देने के कार्य से, रक्षा के
निमित्त किसी स्त्री की यह उक्ति है । वहाँ, बाबाजी का स्वतःसिद्ध भी भ्रमण कुत्ते के
भय से प्रतिषिद्ध होने से यहाँ विधि प्रतिप्रसवरूप१, अर्थात् निषेधाभावरूप है, न कि
प्रैषादिरूप नियोग है । ( ‘भ्रम’ पद का ) जो यह ‘लोट्’ लकार है वह अतिसर्ग और
प्राप्तकाल के अर्थ में हुआ है । भाव और अभाव में विरोध होने से दोनों की युगपत्२
( एक समय में ) वाच्यता नहीं है । एवं क्रम से ( भी ) नहीं, क्योंकि विराम होने
पश्चात् व्यापार नहीं होता । जैसा कि ‘( विशेषण में क्षीणशक्ति हो जाने के कारण
फिर ) अभिधा विशेष्य तक नहीं पहुँचती’ इत्यादि द्वारा अभिधा व्यापार के विरत हो
जाने पर व्यापार का असम्भव कहा गया है ।
१. नायिका पुंश्चली एवं प्रगल्भा है । उसके प्राणसमान प्रिय सङ्केतस्थान पर कोई धार्मिक
बाबाजी अपनी असामयिक उपस्थिति से विघ्न तो उत्पन्न करने ही लगे साथ ही वहाँ की फूल-
पत्तियाँ भी तोड़-तोड़ कर उस स्थान को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे । उससे न रहा गया तो उसने चाल
चलते हुए उनसे प्रार्थना की कि वे इतमीनान से अब घूमें, क्योंकि गोदावरी तट के रहने वाले
मतवाले सिंह ने उस कुत्ते को मार डाला है । बाबाजी एक तो कुत्ते से ही परेशान थे अब सिंह
पहुँच आया । यहाँ घूमो या ‘भ्रम’ में लोट् लकार ‘विधि’ अर्थ का सूचक है, किन्तु यहाँ
‘विधि’ नियोग या आज्ञारूप नहीं है, क्योंकि वह पुंश्चली धार्मिक को आज्ञा नहीं दे रही है कि वह
भ्रमण करे, बल्कि वह तो स्वयं भ्रमण कर रहा है, उसका भ्रमण स्वतः सिद्ध है । पुंश्चली धार्मिक
के भ्रमण का विधान प्रतिषेधक तत्त्व जो कुत्ते का भय था, उसके अभाव द्वारा करती है. इसलिए
यहाँ ‘विधि’ प्रतिषेधाभाव या ‘प्रतिप्रसव’ रूप है । इस प्रकार यहाँ ‘प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च’
( ३. ३. १०३ ) इस पाणिनीय सूत्र के अनुसार अतिसर्ग या प्राप्तकाल में ‘लोट्’ हुआ है ।
‘अतिसर्ग’ अर्थात् कामचार या स्वेच्छा-विहार ।
२. प्रस्तुत उदाहरण में ‘घूमो’ इस विधिरूप अर्थ के बाद ही ‘मत घूमो’ यह जो निषेध रूप
अर्थ की प्रतीति हो रही है, यहाँ यह कहना गलत होगा कि दोनों विधि-निषेध रूप अर्थ जब कि
ये दोनों एक दूसरे से सर्वथा विरुद्ध हैं, एक ही समय में ( युगपत् ) वाच्य हो रहे हैं, क्योंकि
अभिधा जब एक विधिरूप अर्थ को बता चुकी तब उसकी प्रवृत्ति पुनः निषेध रूप अर्थ में नहीं
होगी—यह नियम है कि कार्य करके विरत हो जाने पर व्यापार नहीं होता—‘विशेष्यं
नाभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिर्विशेषणे ।’ शब्द के सङ्केतित अर्थ के अभिधान में जो व्यापार होता
है वह ‘अभिधा’ कहलाता है । इस प्रकार यहाँ यह बात सिद्ध हुई कि ‘निषेध’ रूप अर्थ ( क्योंकि
यह अर्थ ‘संकेतित’ नहीं है ) के बोध के लिए किसी अतिरिक्त शक्ति की कल्पना आवश्यक है,
वह ‘शक्ति’ व्यञ्जना हो सकती है और इससे प्रतीत निषेध रूप अर्थ ‘व्यङ्ग्य’ होगा ।
५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
ननु तात्पर्यशक्तिरपर्यवसिता विवक्षया दृप्तधार्मिकतदादिपदार्थानन्वयरूप-
मुख्यार्थबाधबलेन विरोधनिमित्तया विपरीतलक्षणया च वाक्यार्थभूतनिषेध-
प्रतीतिमभिहितान्वयदृशा करोतीति शब्दशक्तिमूल एव सोऽर्थः । एवमनेनोक्त-
मिति हि व्यवहारः, तन्न वाच्यातिरिक्तोऽन्योऽर्थ इति ।
नैतत्; त्रयो ह्यत्र व्यापाराः संवेद्यन्ते—पदार्थेषु सामान्यात्मस्वभिधा-
व्यापारः, समयापेक्षयार्थावगमनशक्तिर्ह्यभिधा । समयश्च तावत्येव, न विशे-
षांशे, आनन्त्याद्व्यभिचाराच्चैकस्य । ततो विशेषरूपे वाक्यार्थे तात्पर्यशक्तिः
परस्परान्विते, 'सामान्यान्यन्यथासिद्धेर्विशेषं गमयन्ति हि' इति न्यायात् ।
तात्पर्य-शक्ति¹ (भ्रमण की विधि में) पर्यवसित न होने के कारण विवक्षा होने
से 'मतवाला', 'धार्मिक' (बाबाजी), 'वह' आदि पदार्थों के अनन्वयरूप मुख्यार्थ के
बाध के बल से और विरोध के निमित्त वाली विपरीतलक्षणा से अभिहितान्वयवाद की
दृष्टि से वाक्यार्थीभूत निषेध की प्रतीति (उत्पन्न) करती है, इस प्रकार वह अर्थ
शब्दशक्तिमूलक ही है। 'इस प्रकार इसने कहा' यह व्यवहार है। इसलिए अन्य अर्थ
वाच्य से अतिरिक्त नहीं है !
यह² नहीं; क्योंकि यहाँ तीन व्यापार जाने जाते हैं। सामान्यरूप पदार्थों में
अभिधा व्यापार होता है, क्योंकि समय (सङ्केत) की अपेक्षा से अर्थ के बोध की शक्ति
'अभिधा' है और 'समय' उतने में ही होगा, न कि विशेष अंश (व्यक्ति) में, क्योंकि
एक (विशेष व्यक्ति) का आनन्त्य और व्यभिचार है। इस कारण परस्पर अन्वित
विशेषरूप वाक्यार्थ में तात्पर्यशक्ति है, क्योंकि न्याय है—'विशेष के बिना सामान्य की
१. अभिहितान्वयवाद और तात्पर्य-शक्ति—यहाँ यह विचारणीय है कि भ्रमणनिषेध के
अर्थ में यदि प्रकारान्तर से शब्द की शक्ति 'अभिधा' से ही काम चल सकता है तब भिन्न शक्ति
की कल्पना अनावश्यक होगी। एक मीमांसक होते हैं जो 'अभिहितान्वयवादी' कहलाते हैं, उनके
अनुसार वाक्यार्थ वही होता है जिसमें वक्ता का तात्पर्य हो। इस प्रकार 'तात्पर्य' शक्ति से वे लोग
वाक्यार्थ का बोध करते हैं और पदार्थ-बोध के लिए 'अभिधा' का उपयोग करते हैं। प्रस्तुत में, वक्त्री
पुंश्चली नायिका का तात्पर्य भ्रमण के निषेध में है, अर्थात् भ्रमण-निषेध यही वाक्यार्थ है। यहाँ मुख्य
अर्थ का बाध इस प्रकार होता है कि 'मतवाला' 'धार्मिक' और 'वह' आदि का अन्वय मुख्य
अर्थ के साथ नहीं बनता। इस प्रकार यहाँ पदार्थों के अन्वय का अभाव रूप मुख्य अर्थ का बाध
हो रहा है, इस बल से विपरीतलक्षणा उपस्थित होती है और तात्पर्य-शक्ति को, जो भ्रमण-विधि
में पर्यवसान नहीं प्राप्त कर रही थी, सहायता पहुँचाती है और वह भ्रमण-निषेध की प्रतीति
उत्पन्न करती है। तात्पर्यशक्ति और लक्षणा दोनों अभिधा के ही आश्रित शक्तियाँ हैं, अतः भ्रमण-
निषेध रूप अर्थ अभिधामूलक ही है और इस प्रकार वह वाच्य से अतिरिक्त नहीं है यह
बात सिद्ध हुई ।
२. विपरीतलक्षणा का ही अवसर नहीं, अतः तात्पर्य-शक्ति से 'भ्रमण-निषेध' का
ज्ञान नहीं होगा—उपर्युक्त 'अभिहितान्वयवाद' के अनुसार 'तात्पर्यशक्ति' का खण्डन करते हुए
आचार्य ने 'विपरीतलक्षणा' को ही यहाँ अप्रसक्त बताया, क्योंकि लोक में तीन व्यापार-अभिधा,
तात्पर्य और लक्षणा हैं। अभिधा से सामान्य या जाति का बोध होता है वह भी 'सङ्केत' (समय) की
प्रथम उद्योतः ५५
लोचनम्
तत्र च द्वितीयकक्ष्यायां 'भ्रमे'ति विध्यतिरिक्तं न किञ्चित्प्रतीयते, अन्वयमा-
त्रस्यैव प्रतिपन्नत्वात् । न हि 'गङ्गायां घोषः' 'सिंहो वटुः' इत्यत्र यथान्वय
एव बुभूषन् प्रतिहन्यते, योग्यताविरहात्; तथा तव भ्रमणनिषेद्धा स श्वा
सिंहेन हतः, तदिदानीं भ्रमणनिषेधकारणवैकल्याद् भ्रमणं तवोचितमित्यन्व-
यस्य काचित्क्षतिः । अत एव मुख्यार्थबाधा नात्र शङ्क्येति न विपरीतलक्षणाया
अवसरः ।
भवतु वाऽसौ । तथापि द्वितीयस्थानसंक्रान्ता तावदसौ न भवति । तथा
हि-मुख्यार्थबाधायां लक्षणायाः प्रक्लृप्तिः । बाधा च विरोधप्रतीतिरेव । न चात्र
सिद्धि नहीं होने के कारण सामान्य विशेष का बोधन करते हैं'। उस दूसरी कक्ष्या में
'घूमो' इस विधि के अतिरिक्त कुछ नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि केवल अन्वय प्रतीत
होता है। 'गङ्गायां घोषः' और 'सिंहो वटुः' इन स्थलों में जिस प्रकार अन्वय ही होना
चाहता हुआ, योग्यता के अभाव के कारण प्रतिहत हो जाता है, उस प्रकार 'तुम्हारे
भ्रमण का निषेध करनेवाला वह कुत्ता सिंह के द्वारा मार डाला गया, अतः इस समय
भ्रमण-निषेध के कारण के अभाव में तुम्हारा भ्रमण उचित है' इस अन्वय में कोई
क्षति (बाधा) नहीं है। अतएव मुख्यार्थबाधा की आशङ्का नहीं करनी चाहिए। इस
प्रकार विपरीतलक्षणा का अवसर नहीं।
अथवा वह लक्षणा हो। तब भी वह दूसरे स्थान में संक्रान्त नहीं हो सकती।
जैसा कि मुख्य अर्थ की बाधा होने पर लक्षणा की कल्पना होती है। और, बाधा-
विरोध की प्रतीति ही है। यहाँ पदार्थों का अपने-आपमें विरोध नहीं है। अगर परस्पर
सहायता से। अर्थात् अभिधा से 'गोत्व' सामान्य का ज्ञान होगा न कि 'गौ' रूप विशेष का।
विशेष में अभिधा को स्वीकार करने पर आनन्त्य और व्यभिचार दोष उपस्थित होते हैं,
क्योंकि विशेष एक नहीं अनन्त होता है अतः सब में 'सङ्केत' सम्भव नहीं होगा और दूसरे, जिस
गोविशेष के साथ सङ्केत का ग्रहण नहीं हुआ है उसका भी 'गो' पद से बोध होने की स्थिति में
'व्यभिचार' होगा। इसलिए 'सामान्य' या 'जाति' में ही अभिधा को माना गया है। दूसरी तात्पर्य-
शक्ति विशेष रूप परस्पर अन्वित वाक्यार्थ में होती है। इस प्रकार तात्पर्य-शक्ति के द्वारा पदार्थों
के परस्पर अन्वय के अतिरिक्त कुछ प्रतीत नहीं होता। जिस प्रकार 'गङ्गायां घोष' आदि लक्षणा
के स्थल हैं उस प्रकार प्रस्तुत पद्य लक्षणा-विषय नहीं है, क्योंकि 'गङ्गायां घोषः' आदि में परस्पर
अन्वय ही नहीं बन पाता, क्योंकि प्रवाह रूप गङ्गा में 'घोष' के धारण करने की 'योग्यता' नहीं
है, किन्तु प्रस्तुत में तो 'अन्वय' अप्रतिहत रूप से बन जाता है, क्योंकि जब सिंह के द्वारा कुत्ता
मार डाला गया, जिसके कारण भ्रमण में बाधा होती थी, तब भ्रमण उचित ही है। इस प्रकार
अन्वय के उपपन्न हो जाने की स्थिति में मुख्यार्थ-बाधा की शङ्का ही नहीं होनी चाहिए। 'विपरीत-
लक्षणा' का यह तभी प्रसंग होता जब कि परस्पर अन्वय के प्रतिहत होने पर मुख्यार्थ की
बाधा होती।
अन्ततः, 'भ्रमण-निषेध' रूप अर्थ की प्रतीति के लिए अतिरिक्त 'ध्वनन' व्यापार मानना ही
पड़ेगा। (कुछ लोग भ्रम से तात्पर्य-शक्ति को 'तात्पर्या' शक्ति के नाम से लिखने लगे हैं, यह सर्वथा
अमान्य है, जहाँ तक मैं समझता हूँ, किसी प्राचीन आचार्य ने 'तात्पर्या' प्रयोग नहीं किया है)।
५६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
पदार्थानां स्वात्मनि विरोधः। परस्परं विरोध इति चेत्—सोऽयं तर्ह्यन्वये
विरोधः प्रत्येयः। न चाप्रतिपन्नेऽन्वये विरोधप्रतीतिः, प्रतिपत्तिश्चान्वयस्य
नाभिधाशक्त्या, तस्याः पदार्थप्रतिपत्त्युपक्षीणाया विरम्यव्यापारात् इति
तात्पर्यशक्त्यैवान्वयप्रतिपत्तिः।
नन्वेवं 'अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्' इत्यत्राप्यन्वयप्रतीतिः स्यात्। किं न
भवत्यन्वयप्रतीतिः दशदाडिमादिवाक्यवत्, किन्तु प्रमाणान्तरेण सोऽन्वयः
प्रत्यक्षादिना बाधितः प्रतिपन्नोऽपि शुक्तिकायां रजतमिवेति तदवगमकारिणो
वाक्यस्याप्रामाण्यम्। 'सिंहो माणवकः' इत्यत्र द्वितीयकक्ष्यान्निविष्टतात्पर्यशक्ति-
समर्पितान्वयबाधकोल्लासानन्तरमभिधातात्पर्यशक्तिद्वयव्यतिरिक्ता तावत् तृती-
यैव शक्तिस्तद्बाधकविधुरीकरणनिपुणा लक्षणाभिधाना समुल्लसति।
विरोध है तो वह विरोध अन्वय में प्रतीत होना चाहिए। और, अन्वय (सम्बन्ध)
के ज्ञात न होने पर विरोध की प्रतीति नहीं हो सकती और अन्वय का ज्ञान अभिधा-
शक्ति से नहीं होगा, क्योंकि पदार्थ की प्रतिपत्ति (ज्ञान) हो जाने पर वह उपक्षीण
(नष्ट) हो जाती है, फिर विरत होने पर व्यापार नहीं होता। इस प्रकार तात्पर्य-शक्ति
से ही अन्वय की प्रतिपत्ति' होती है।
(शङ्का) इस प्रकार तो 'अंगुलि के अग्रभाग में सैकड़ों हाथी' इस वाक्य में भी
अन्वय²-प्रतीति हो जायगी ! (समाधान) क्या 'दशदाडिमादि' (महाभाष्य के) वाक्य
की भाँति अन्वय की प्रतीति नहीं होगी ? किन्तु प्रत्यक्ष आदि प्रमाणान्तर से वह अन्वय
ज्ञात होकर भी, शुक्ति में रजत की भाँति बाधित है, इस कारण उसके ज्ञान करानेवाले
वाक्य का प्रामाण्य नहीं है। 'सिंहो माणवकः' यहाँ दूसरी कक्ष्या में रहनेवाली तात्पर्य-
शक्ति से समर्पित अन्वय के बाधक (विरोध) के उल्लास के पश्चात् अभिधा और
तात्पर्य इन दोनों शक्तियों से अतिरिक्त, लक्षणा नाम की तीसरी ही शक्ति उस बाधक
के बाधन में निपुण समुल्लसित (प्रवृत्त) होती है।
१. किसी प्रकार मान भी लिया जाय कि यहाँ लक्षणा का अवसर है। परन्तु मुख्यार्थ का बाधा
या विरोध-प्रतीति कहाँ हो रही है ? आपस में यहाँ पदार्थों का विरोध नहीं है, परस्पर विरोध है
तो अन्वय में विरोध होगा। परन्तु जब तक अन्वय की प्रतीति नहीं हो जाती तब तक विरोध की
प्रतीति भी सम्भव नहीं। और यह पहले कहा ही जा चुका है कि अभिधा शक्ति 'अन्वय' में प्रवृत्त
नहीं हो सकती, फिर 'तात्पर्य-शक्ति' से ही अन्वय की प्रतीति करनी होगी। इस प्रकार तात्पर्य
शक्ति भी अन्वय की प्रतीति अर्थात् वाक्यार्थ का ज्ञान ही करने में कृतकार्य हो जाती है फिर
अतिरिक्त अर्थ 'भ्रमण-निषेध' उसकी सीमा से बाहर हो जाता है।
२. 'ऊपर' जो बाधित स्थल में भी तात्पर्य-शक्ति से अन्वय-प्रतीति को आपने स्वीकार
किया है तब 'अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्' में भी वही स्थिति आपको स्वीकार होगी। इस शङ्का का भी
समाधान स्वीकृत्यात्मक ही है। आचार्य का कहना है कि जहाँ तक अन्वय या वाक्यार्थ का ज्ञान है
वह तो महाभाष्य के 'दशदाडिमादि' वाक्य की भाँति होगा ही। 'दश दाडिमानि, षडपूपाः,
कुण्डम्, अजाजिनम्, पललपिण्डः, अधरोरुकमेतत् कुमार्याः, स्फैयकृतस्य पिता प्रतिशीनः' इति
(महाभाष्य, १. २. ४५)। किन्तु शुक्ति में रजत का ज्ञान हो जाने पर भी प्रत्यक्षादि प्रमाण से
प्रथम उद्योतः ५७
लोचनम्
नन्वेवं 'सिंहो वटुः' इत्यत्रापि काव्यरूपता स्यात्; ध्वननलक्षणस्यात्म-
नोऽत्रापि समनन्तरं वक्ष्यमाणतया भावात् । ननु घटेऽपि जीवव्यवहारः
स्यात्; आत्मनो विभुत्वेन तत्रापि भावात् । शरीरस्य खलु विशिष्टाधिष्ठानयुक्तस्य
सत्यात्मनि जीवव्यवहारः, न यस्य कस्यचिदिति चेत्-गुणालङ्कारौचित्यसुन्द-
रशब्दार्थशरीरस्य सति ध्वननाख्यात्मनि काव्यरूपताव्यवहारः । न चात्मनोऽ-
सारता काचिदिति च समानम् । न चैवं भक्तिरेव ध्वनिः, भक्तिर्हि लक्षणाव्या-
पारस्तृतीयकक्ष्यानिवेशी । चतुर्थ्यां तु कक्ष्यायां ध्वननव्यापारः । तथा हि-
त्रितयसन्निधौ लक्षणा प्रवर्तत इति तावद्भवन्त एव वदन्ति । तत्र मुख्यार्थबाधा
तावत्प्रत्यक्षादिप्रमाणान्तरमूला । निमित्तं च यदभिधीयते सामीप्यादि तदपि
प्रमाणान्तरावगम्यमेव ।
( शङ्का ) इस प्रकार 'सिंहो वटुः' इस स्थल में भी काव्य की स्वरूपता¹ होगी,
क्योंकि यहाँ भी ध्वननरूप आत्मा की, तुरत वक्ष्यमाण होने के कारण स्थिति है । तब
तो घट में भी जीव का व्यवहार होगा, क्योंकि आत्मा के विभु ( सर्वत्र व्याप्त ) होने
के कारण ( उसमें ) भी अस्तित्व है ! ( यदि कहिए कि ) शरीर जब विशिष्ट प्रकार
के ( इन्द्रिय, मन, अङ्ग आदि ) अधिष्ठानों से युक्त होता है और उसमें आत्मतत्त्व
रहता है तब जीव का व्यवहार होता है, जिस किसी का नहीं—तो ( इधर भी कह
सकते हैं कि ) गुण और अलङ्कार के औचित्य से सुन्दर शब्द और अर्थ के शरीर का
ध्वननाख्य आत्मा के होने पर काव्यरूपता व्यवहार है । आत्मा की कोई असारता
नहीं, यह दोनों में बराबर है । इस प्रकार भक्ति ही ध्वनि नहीं, क्योंकि 'भक्ति' रूप
लक्षणा व्यापार तृतीय कक्ष्या में होता है । चौथी कक्ष्या में तो ध्वनन व्यापार होता
है । जैसा कि, तीनों—मुख्यार्थबाध, मुख्यार्थयोग और प्रयोजन के सन्निधान में लक्षणा
व्यापार प्रवृत्त है यह तो आप ही कहते हैं । वहाँ मुख्यार्थ का बाध प्रत्यक्ष आदि
प्रमाणान्तर से होता है । और जो कि सामीप्य आदि निमित्त का अभिधान करते हैं वह
भी प्रमाणान्तर के द्वारा ही बोध्य है ।
बाधित हो जाता है उसी प्रकार 'अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्०' इत्यादि वाक्य अपने ज्ञात होने के
पश्चात् उत्पन्न बाधज्ञान से विशिष्ट होने के कारण प्रमाण नहीं होंगे । पुनः शङ्का करते हैं कि तब तो
'सिंहो माणवकः' इत्यादि वाक्य भी प्रमाण नहीं होंगे, क्योंकि अन्वय-बोध के पश्चात् इनका भी
बाध हो जायगा, इसके समाधान में आचार्य का कहना है कि द्वितीय कक्ष्या में जब तात्पर्य शक्ति के
द्वारा अन्वय-बोध यहाँ होता है तब बाधक रूप विरोध की प्रतीति उत्पन्न होती है जिसके निरा-
करणार्थ तृतीय शक्ति 'लक्षणा' ही समुल्लसित होती है ।
१. यहाँ शङ्का यह खड़ी हुई कि जब 'ध्वनन' को ही 'काव्यात्मा' माना जाय तो 'सिंहो वटुः'
इस स्थल में भी 'काव्य' का व्यवहार होगा, क्योंकि 'प्रयोजन', जो 'प्रतीयमान' होने वाला है वह यहाँ
भी है । इसका समाधान करते हुये आचार्य कहते हैं कि तब 'घट' में भी जीव-व्यवहार प्रसक्त होना
चाहिये, क्योंकि व्यापक आत्मा की स्थिति घट में भी है ही । तब यदि यह कहा जायगा कि मन
और इन्द्रियों के अधिष्ठान से युक्त शरीर में आत्मा के होने पर जीव-व्यवहार होता है तब हम भी
५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
यच्चिदं घोषस्यातिपवित्रत्वशीतलत्वसेव्यत्वादिकं प्रयोजनमशब्दान्तर-
वाच्यं प्रमाणान्तराप्रतिपन्नम्, वटोर्वा पराक्रमातिशयशालित्वं, तत्र शब्दस्य न
तावन्न व्यापारः । तथाहि—तत्सामीप्यात्तद्धर्मत्वानुमानमनैकान्तिकम्, सिंह-
शब्दवाच्यत्वं च वटोरसिद्धम् । अथ यत्र यत्रैवं शब्दप्रयोगस्तत्र तत्र तद्धर्मयोग
जो कि यह घोष का अतिपवित्रत्व, अतिशीतलत्व और अतिसेव्यत्व आदि प्रयोजन,
( लाक्षणिक शब्द से ) अतिरिक्त शब्द द्वारा अवाच्य एवं ( शब्द से ) अतिरिक्त प्रमाण
के द्वारा अज्ञात है, अथवा 'वटु' का अतिशयपराक्रमशालित्व ( प्रयोजन ) है, वहाँ शब्द
का व्यापार नहीं है ऐसा नहीं¹। जैसा कि ('गङ्गायां घोषः' इस स्थल में )
'तत्सामीप्य' के हेतु से तद्धर्मत्व का अनुमान² अनैकान्तिक ( व्यभिचारी ) है । और,
'वटु' का 'सिंह' शब्दवाच्यत्व हेतु असिद्ध ( स्वरूपासिद्ध ) है । ( यदि कहते हैं कि )
जहाँ-जहाँ इस प्रकार के शब्द का प्रयोग है वहाँ-वहाँ उसके धर्म का योग है, यह
यही उत्तर देंगे कि गुण और अलङ्कार के औचित्य से सुन्दर शब्दार्थ-शरीर जब ध्वनन रूप आत्मा
से युक्त होता है तभी 'काव्य' व्यवहार है। इससे तो कोई आत्मा की असारता व्यक्त नहीं होती
है। दूसरे यह भी कि भक्ति ही ध्वनि है, गलत पक्ष है, क्योंकि भक्ति लक्षणा-व्यापार है और तृतीय
कक्ष्या में यह व्यापार होता है। अर्थात् प्रथम कक्ष्या में अभिधा-व्यापार दूसरी में तात्पर्य-शक्ति और
तीसरी में लक्षणा और ध्वनन-व्यापार चतुर्थ कक्ष्या में होता है। इस प्रकार न तो 'सिंहो वटुः'
इत्यादि 'काव्य' की श्रेणी में आयेंगे और न तो भक्ति या लक्षणा ही 'ध्वनि' सिद्ध होगी।
१. प्रसङ्ग यह प्राप्त है कि आखिर यहाँ 'प्रयोजन' को क्या समझा जाय ? इसके उत्तर में
आचार्य को सिद्ध करना है कि यह 'प्रयोजन' सर्वथा शब्द के व्यापार का विषय है। इसीलिये
आचार्य दृढ़ होकर कहते हैं कि शब्द का व्यापार नहीं है ऐसा नहीं, अर्थात् सर्वथा शब्द का ही
व्यापार है। इसके शब्द-व्यापार के विषय होने के दो मुख्य कारण हैं, पहला यह कि प्रयोजन
'अशब्दान्तर वाच्य' है, अर्थात् लाक्षणिक शब्द ही, जैसे प्रस्तुत में 'गङ्गा' 'सिंह' आदि शब्द,
'प्रयोजन' का प्रतिपादन कर सकते हैं, तथा दूसरा कारण यह है कि 'शब्द' के अतिरिक्त किसी
प्रमाण से ज्ञात नहीं होता है। इसी उद्देश्य से आचार्य ने आगे की पंक्तियों में 'अनुमान' और
'स्मृति' की आशङ्का करके इनकी विषयता का निराकरण किया है तथा शब्द-व्यापारों में अभिधा,
तात्पर्य और लक्षणा का भी निराकरण करके इन शब्द-व्यापारों से अतिरिक्त चतुर्थ 'ध्वनन' व्यापार
को माना है।
२. 'गङ्गायां घोषः' और 'सिंहो वटुः' इन स्थलों में प्रतीयमान 'प्रयोजन' को 'अनुमान' प्रमाण
का विषय माना जा सकता है अथवा नहीं यह विचारणीय है। आचार्य का सिद्धान्त पक्ष यह है
कि यहाँ 'अनुमान' नहीं हो सकता, क्योंकि पहले स्थल में 'व्यभिचार' है और दूसरे में 'असिद्धि'
कैसे ? प्रथम स्थल में 'अनुमान' का रूप यह होगा—'तीरं गङ्गागतातिपवित्रत्वादिकधर्मवत्, गङ्गासामी-
प्यात्', इस प्रकार का 'अनुमान' करने वाला यह कहना चाहता है कि जो वस्तु गङ्गा के समीप
होती है वह गङ्गा के समान ही पवित्र आदि होती है, गङ्गा के प्रायः सभी गुण उसमें संक्रान्त हो
जाते हैं, इसका उदाहरण मुनिजन हैं, जो गङ्गा के समीप रहते हैं और पवित्र होते हैं। किन्तु यहीं
यह प्रतिकूल तर्क क्यों न उपस्थित किया जाय कि शिर की खोपड़ी भी तो गङ्गा के समीप रह सकती
है, किन्तु वह अति पवित्र नहीं है, ऐसी स्थिति में 'गङ्गा-सामीप्य' को हेतु मानकर अतिपवित्रत्व
आदि को सिद्ध करना व्यभिचार-दोषग्रस्त है। इसी को आचार्य ने 'अनैकान्तिक' कहा है।