ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
५२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो
यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः ।
न सम्प्राप्तो वृद्धिं यदि स भृशमक्षेत्रपतितः
किमित्क्षोर्दोषोऽसौ न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥
यथा वा ममैव—
अमी ये दृश्यन्ते ननु सुभगरूपाः सफलता
भवत्येषां यस्य क्षणमुपगतानां विषयताम् ।
निरालोके लोके कथमिदमहो चक्षुरधुना
समं जातं सर्वैर्न सममथवान्यैरवयवैः ॥
अनयोर्हि द्वयोः श्लोकयोरिक्षुचक्षुषी विवक्षितस्वरूपे एव न च
दूसरों के लिए जो पीड़ा का अनुभव करता है, भङ्ग होने पर भी जो मधुर बना
रहता है, जिसका विकार भी यहां सभी के अभिमत होता है, यदि वह इक्षु खराब
क्षेत्र में गिर कर नहीं वृद्धि प्राप्त हुआ तो वह दोष क्या इक्षु का है गुणरहित मरुभूमि
का नहीं ?
अथवा जैसे मेरा ही—
ये जो सुभग रूपोंवाले ( शरीर के अवयव ) दिखाई देते हैं इनकी जिसका क्षण
भर विषय हो जाने से सफलता होती है, आश्चर्य है यह चक्षु भी अब अन्धकारमय
जगत् में सभी अन्य अवयवों के समान भी नहीं रहा।
इन दोनों श्लोकों में इक्षु और चक्षु विवक्षितस्वरूप ही हैं न कि प्रस्तुत हैं।
लोचनम्
नन्विति। यैरिदं जगद्भूषितमित्यर्थः। यस्य चक्षुषो विषयतां क्षणं गतानामेषां
सफलता भवति तदिदं चक्षुरिति सम्बन्धः। आलोको विवेकोऽपि। न सममिति।
हस्तो हि परस्पर्शादानादावप्युपयोगी । अवयवैरिति । अतितुच्छप्रायैरित्यर्थः
अप्राप्तः पर उत्कृष्टो भागोऽर्थलाभात्मकः स्वरूपप्रथनलक्षणो वा येन तस्य। कथया-
मीत्यादिप्रत्युक्तिः । अनेन पदेनेदमाह—अकथनीयमेतत् श्रूयमाणं हि निर्वेदाय
उपक्रम करते हैं—अप्रस्तुतप्रशंसा—। सुभग—। अर्थात् जिन्होंने इस जगत् को
भूषित कर रखा है । सम्बन्ध यह कि जिस चक्षु की विषयता क्षण भर प्राप्त हुए इनकी
सफलता होती है वह यह चक्षु । आलोक विवेक भी । समान भी नहीं—। हाथ दूसरे का
स्पर्श ग्रहण करने आदि में भी उपयोगी है। अवयवों—। अर्थात् अतितुच्छप्राय। जिसने पर
अर्थात् उत्कृष्ट अर्थलाभरूप अथवा स्वरूपख्यातिरूप भाग प्राप्त नहीं किया है उसका ।
'कहता हूँ' इत्यादि प्रत्युक्ति है । इस पद से यह कहा है—यह कहने की बात नहीं,
तृतीय उद्योतः ५२३
ध्वन्यालोकः
प्रस्तुते । महागुणस्याविषयपतितत्वादप्राप्तपरभागस्य कस्यचित्स्वरूप-
मुपवर्णयितुं द्वयोरपि श्लोकयोस्तात्पर्येण प्रस्तुतत्वात् । अविवक्षित-
त्वं यथा—
कस्त्वं भोः कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं
वैराग्यादिव वक्षि, साधु विदितं कस्मादिदं कथ्यते ।
वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते
न च्छायापि परोपकारकरिणी मार्गस्थितस्यापि मे ॥
क्योंकि महान् गुणवाला, अविषय में पड़े होने के कारण परभाग को प्राप्त न हुआ
कोई (व्यक्ति) स्वरूप वर्णन करने के लिए दोनों श्लोकों में तात्पर्य के कारण प्रस्तुत
है । अविवक्षित, जैसे—
'हे तुम कौन हो, कहता हूँ, 'मुझे दैव का मारा शाखोटक समझो', जैसे वैराग्य
से बोल रहे हो', 'तुमने ठीक समझा', 'यह क्यों' 'यह कहता हूँ?' बाईं ओर यहां
वटवृक्ष है, उसे पथिकजन सब प्रकार से सेवन करते हैं, मार्ग पर पड़े भी मेरी छाया
भी परोपकार करने वाली नहीं ।'
लोचनम्
भवति, तथापि तु यदि निर्बन्धस्तत्कथयामि वैराग्यादिति । काक्वा दैवहतकमि-
त्यादिना च सूचितं ते वैराग्यमिति यावत् । साधु विदितमित्युत्तरम् । कस्मादिति
वैराग्ये हेतुप्रश्नः । इदं कथ्यत इत्यादिसनिर्वेदस्मरणोपक्रमं कथंकथमपि निरू-
पणीयतयोत्तरम् । वामेनेति । अनुचितेन कुलादिनोपलक्षित इत्यर्थः । वट इति ।
च्छायामात्रकरणादेव फलदानादिशून्यादुद्धुरकन्धर इत्यर्थः । छायापीति ।
शाखोटको हि श्मशानाग्निज्वालालीढलतापल्लवादिश्चरुविशेषः ।
सुनने से निर्वेद होगा, तथापि यदि आग्रह है तो कहता हूँ । वैराग्य से— । काकु से
और 'दैव का मारा' इत्यादि से तुम्हारा वैराग्य मालूम हो गया । 'तुमने ठीक समझा'
यह उत्तर है । 'क्यों' यह वैराग्य के सम्बन्ध में हेतु प्रश्न है । 'यह कहता हूँ' इत्यादि
निर्वेदसहित स्मरण का उपक्रम करते हुए किसी-किसी प्रकार, निरूपणीय होने के
कारण उत्तर है । बाईं ओर—। अर्थात् अनुचित कुल आदि से उपलक्षित । वट वृक्ष—।
अर्थात् फलदान आदि से रहित केवल छाया करने से ऊपर कंधा किए हुए । छाया
भी—। श्मशान की आग की ज्वाला से झुलसे लता-पल्लवों आदि वाला कोई वृक्ष
'शाखोटक' है ।
५२४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
न हि वृक्षविशेषेण सहोक्तिप्रत्युक्तो सम्भवत इत्यविवक्षिताभिधे-
येनैवानेन श्लोकेन समृद्धासत्पुरुषसमीपवर्तिनो निर्धनस्य कस्यचिन्म-
नस्विनः परिदेवितं तात्पर्येण वाक्यार्थीकृतमिति प्रतीयते ।
विवक्षितत्वाविवक्षितत्वं यथा—
उप्पहजाआएँ असोहिणीएँ फलकुसुमपत्तरहिआए
वेरीएँ वइं देन्तो पामर हो ओहसिज्जिहसि ॥
अत्र हि वाच्यार्थो नात्यन्तं सम्भवी न चासम्भवी । तस्माद्वा-
च्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्ये यत्नतो निरूपणीये ।
किसी वृक्ष के साथ बातचीत सम्भव नहीं, इसलिए अविवक्षित अभिधेय वाले ही
इस श्लोक से समृद्ध असत्पुरुष के समीप रहनेवाले किसी निर्धन मनस्वी का निर्वेद-
वचन तात्पर्य द्वारा वाक्यार्थ किया गया है, यह प्रतीत होता है । विवक्षित-अविवक्षित
जैसे—
'हे पामर, कुमार्ग में पैदा हुई, अशोभन, फल और फूल और पत्तोंरहित बदरी
को बोता हुआ तू उपहास का पात्र बनेगा ।'
यहां वाच्य अर्थ अत्यन्त सम्भवी है और न असम्भवी है । इसलिए वाच्य और
व्यङ्ग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य का यत्नपूर्वक निरूपण करना चाहिए ।
लोचनम्
अत्राविवक्षायां हेतुमाह—न हीति । समृद्धो योऽसत्पुरुषः । 'समृद्धसत्पुरुष'
इति पाठे समृद्धेन ऋद्धिमात्रेण सत्पुरुषो न तु गुणादिनेति व्याख्येयम् । नात्य-
न्तमिति । वाच्यभावनियमो नास्तीति न शक्यं वक्तुं, व्यङ्ग्यस्यापि भावादिति
तात्पर्यम् । तथा हि उत्पथजाताया इति न तथाकुलोद्भूतायाः । अशोभनाया
इति लावण्यरहितायाः । फलकुसुमपत्त्ररहिताया इत्येवम्भूतापि काचित्पुत्रिणी
वा भ्रात्रादिपक्षपरिपूर्णतया सम्बन्धिवर्गपोषिता वा परिरक्ष्यते । बदर्या वृत्तिं
ददत्पामर भोः, हसिष्यसे सर्वलोकैरिति भावः । एवमप्रस्तुतप्रशंसां प्रसङ्गतो
यहां अविवक्षा में हेतु कहते हैं—किसी वृक्ष—। समृद्ध जो असत्पुरुष । 'समृद्ध-
सत्पुरुष' इस पाठ में समृद्ध से अर्थात् ऋद्धिमात्र से सत्पुरुष, न कि गुण आदि से, ऐसा
व्याख्यान करना चाहिए । अत्यन्त—। तात्पर्य यह कि वाच्य का सम्भव नहीं है यह नहीं
कह सकते, क्योंकि व्यङ्ग्य भी सम्भव है । जैसा कि कुमार्ग में पैदा हुई अर्थात् उस प्रकार
कुलीन नहीं। अशोभन अर्थात् लावण्यरहित । फल, फूल और पत्तों से रहित, इस प्रकार
की भी कोई पुत्रवाली अथवा भाई आदि के भरे होने से अथवा संवन्धि-वर्ग द्वारा पोषित
होकर रक्षित होती है । हे पामर, बदरी को बोता हुआ सभी लोगों द्वारा उपहास का
पात्र बनेगा, यह भाव है । इस प्रकार अप्रस्तुतप्रशंसा को प्रसङ्गतः निरूपण करके
तृतीय उद्योतः ५२५
ध्वन्यालोकः
प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्ग्यस्यैवं व्यवस्थिते
काव्ये उभे ततोऽन्यद्यत्तच्चित्रमभिधीयते ॥ ४१ ॥
चित्रं शब्दार्थभेदेन द्विविधं च व्यवस्थितम् ।
तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं वाच्यचित्रमतः परम् ॥ ४२ ॥
व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्राधान्ये ध्वनिसंज्ञितकाव्यप्रकारः गुणीभावे तु
गुणीभूतव्यङ्ग्यता । ततोऽन्यद्रसभावादितात्पर्यरहितं व्यङ्ग्यार्थविशे-
षप्रकाशनशक्तिशून्यं च काव्यं केवलवाच्यवाचकवैचित्र्यमात्राश्रयेणो-
पनिबद्धमालेख्यप्रख्यं यदाभासते तच्चित्रम् । न तन्मुख्यं काव्यम् ।
काव्यानुकारो ह्यसौ । तत्र किञ्चिच्छब्दचित्रं यथा दुष्करयमकादि ।
प्रधानाभाव और गुणभाव के द्वारा इस प्रकार व्यङ्ग्य के व्यवस्थित होने पर काव्य
दो प्रकार के हैं, उनसे जो अन्य है वह 'चित्र' कहलाता है ॥ ४१ ॥
शब्द और अर्थ के भेद से चित्र दो प्रकार का होता है, उनमें कुछ शब्दचित्र होता
है, उससे दूसरा वाच्यचित्र ॥ ४२ ॥
व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि नाम का काव्य प्रकार होता है, गुणभाव में
गुणीभूतव्यङ्ग्यता होती है। उनसे अन्य रस, भाव आदि के तात्पर्य से रहित और
व्यङ्ग्य अर्थ की प्रकाशन की शक्ति से शून्य काव्य केवल वाच्य और वाचक के वैचित्र्य-
मात्र के आश्रय से उपनिबद्ध होकर जो आलेख्य ( चित्र ) की भांति मालूम होता है
वह 'चित्र' है । वह मुख्य काव्य नहीं है। वह काव्य का अनुकरण है । उनमें कुछ
शब्दचित्र हैं, जैसे दुष्कर यमक आदि । उस शब्दचित्र से अन्य, व्यङ्ग्य अर्थ के संस्पर्श से
लोचनम्
निरूप्य प्रकृतमेव यन्निरूपणीयं तदुपसंहरति—तस्मादिति । अप्रस्तुतप्रशंसा-
यामपि लावण्येत्यत्र श्लोके यस्माद्व्यामोहो लोकस्य दृष्टस्ततो हेतोरित्यर्थः ॥४०॥
एवं व्यङ्ग्यस्वरूपं निरूप्य सर्वथा यत्तच्छून्यं तत्र का वार्तेति निरूपयितु-
माह—प्रधानेत्यादिना । कारिकाद्वयेन ।
प्रकृत ही जो निरूपणीय है उसका उपसंहार करते हैं—इस लिए—। अर्थात् अप्रस्तुत-
प्रशंसा में भी 'लावण्यद्रविण०' इस श्लोक में जो लोगों का व्यामोह देखा जा चुका है
उस कारण ॥ ४० ॥
इस प्रकार व्यङ्ग्य का स्वरूप-निरूपण करके जो सर्वथा उस (व्यङ्ग्य) से शून्य
है उसकी बात क्या, यह निरूपण करने के लिए कहते हैं—प्रधान—। इत्यादि दो
५२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
वाच्यचित्रं ततः शब्दचित्रादन्यद्व्यङ्ग्यार्थसंस्पर्शरहितं प्राधान्येन
वाक्यार्थतया स्थितं रसादितात्पर्यरहितमुत्प्रेक्षादि ।
अथ किमिदं चित्रं नाम ? यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शः । प्रती-
यमानो ह्यर्थस्त्रिभेदः प्राक्प्रदर्शितः । तत्र यत्र वस्त्वलङ्कारान्तरं वा
व्यङ्ग्यं नास्ति स नाम चित्रस्य कल्प्यतां विषयः । यत्र तु रसादीना-
मविषयत्वं स काव्यप्रकारो न सम्भवत्येव । यस्मादवस्तुसंस्पर्शिता
काव्यस्य नोपपद्यते । वस्तु च सर्वमेव जगद्गतमवश्यं कस्यचिद्र-
सस्य भावस्य वाऽङ्गत्वं प्रतिपद्यते अन्ततो विभावत्वेन । चित्तवृत्तिवि-
शेषा हि रसादयः, न च तदस्ति वस्तु किञ्चिद्यन्न चित्तवृत्तिविशेष-
रहित, प्राधान्य अर्थात् वाक्यार्थरूप से स्थित, एवं रस आदि के तात्पर्य से रहित
उत्प्रेक्षा आदि वाच्यचित्र हैं।
'यह 'चित्र' क्या है ? जहां प्रतीयमान अर्थ का संस्पर्श न हो । प्रतीयमान अर्थ
तीन प्रकार का पहले प्रदर्शित हो चुका है। वहां जहां वस्तु अथवा अलङ्कारान्तर
व्यङ्ग्य नहीं है वह चित्र का विषय समझ लीजिए । परन्तु जहां रसादि का विषयत्व
नहीं वह काव्य का प्रकार हो सकता ही नहीं । क्योंकि काव्य में वस्तुसंस्पर्श का
अभाव नहीं बन सकता और संसार की सभी वस्तुएँ अवश्य किसी रस का अथवा
भाव की अङ्ग बन जाती है, अन्ततः विभावरूप से । रसादि चित्तवृत्ति विशेष हैं।
वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो चित्तवृत्तिविशेष को उत्पन्न नहीं करती, यदि वह उसे
लोचनम्
शब्दचित्रमिति । यमकचक्रबन्धादिचित्रतया प्रसिद्धमेव तत्तुल्यमेवार्थचित्रं मन्त-
व्यमिति भावः। आलेख्यप्रख्यमिति। रसादिजीवरहितं मुख्यप्रतिकृतिरूपं चेत्यर्थः।
अथ किमिदमिति । आक्षेपे वक्ष्यमाण आशयः । अत्रोत्तरम्—यत्र नेति ।
आक्षेप्ता स्वाभिप्रायं दर्शयति—प्रतीयमान इति । अवस्तुसंस्पर्शितेति । कचटत-
पादिवन्निरर्थकत्वं दशदाडिमादिवदसंबद्धार्थत्वं वेत्यर्थः ।
कारिकाओं से । शब्दचित्र—। भाव यह कि यमक, चित्रबन्ध आदि चित्ररूप से प्रसिद्ध
ही हैं, उनके तुल्य ही अर्थचित्र को समझना चाहिए। आलेख्य की भांति—। अर्थात्
रसादिरूप जीव से रहित और मुख्य अनुकरणरूप ।
यह चित्र—। आक्षेप में वक्ष्यमाण आशय है । यहां उत्तर है—जहां प्रतीय-
मान—। आक्षेप करनेवाला अपना अभिप्राय दिखाता है—प्रतीयमान—। वस्तु संस्पर्श
का अभाव—। अर्थात् क च ट त प आदि की भांति निरर्थक होगा अथवा दशदाडिम
आदि की भांति असम्बद्धार्थ होगा ।
तृतीय उद्योतः ५२७
ध्वन्यालोकः
मुपजनयति तदनुत्पादने वा कविविषयतैव तस्य न स्यात् कविविष-
यश्च चित्रतया कश्चिन्निरूप्यते ।
अत्रोच्यते—सत्यं न तादृक्काव्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनाम-
प्रतीतिः । किं तु यदा रसभावादिविवक्षाशून्यः कविः शब्दालङ्कार-
मर्थालङ्कारं वोपनिबध्नाति तदा तद्विवक्षापेक्षया रसादिशून्यतार्थस्य
उत्पन्न न करे तो वह कवि का विषय ही नहीं होगी और कुछ कवि का विषय चित्र-
रूप से निरूपण किया जाता है ।
यहां कहते हैं—ठीक है, वह काव्य का कोई प्रकार नहीं है जहां रसादि की
प्रतीति न हो । किन्तु जब रस, भाव आदि की विवक्षा से रहित कवि शब्दालङ्कार अथवा
अर्थालङ्कार का उपनिबन्धन करता है तब उसकी विवक्षा की अपेक्षा अर्थ रसादि-
लोचनम्
ननु मा भूत्कविविषय इत्याशङ्क्याह—कविविषयश्चेति । काव्यरूपतया
यद्यपि न निर्दिष्टस्तथापि कविगोचरीकृत एवासौ वक्तव्यः अन्यस्य वासुकि-
वृत्तान्ततुल्यस्येहाभिधानायोगात् कवेश्चेद्गोचरो नूनममुना प्रीतिर्जनयितव्या
सा चावश्यं विभावानुभावव्यभिचारिपर्यवसायिनीति भावः । किं त्विति ।
विवक्षा तत्परत्वेन नाङ्गत्वेन कथंचन ।
इत्यादियोऽलंकारनिवेशने समीक्षाप्रकार उक्तस्तं यदा नानुसरतीत्यर्थः ।
रसादिशून्येति । नैव तत्र रसप्रतीतिरस्ति यथा पाकानभिज्ञसूदविरचिते मांस-
पाकविशेषे । ननु वस्तुसौन्दर्यादवश्यं भवति कदाचित्तास्वादोऽकुशलकृता-
कवि का विषय मत हो (तो क्या हानि है !) यह आशंका करके कहते हैं—
और कवि का विषय—। भाव यह कि काव्यरूप से यद्यपि निर्दिष्ट नहीं है तथापि
उसे कवि द्वारा गोचरीकृत ही कहना चाहिए क्योंकि वासुकि के वृत्तान्त के सदृश अन्य
का यहाँ अभिधान नहीं है, यदि कवि का गोचर है तो निश्चय ही इसे प्रीति उत्पन्न
करनी चाहिए, और वह (प्रीति) अवश्य ही विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी में
पर्यवसित होती है । किन्तु—। अर्थात् 'तत्पररूप से विवक्षा होनी चाहिए, अङ्गीरूप
से नहीं होनी चाहिए' इत्यादि जो अलङ्कार के निवेशन में समीक्षा का प्रकार कहा है
जब उसे अनुसरण नहीं करता है । रसादिशून्यता—।
वहाँ रस की प्रतीति नहीं ही है, जैसे पाकक्रिया को न जानने वाले रसोइया के
बनाये हुए किसी मांस के पाक में । वस्तु के सौन्दर्य से भी उस प्रकार का आस्वाद
कदाचित् हो सकता है जैसे अकुशल व्यक्ति द्वारा (दही आदि को मिलाकर बनाई
५२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
परिकल्प्यते । विवक्षोपारूढ एव हि काव्ये शब्दानामर्थः । वाच्यसाम-
र्ध्यवशेन च कविविवक्षाविरहेऽपि तथाविधे विषये रसादिप्रतीतिर्भवन्ती
परिदुर्बला भवतीत्यनेनापि प्रकारेण नीरसत्वं परिकल्प्य चित्रविषयो
व्यवस्थाप्यते । तदिदमुक्तम्—
'रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति ।
अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥
रसादिषु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यवती यदा ।
तदा नास्त्येव तत्काव्यं ध्वनेर्यत्र न गोचरः ॥'
शून्यता मानी जाती है । क्योंकि काव्य में शब्दों का अर्थ (कवि की) विवक्षा के
उपारूढ ही होता है । और वाच्य की सामर्थ्य के वश कवि की विवक्षा के न होने पर
भी उस प्रकार के विषय में रसादि की प्रतीति होती हुई बहुत दुर्बल होती है, इस
प्रकार से भी नीरसत्व को मान कर चित्र का विषय व्यवस्थित करते हैं । इसलिए
यह कहा है—
'रस, भाव आदि के विषय की विवक्षा न होने पर जो अलङ्कार का निबन्ध है वह
'चित्र' का विषय माना गया है ।
परन्तु जब रसादि में तात्पर्य रखनेवाली विवक्षा हो तब वह काव्य नहीं है जहाँ
ध्वनि का गोचर न हो ।
लोचनम्
यामपि शिखरिण्यामिवेत्याशङ्क्याह—वाच्येत्यादि । अनेनापीति । पूर्वं सर्वथा
तच्छून्यत्वमुक्तमधुना तु दौर्बल्यमित्यपिशब्दस्यार्थः । अज्ञकृतायां च शिखरि-
ण्यामहो शिखरिणीति न तज्ज्ञानाच्चमत्कारः अपि तु दधिगुडमरिचं चैतदसम-
ञ्जसयोजितमिति वक्तारो भवन्ति । उक्तमिति । मयैवेत्यर्थः ।
अलङ्काराणां शब्दार्थगतानां निबन्ध इत्यर्थः । ननु 'तच्चित्रमभिधीयते'
हुई) शिखरिणी में, यह आशङ्का करके कहते हैं—वाच्य की सामर्थ्य के वश—। इस
प्रकार से भी—। पहले तो उस (रसादि) का सर्वथा शून्यत्व कहा है परन्तु अब दौर्बल्य
को (कहते हैं) यह 'भी' शब्द का अर्थ है । बेवकूफ द्वारा रचित शिखरिणी में 'कमाल
की शिखरिणी है' यह चमत्कार उसके ज्ञान से नहीं होता बल्कि 'यह दही, गुड़ और
और मरिच को बेकायदे डालकर बनाया गया है' यह कहने वाले हो जाते हैं ।
कहा है—। अर्थात् मैंने ही ।
अर्थात् शब्दगत और अर्थगत अलङ्कारों का निबन्ध । तो उस चित्र का अभिधान
तृतीय उद्योतः ५२९
ध्वन्यालोकः
एतच्च चित्रं कवीनां विश्रृङ्खलगिरां रसादितात्पर्यमनपेक्ष्यैव काव्य-
प्रवृत्तिदर्शनादस्माभिः परिकल्पितम् । इदानीन्तनानां तु न्याय्ये
काव्यनयव्यवस्थापने क्रियमाणे नास्त्येव ध्वनिव्यतिरिक्तः काव्य-
प्रकारः । यतः परिपाकवतां कवीनां रसादितात्पर्यविरहे व्यापार
एव न शोभते । रसादितात्पर्ये च नास्त्येव तद्वस्तु यदभिमतरसाङ्गतां
नीयमानं न प्रगुणीभवति । अचेतना अपि हि भावा यथायथमुचित-
रसविभावतया चेतनवृत्तान्तयोजनया वा न सन्त्येव ते ये यान्ति न
रसाङ्गताम् । तथा चेदमुच्यते—
और निरङ्कुश वाणी वाले कवियों की रसादि के तात्पर्य की अपेक्षा न करके ही
प्रवृत्ति देखी जाने से हमने इस 'चित्र' की परिकल्पना की है । परन्तु न्यायानुकूल
काव्यमार्ग का व्यवस्थापन हो जाने पर अब के कवियों के लिए ध्वनि से व्यतिरिक्त
काव्य का प्रकार नहीं ही है । क्योंकि परिपाक वाले कवियों का रसादि के तात्पर्य के
अभाव में व्यापार ही नहीं शोभा देता । और रसादि के तात्पर्य में वह वस्तु नहीं ही
है जो अभिमत रस का अंग होती हुई प्रगुण न हो जाती हो । अचेतन भी वे भाव
यथानुकूल उचित रस के विभाव के रूप में अथवा चेतन वृत्तान्त की योजना से नहीं
ही हैं जो रस का अङ्ग नहीं बन जाते हैं । जैसा कि यह कहते हैं—
लोचनम्
इति किमनेनोपदिष्टेन । अकाव्यरूपं हि तदिति कथितम् । हेयतया तदुपदि-
श्यत इति चेत्—घटे कृते कविर्न भवतीत्येतदपि वक्तव्यमित्याशङ्क्य कविभिः
खलु तत्कृतमतो हेयतयोपदिश्यत इत्येतन्निरूपयति—एतच्चेत्यादिना । परिपाक-
वतामिति । शब्दार्थविषयो रसौचित्यलक्षणः परिपाको विद्यते येषाम् ।
यत्पदानि त्यजन्त्येव परिवृत्तिसहिष्णुताम् ।
करते हैं' इस उपदेश से क्या लाभ ? क्योंकि उसे अकाव्यरूप कह चुके हैं । यदि
कहें कि 'हेय रूप होने से उसका उपदेश करते हैं तो 'घट निर्माण करने पर कवि नहीं
होता है' यह भी कहना चाहिए, यह आशङ्का करके यह निरूपण करते हैं कि कवियों
ने उसे किया है इसलिए हेयरूप से उसका निरूपण करते हैं—और निरङ्कुश—।
परिपाक वाले—। शब्द और अर्थ का रसौचित्यरूप परिपाक है जिनका ।
'जो कि पद परिवर्तन का सहन नहीं ही करते ( उसे शब्दन्यास में निष्णात लोग
शब्दपाक कहते हैं )' ।
३४ ध्व०
५३० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः ।
यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥
शृङ्गारी चेत्कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् ।
स एव वीतरागश्चेन्नीरसं सर्वमेव तत् ॥
भावानचेतनानपि चेतनवच्चेतनानचेतनवत् ।
व्यवहारयति यथेष्टं सुकविः काव्ये स्वतन्त्रतया ॥
अपार काव्य-संसार में कवि एक प्रजापति है जिस प्रकार उसे विश्व लगता है
उस प्रकार उसे बदल देता है ।
यदि कवि काव्य में शृंगारी है तो संसार रसमय हो गया और वही वीतराग है
तो सभी वह नीरस हो गया ।
सुकवि स्वतन्त्ररूप से काव्य में अचेतन भी भावों को चेतन की भांति और
चेतन को अचेतन की भांति यथेष्ट व्यवहार करता है ।
लोचनम्
इत्यपि रसौचित्यशरणमेव वक्तव्यमन्यथा निर्हेतुकं तत् । अपार इति ।
अनाद्यन्त इत्यर्थः । यथारुचि परिवृत्तिमाह—शृङ्गारीति । शृङ्गारोक्तविभावानु-
भावव्यभिचारिचर्वणारूपप्रतीतिमयो न तु स्त्रीव्यसनीति मन्तव्यम् । अत एव
भरतमुनिः—'कवेरन्तर्गतं भावं' 'काव्यार्थान् भावयति' इत्यादिषु कविशब्दमेव
मूर्धाभिषिक्ततया प्रयुङ्क्ते । निरूपितं चैतद्रसस्वरूपनिर्णयावसरे । जगदिति ।
तद्रसनिमज्जनादित्यर्थः । शृङ्गारपदं रसोपलक्षणम् । स एवेति । यावद्रसिको न
भवति तदा परिदृश्यमानोऽप्ययं भाववर्गो यद्यपि सुखदुःखमोहमाध्यस्थ्यमात्रं
लौकिकं वितरति, तथापि कविवर्णनोपारोहं विना लोकातिक्रान्तरसास्वादभुवं
नाधिशेत इत्यर्थः । चारुत्वातिशयं यन्न पुष्णाति तन्नास्त्येवेति संबन्धः ।
यह रसौचित्य की शरण में ही कहना चाहिए, अन्यथा उसका कोई कारण न होगा ।
अपार—। अर्थात् आदि-अन्त रहित । रुचि के अनुसार परिवर्तन कहते हैं—शृङ्गारी—।
शृङ्गार के उक्त विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी की चर्वणारूप प्रतीति
रखने वाला, न कि स्त्रीव्यसनी, ऐसा समझना चाहिए । अतएव भरत मुनि 'कवि के
अन्तर्गत भाव को' 'काव्य के अर्थों का भावन करता है' इत्यादि में 'कवि' शब्द को
ही मूर्धाभिषिक्त रूप से प्रयोग करते हैं । रसस्वरूप के निर्णय के अवसर में इसे
निरूपण कर चुके हैं । संसार—। अर्थात् उस रस में डूब जाने से (रसमय हो गया) ।
'शृङ्गार' पद रस का उपलक्षण है । वही—। अर्थात् जब तक रसिक नहीं होता तब
तक परिदृश्यमान भी यह भावसमूह यद्यपि लौकिक सुख, दुःख, मोह के माध्यस्थ्य
(अनुभव) मात्र का वितरण करता है तथापि कवि के वर्णन के उपारोह के बिना
अलौकिक रसास्वाद की भूमि को नहीं प्राप्त करता । जो अतिशय चारुत्व की पुष्टि
तृतीय उद्योतः ५३१
ध्वन्यालोकः
तस्मान्नास्त्येव तद्वस्तु यत्सर्वात्मना रसतात्पर्यवतः कवेस्तदि-
च्छया तदभिमतरसाङ्गतां न धत्ते । तथोपनिबध्यमानं वा न चारुत्वा-
तिशयं पुष्णाति । सर्वमेतच्च महाकवीनां काव्येषु दृश्यते । अस्माभि-
रपि स्वेषु काव्यप्रबन्धेषु यथायथं दर्शितमेव । स्थिते चैवं सर्व एव
काव्यप्रकारो न ध्वनिधर्मतामतिपतति रसाद्यपेक्षायां कवेर्गुणीभूतव्य-
ङ्ग्यलक्षणोऽपि प्रकारस्तदङ्गतामवलम्बत इत्युक्तं प्राक् । यदा तु
चाटुषु देवतास्तुतिषु वा रसादीनामङ्गतया व्यवस्थानं हृदयवतीषु च
इसलिए रस में तात्पर्य रखनेवाले कवि की कोई वह वस्तु नहीं है जो सब प्रकार
से उसकी इच्छा से उसके अभिमत रस का अङ्गभाव नहीं प्राप्त करती है अथवा उस
प्रकार उपनिबध्यमान होकर अतिशय चारुत्व को नहीं बढ़ाती है । और यह सब
महाकवियों के काव्यों में देखा जाता है । हमने भी अपने काव्य-प्रबन्धों में यथानुसार
दिखाया ही है । और इस प्रकार स्थित होने पर सभी काव्य के प्रकार ध्वनि के धर्म-
भाव का अतिक्रमण नहीं करते, कवि की रसादि की अपेक्षा में गुणीभूतव्यङ्ग्य रूप
भी प्रकार उसका अङ्गभाव बन जाता है यह पहले कह चुके हैं । जब चाटुओं में
अथवा देवता की स्तुतियों में रसादि का अंगरूप से व्यवस्थान होता है और हृदय-
लोचनम्
स्वेष्विति । विषमबाणलीलादिषु । हृदयवतीष्विति । 'हिअअललिआ' इति
प्राकृतकविगोष्ठ्यां प्रसिद्धासु । त्रिवर्गोपायोपेयकुशलासु सप्रज्ञाकाः सहृदया
उच्यन्ते । तद्यथा यथा भट्टेन्दुराजस्य—
लङ्घिअगअणा फलहीलआओ होन्तुत्ति वड्ढअन्तीअ ।
हालिअस्स आसिसं पालिवेसवतुआ विणिठ्ठविआ ॥
अत्र लङ्घितगगना कर्पासलता भवन्त्विति हालिकस्याशिषं वर्धयन्त्या
नहीं करता वह नहीं ही है यह ( वाक्य का ) सम्बन्ध है । अपने काव्य-प्रबन्धों में—।
'विषमबाणलीला' आदि में । हृदयवती—। 'हिअअललिआ' इस प्रकार से प्राकृत
कवियों की गोष्ठियों में प्रसिद्ध ( गाथाओं में ) । धर्म आदि त्रिवर्ग के उपाय रूप ज्ञातव्य
में कुशल ( गोष्ठियों में ) सप्रज्ञक लोग सहृदय कहे जाते हैं । वह गाथा जैसे भट्ट
इन्दुराज की—
'कपास की लत्तरें आकाश को लांघ जांय' यह हालिक को बार-बार असीसती
हुई पड़ोस में रहने वाली स्त्री बहुत आनन्दित हुई ।'
यहाँ 'कपास की लत्तरें आकाश को लांघ जांय' यह हालिक को बार-बार असीसती
५३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
सप्रज्ञकगाथासु कासुचिद्व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्ये प्राधान्यं तदपि गुणीभूत-
व्यङ्ग्यस्य ध्वनिनिष्यन्दभूतत्वमेवेत्युक्तं प्राक् । तदेवमिदानींतनकवि-
काव्यनयोपदेशे क्रियमाणे प्राथमिकानामभ्यासार्थिनां यदि परं चित्रेण
व्यवहारः, प्राप्तपरिणतीनां तु ध्वनिरेव काव्यमिति स्थितमेतत् ।
तदयमत्र संग्रहः—
यस्मिन् रसो वा भावो वा तात्पर्येण प्रकाशते ।
संवृत्त्याभिहितौ वस्तु यत्रालङ्कार एव वा ॥
वती सप्रज्ञक जनों ( सहृदयों ) की किन्ही गाथाओं में व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य में प्राधान्य
हो तब भी गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनि का निष्पन्द रूप ही है यह पहले कह चुके हैं । तो
इस प्रकार आधुनिक कवि के काव्य के मार्ग का उपदेश किए जाने पर प्राथमिक
अभ्यासार्थी ( कवियों ) का चित्र से व्यवहार हो सकता है । परन्तु प्राप्त परिपाक
वालों के लिए ध्वनि ही काव्य है यह निश्चित है । तो यह यहां सङ्ग्रह है—
जिस काव्य के मार्ग में रस अथवा भाव तात्पर्यरूप से प्रकाशित हों, जहां वस्तु
लोचनम्
प्रातिवेश्यकवधुका निर्वृतिं प्रापिता इति चौर्यसंभोगाभिलाषिणीयमित्यनेन
व्यङ्ग्येन विशिष्टं वाच्यमेव सुन्दरम् ।
गोला कच्छकुडङ्गे भरेण जम्बूसु पच्चमाणासु ।
हलिअबहुआ णिअंसइ जम्बूरसरत्तं सिअअम् ॥
अत्र गोदावरीकच्छलतागहने भरेण जम्बूफलेषु पच्यमानेषु । हालिकवधूः
परिधत्ते जम्बूफलरसरक्तं निवसनमिति त्वरितचौर्यसंभोगसंभाव्यमानजम्बूफ-
लरसरक्तत्वपरभागनिह्ननं गुणीभूतव्यङ्ग्यमित्यलं बहुना ।
ध्वनिरेव काव्यमिति । आत्मात्मिनोरभेद एव वस्तुतो व्युत्पत्तये तु विभागः
कृत इत्यर्थः । वाग्रहणात्तदाभासादेः पूर्वोक्तस्य ग्रहणम् । संवृत्येति । गोप्यमान-
हुई पड़ोस में रहने वाली स्त्री बहुत आनन्दित हुई' इससे 'चौर्य सुरत की अभिलाषा
रखने वाली है' इस व्यङ्ग्य से विशिष्ट वाच्य ही सुन्दर है ।
'गोदावरी नदी के तीर पर जामुनों के खूब पक जाने पर हालिक की पत्नी जामुन
के रस में रंगा कपड़ा धारण करती है' यहां त्वरित चौर्यसम्भोग जो सम्भाव्यमान है
उसके लिए जामुन के रस की लाली से परभाग ( दूसरे अंश ) का गोपन गुणीभूतव्यङ्ग्य
है । अलं बहुना ।
ध्वनि ही काव्य है— । अर्थात् आत्मा और आत्मी ( शरीर ) का वस्तुतः अभेद
ही है, किन्तु विभाग व्युत्पत्ति के लिए किया है । 'अथवा' ग्रहण से पूर्वोक्त 'तदाभास'
आदि का ग्रहण है । गोपन के प्रकार से— । अर्थात् गोप्यमान रूप से प्राप्त सौन्दर्य
तृतीय उद्योतः ५३३
ध्वन्यालोकः
काव्याध्वनि ध्वनिर्व्यङ्ग्यप्राधान्यैकनिबन्धनः ।
सर्वत्र तत्र विषयी ज्ञेयः सहृदयैर्जनैः ॥
सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः सह प्रभेदैः स्वैः ।
सङ्करसंसृष्टिभ्यां पुनरप्युद्द्योतते बहुधा ॥ ४३ ॥
तस्य च ध्वनेः स्वप्रभेदैर्गुणीभूतव्यङ्ग्येन वाच्यालङ्कारैश्च सङ्कर-
संसृष्टिव्यवस्थायां क्रियमाणायां बहुप्रभेदता लक्ष्ये दृश्यते । तथाहि
स्वप्रभेदसङ्कीर्णः, स्वप्रभेदसंसृष्टो गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कीर्णो गुणीभूतव्य-
अथवा अलंकार ही गोपन के प्रकार से अभिहित हों, वहाँ सर्वत्र व्यङ्ग्य के प्राधान्य में
एकमात्र होनेवाले ध्वनि को सहृदयजन विषयी ( विषय वाला ) समझें ।
( वह ध्वनि ) गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलंकारों के साथ और अपने प्रभेदों के
साथ सङ्कर और संसृष्टि द्वारा फिर और भी बहुत प्रकार से प्रकाशित होता है ॥४३॥
वह ध्वनि अपने प्रभेदों से, गुणीभूतव्यङ्ग से और वाच्य अलङ्कारों से संकर और
संसृष्टि की व्यवस्था की जाने पर लक्ष्य में बहुत प्रभेदों वाला देखा जाता है । जैसा
कि अपने प्रभेद से संकीर्ण, अपने प्रभेद से संसृष्ट, गुणीभूतव्यङ्ग्य से सङ्कीर्ण, गुणीभूत-
लोचनम्
तया लब्धसौन्दर्य इत्यर्थः । काव्याद्ध्वनीति । काव्यमार्गे । विषयीति । स त्रिवि-
धस्य ध्वनेः काव्यमार्गो विषय इति यावत् ॥ ४१-४२ ॥
एवं श्लोकद्वयेन संग्रहार्थमभिधाय बहुप्रकारत्वप्रदर्शिकां पठति—सगुणीति ।
सहगुणीभूतव्यङ्ग्येन सहालंकारैर्यै वर्तन्ते स्वै ध्वनेः प्रभेदास्तैः संकीर्णतया
संसृष्ट्या वानन्तप्रकारो ध्वनिरिति तात्पर्यम् । बहुप्रकारतां दर्शयति—तथाहीति ।
स्वभेदैर्गुणीभूतव्यङ्ग्येनालंकारैः प्रकाश्यत इति त्रयो भेदाः । तत्रापि प्रत्येकं
संकरेण संसृष्ट्या चेति षट् । संकरस्यापि त्रयः प्रकाराः अनुग्राह्यानुग्राहकभावेन
संदेहास्पदत्वेनैकपदानुप्रवेशेनेति द्वादश भेदाः । पूर्वं च ये पञ्चत्रिंशद्भेदा
वाले । काव्य के मार्ग में—। विषयी—। वह काव्यमार्ग तीन प्रकार की ध्वनियों का
विषय है ॥ ४१, ४२ ॥
इस प्रकार दो श्लोकों से सङ्ग्रहार्थ का अभिधान करके ( ध्वनि का ) बहुप्रकारत्व
प्रदर्शन करने वाली ( कारिका को ) पढ़ते हैं—वह ध्वनि—। गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ,
अलङ्कारों के साथ जो हैं वे ध्वनि के अपने प्रभेद, उनसे संकीर्ण होने के कारण अथवा
संसृष्टि के कारण ध्वनि अनन्त प्रकार की है यह तात्पर्य है । बहुप्रकारता को दर्शति
हैं—जैसा कि—। अपने प्रभेदों के साथ, गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ, अलङ्कारों के साथ
प्रकाशित होता है यह तीन भेद हुए । उनमें भी प्रत्येक सङ्कर और संसृष्टि से छ हुए ।
संकर के भी तीन प्रकार हैं—अनुग्राह्यानुग्राहकभाव से, संदेहास्पद होने से और
५३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
ङ्ग्यसंसृष्टो वाच्यालङ्कारान्तरसङ्कीर्णो वाच्यालङ्कारान्तरसंसृष्टः संसृष्टा-
लङ्कारसङ्कीर्णः संसृष्टालङ्कारसंसृष्टश्चेति बहुधा ध्वनिः प्रकाशते ।
तत्र स्वप्रभेदसङ्कीर्णत्वं कदाचिदनुग्राह्यानुग्राहकभावेन । यथा—
'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादौ । अत्र ह्यर्थशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्य-
ध्वनिप्रभेदेनालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिप्रभेदोऽनुगृह्यमाणः प्रतीयते । एवं
कदाचित्प्रभेदद्वयसम्पातसन्देहेन । यथा—
व्यङ्ग्य से संसृष्ट, वाच्य अलङ्कारान्तर से सङ्कीर्ण, वाच्य अलङ्कारान्तर से संसृष्ट, संसृष्ट
अलङ्कार से सङ्कीर्ण और संसृष्ट अलङ्कार से संसृष्ट इस प्रकार बहुत प्रकार से ध्वनि
प्रकाशित होती है ।
उनमें, अपने प्रभेद से सङ्कीर्णत्व कभी अनुग्राह्यानुग्राहकभाव से होता है । जैसे—
'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादि में। यहां अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य (नामक)
ध्वनिप्रभेद द्वारा अलक्ष्यक्रमव्यंग्य (नाम का) ध्वनिप्रभेद अनुगृह्यमाण प्रतीत होता
है । इस प्रकार कभी दो प्रभेदों के सम्पात के संदेह से । जैसे—
लोचनम्
उक्तास्ते गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि मन्तव्याः। स्वप्रभेदास्तावन्तोऽलंकार इत्येकस-
प्रतिः । तत्र संकरत्रयेण संसृष्ट्या च गुणने द्वे शते चतुरशीत्यधिके । तावता
पञ्चत्रिंशतो मुख्यभेदानां गुणने सप्तसहस्राणि चत्वारि शतानि विंशत्यधिकानि
भवन्ति । अलंकाराणामानन्त्यात्वसंख्यत्त्वम् ।
तत्र व्युत्पत्तये कतिपयभेदेषूदाहरणानि दित्सुः स्वप्रभेदानां कारिकायाम-
न्यपदार्थत्वेन प्रधानतयोक्तत्वात्तदाश्रयाण्येव चत्वार्युदाहरणान्याह—तत्रेति ।
अनुगृह्यमाण इति । लज्जया हि प्रतीतया । अभिलाषशृङ्गारोऽत्रानुगृह्यते व्यभि-
चारिभूतत्वेन । क्षण उत्सवस्तत्र निमन्त्रणेनानीता हे देवर ! एषा ते जायया
एकपदानुप्रवेश से । इस प्रकार बारह भेद हुए । और पहले जो पैंतीस भेद कहे जा
चुके हैं वे गुणीभूतव्यङ्ग्य के भी माने जाने चाहिएँ । उतने (पैंतीस) अपने प्रभेद
अलङ्कार में भी, इस प्रकार इकहत्तर भेद हुए । वहाँ तीन संकर और संसृष्टि से गुणन
करने पर २८४ भेद हुए । उनके साथ पैंतीस मुख्य भेदों का गुणन करने पर सात हजार
चार सौ बीस (?) होते हैं । अलङ्कारों के आनन्त्य से (ध्वनिभेद) असंख्य हो जाता है ।
वहाँ व्युत्पत्ति के लिए कतिपय भेदों में उदाहरण देने के इच्छुक (वृत्तिकार) कारिका
में 'अपने प्रभेदों' के (दो बहुव्रीहियों में) अन्यपदार्थ होने से प्रधान रूप से उक्त होने के
कारण उनके आश्रित ही चार उदाहरणों को कहते हैं— उनमें—। अनुगृह्यमान—।
प्रतीत हुई लज्जा से । व्यभिचारी रूप से अभिलाष शृङ्गार यहाँ अनुगृहीत होता है ।
क्षण अर्थात् उत्सव, उसमें निमन्त्रण से लाई गई, हे देवर, यह तेरी पत्नी से कुछ कही
तृतीय उद्योतः ५३५
ध्वन्यालोकः
खणपाहुणिआ देअर एसा जाआएँ किंपि दे अणिदा ।
रुअइ पडोहरवलहीघरम्मि अणुणिज्जउ वराई ॥
( क्षणप्राघुणिका देवर एषा जायया किमपि ते भणिता ।
रोदिति शून्यवलभीगृहेऽनुनीयतां वराकी ॥ इति च्छाया । )
अत्र ह्यनुनीयतामित्येतत्पदमर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यत्वेन विव-
क्षितान्यपरवाच्यत्वेन च सम्भाव्यते । न चान्यतरपक्षनिर्णये प्रमाण-
मस्ति । एकव्यञ्जकानुप्रवेशेन तु व्यङ्ग्यत्वमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य
हे देवर, उत्सव में पाहुन बन कर आई हुई यह तेरी पत्नी कुछ कही जाने
पर रो रही है । बेचारी का सूनी अटारी में मनावन करो ।
यहाँ 'मनावन करो' यह पद अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यरूप से और विवक्षि-
तान्यपरवाच्यरूप से सम्भावित होता है । दोनों में किसी एक पक्ष के निर्णय में
प्रमाण नहीं है । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का एकव्यञ्जकानुप्रवेश से व्यङ्ग्यत्व अपने अन्य
लोचनम्
किमपि भणिता रोदिति । पडोहरे शून्ये वलभीगृहे अनुनीयतां वराकी । सा
तावद्देवरानुरक्ता तज्जायया विदितवृत्तान्तया किमप्युक्तेत्येषोक्तिस्तद्वृत्तान्तं
दृष्टवत्या अन्यस्यास्तद्देवरचौरकामिन्याः । तत्र तव गृहिण्यायं वृत्तान्तो ज्ञात
इत्युभयतः कलहायितुमिच्छन्त्येवमाह । तत्रार्थान्तरे संभोगेनैकान्तोचितेन परि-
तोष्यतामित्येवंरूपे वाच्यस्य संक्रमणम् । यदि वा त्वं तावदेतस्यामेवानुरक्त
इतीर्ष्याकोपात्तात्पर्यादनुनयनमन्यपरं विवक्षितम् । एषा तवेदानीमुचितमगहर्-
णीयं प्रेमास्पदमित्यनुनयो विवक्षितः, वयं त्विदानीं गर्हणीयाः संवृत्ता इत्येतत्प-
रतया उभयथापि च स्वाभिप्रायप्रकाशनादेकतरनिश्चये प्रमाणाभाव इत्युक्तम् ।
जाने पर रो रही है । पडोहर अर्थात् शून्य वलभी गृह (सूनी अटारी) में मनावन
करो । वह देवर में अनुराग करती है, वृत्तान्त जान कर उसकी (देवर की) पत्नी ने
उसे कुछ कह दिया' यह उस वृत्तान्त को देखने वाली अन्य उस देवर की चौरकामिनी
की उक्ति है । वहाँ 'तुम्हारी घर वाली ने यह वृत्तान्त जान लिया है' दोनों ओर लड़ाई
लगाना चाहती हुई इस प्रकार कहती है । वहां 'एकान्त में उचित सम्भोग से उसे
परितुष्ट करो' इस प्रकार के अर्थान्तर में वाच्य का सङ्क्रमण है । अथवा 'तुम तो इसी
में अनुरक्त हो' इस ईर्ष्याकोप के तात्पर्य से अन्य पर (ईर्ष्या कोप व्यङ्ग्य में तात्पर्य
वाला) अनुनयन विवक्षित है । 'इस समय यह तुम्हारे लिये उचित अगर्हणीय प्रेमास्पद
है' इस प्रकार अनुनय विवक्षित है, 'हम तो अब गर्हणीय हो गईं' इसमें तात्पर्य होने के
कारण और दोनों में अपना अभिप्राय प्रकाशन करने से एकतरफे निश्चय में प्रमाण
५३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
स्वप्रभेदान्तरापेक्षया बाहुल्येन सम्भवति। यथा—‘स्निग्धश्यामल’
इत्यादौ। स्वप्रभेदसंसृष्टत्वं च यथा पूर्वोदाहरण एव। अत्र ह्यर्थान्तर-
संक्रमितवाच्यस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्यस्य च संसर्गः। गुणीभूतव्यङ्ग्य-
सङ्कीर्णत्वं यथा—‘न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयः’ इत्यादौ। यथा वा—
प्रभेदों की अपेक्षा करने से बहुत हो सकता है। जैसे—‘स्निग्ध श्यामल’ इत्यादि में।
अपने प्रभेद से संसृष्टत्व, जैसे पहले उदाहरण में ही। यहां अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य
का और अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य का संसर्ग है। गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कीर्णत्व जैसे—
‘न्यक्कारो ह्ययमेव मे’ इत्यादि में। अथवा जैसे—
लोचनम्
विवक्षितस्य हि स्वरूपस्थस्यैवान्यपरत्वम्, संक्रान्तिस्तु तस्यैतद्रूपतापत्तिः।
यदि वा देवरानुरक्ताया एव तं देवरमन्यया सहावलोकितसंभोगवृत्तान्तं प्रतीय-
मुक्तिः, देवरेत्यामन्त्रणात्। पूर्वव्याख्याने तु तदपेक्षया देवरेत्यामन्त्रणं व्याख्या-
तम्। बाहुल्येनेति। सर्वत्र काव्ये रसादितात्पर्यं तावदस्ति तत्र रसध्वनेर्भावध्व-
नेश्चैकेन व्यञ्जकेनाभिव्यञ्जनं स्निग्धश्यामलेत्यत्र विप्रलम्भशृङ्गारस्य तद्व्यभि-
चारिणश्च शोकावेगात्मनश्चर्वणीयत्वात्। एवं त्रिविधं संकरं व्याख्याय संसृष्टि-
मुदाहरति—स्वप्रभेदेति। अत्र हीति। लिप्तशब्दादौ तिरस्कृतो वाच्यः, रामादौ
तु संक्रान्त इत्यर्थः।
एवं स्वप्रभेदं प्रति चतुर्भेदानुदाहृत्य गुणीभूतव्यङ्ग्यं प्रत्युदाहरति—गुणी-
भूतेति।
नहीं है यह कहा है। विवक्षित (वाच्य) का अपने रूप में स्थित अवस्था में ही
अन्यपरत्व है, किन्तु संक्रान्ति उसका अन्य रूप को प्राप्त होना है। अथवा देवर में
अनुरक्त ही (नायिका) की अन्य नायिका के साथ जिसका सम्भोग वृत्तान्त देख चुकी
ऐसे देवर के प्रति यह उक्ति है, क्योंकि ‘देवर’ यह आमन्त्रण है। किन्तु पूर्व व्याख्यान
में उसकी (जो पाहुन है) अपेक्षा से ‘देवर’ यह आमन्त्रण व्याख्यात है। बहुत—।
सभी काव्य में रसादि का तात्पर्य है, वहां रसध्वनि और भावध्वनि का एक व्यञ्जक
द्वारा अभिव्यञ्जन है क्योंकि ‘स्निग्धश्यामल’ यहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार और शोकावेग रूप
व्यभिचारी चर्वणीय हैं। इस प्रकार त्रिविध शङ्कर का व्याख्यान करके संसृष्टि का
उदाहरण देते हैं—अपने प्रभेद—। यहाँ—। अर्थात् ‘लिप्त’ आदि शब्द में वाच्य
तिरस्कृत है और ‘राम’ आदि में संक्रान्त है।
इस प्रकार अपने प्रभेद के प्रति चार भेदों को उदाहृत करके गुणीभूतव्यङ्ग्य के
प्रति उदाहरण देते हैं—गुणीभूत—।
तृतीय उद्योतः ५३७
ध्वन्यालोकः
कर्ता द्यूतच्छलानां जतुमयशरणोद्दीपनः सोऽभिमानी
कृष्णाकेशोत्तरीयव्यपनयनपटुः पाण्डवा यस्य दासाः ।
राजा दुःशासनादेर्गुरुरनुजशतस्याङ्गराजस्य मित्रं
क्वास्ते दुर्योधनोऽसौ कथयत न रुषा द्रष्टुमभ्यागतौ स्वः ॥
अत्र ह्यलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य वाक्यार्थीभूतस्य व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्या-
जुये के छल करनेवाला, लाह का बना घर जलाने वाला, वह अभिमानी, द्रौपदी
के केश और उत्तरीय को हटाने में चतुर, पाण्डव जिसके दास हैं, दुःशासन आदि सौ
भाइयों में बड़ा, अङ्गराज कर्ण का मित्र वह दुर्योधन कहां है ? बताओ, हम दोनों
क्रोध से नहीं, ( केवल ) देखने के लिए आये हैं ।
वहां वाक्यार्थीभूत अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य का अभिधान
लोचनम्
अत्र हीत्युदाहरणद्वयेऽपि । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्येति । रौद्रस्य व्यङ्ग्यविशिष्टे-
त्यनेन गुणता व्यङ्ग्यस्योक्ता । पदैरित्युपलक्षणे तृतीया । तेन तदुपलक्षिता
योऽर्थो व्यङ्ग्यगुणीभावेन वर्तते तेन संमिश्रता संकीर्णता । सा चानुग्राह्यानु-
ग्राहकभावेन सन्देहयोगेनैकव्यञ्जकानुप्रवेशेन चेति यथासंभवमुदाहरणद्वये
योज्या । तथा हि-मे यदय इत्यादिभिः सर्वैरेव पदार्थैः कर्तेत्यादिभिश्च विभा-
वादिरूपतया रौद्र एवानुगृह्यते ।
कर्तेत्यादौ च प्रतिपदं प्रत्यवान्तरवाक्यं प्रतिसमासं च व्यङ्ग्यमुत्प्रेक्षितुं
शक्यमेवेति न लिखितम् । पाण्डवा यस्य दासा इति तदीयोक्त्यनुकारः । तत्र
गुणीभूतव्यङ्ग्यतापि योजयितुं शक्या, वाच्यस्यैव क्रोधोद्दीपकतत्वात् । दासैश्च
कृतकृत्यैः स्वाम्यवश्यं द्रष्टव्य इत्यर्थशक्त्यनुरणनरूपतापि । उभयथापि चारु-
यहाँ—दोनों उदाहरणों में । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की—। 'व्यङ्ग्यविशिष्ट' इस
( कथन ) से व्यङ्ग्य रौद्र का गुणाभाव कहा है । 'पदों के साथ' यहाँ उपलक्षण में
तृतीया । उससे उपलक्षित, अर्थात् जो अर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्य भाव से है उससे सम्मिश्रता
अर्थात् सङ्कीर्णता । और उसे ( सङ्कीर्णता को ) अनुग्राह्यानुग्राहकभाव से, सन्देह-
योग से और एक व्यञ्जकानुप्रवेश से यथासम्भव दोनों उदाहरणों में लगा लेना चाहिए ।
जैसा कि 'मे यदयः' इत्यादि सभी पदार्थों से और 'कर्त्ता' इत्यादि द्वारा विभावादि रूप
से रौद्र ही अनुगृहीत होता है । 'कर्त्ता' इत्यादि में प्रति पद, प्रति अवान्तर वाक्य और प्रति
समास व्यङ्ग्य की उत्प्रेक्षा की ही जा सकती है यह नहीं लिखा है । 'पाण्डव जिसके दास
हैं' यह उस (दुर्योधन) की उक्ति का अनुकरण है । वहां गुणीभूतव्यङ्ग्यभाव को भी लगा
सकते हैं, क्योंकि वाच्य ही क्रोध का उद्दीपक है । और 'कृतकृत्य दासों को चाहिए कि
स्वामी को अवश्य देखें' यह अर्थशक्त्यनुरणन रूपता भी है। दोनों प्रकार से भी चारुत्व
५३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
भिधायिभिः पदैः सम्मिश्रता । अत एव च पदार्थाश्रयत्वे गुणीभूतव्य-
ङ्ग्यस्य वाक्यार्थाश्रयत्वे च ध्वनेः सङ्कीर्णतायामपि न विरोधः
स्वप्रभेदान्तरवत् । तथाहि ध्वनिप्रभेदान्तराणि परस्परं सङ्कीर्यन्ते
पदार्थवाक्यार्थाश्रयत्वेन च न विरुद्धानि ।
किं चैकव्यङ्ग्याश्रयत्वे तु प्रधानगुणभावो विरुध्यते न तु व्यङ्ग्य-
भेदापेक्षया, ततोऽप्यस्य न विरोधः । अयं च सङ्करसंसृष्टिव्यवहारो
करनेवाले पदों के साथ सम्मिश्रता है । और इसीलिए गुणीभूतव्यङ्ग्य के पदार्थाश्रित
होने में और ध्वनि के वाक्यार्थाश्रित होने में सङ्कीर्णता होने पर भी अपने अन्य प्रभेद
की भाँति विरोध नहीं है। जैसा कि ध्वनि के अन्य प्रभेद परस्पर सङ्कीर्ण होते हैं,
और पदार्थ और वाक्यार्थ के आश्रित होने से विरुद्ध नहीं हैं ।
और भी, एक व्यङ्ग्य में आश्रित होने से प्रधानभाव और गुणभाव विरुद्ध हो
सकते हैं न कि व्यङ्ग्यभेद की अपेक्षा से । इस कारण भी इसका विरोध नहीं है ।
लोचनम्
त्वादेकपक्षाग्रहे प्रमाणाभावः । एकव्यञ्जकानुप्रवेशस्तु तैरेव पदैः गुणीभूतस्य
व्यङ्ग्यस्य प्रधानीभूतस्य च रसस्य विभावादिद्वारतयाभिव्यञ्जनात् । अत एव
चेति । यतोऽत्र लक्ष्ये दृश्यते तत इत्यर्थः । ननु व्यङ्ग्यं गुणीभूतं प्रधानं चेति
विरुद्धमेव तद्दृश्यमानमप्युक्तत्वान्न श्रद्धेयमित्याशङ्क्य व्यञ्जकभेदात्तावन्न
विरोध इति दर्शयति—अत एवेति । स्वेति । स्वप्रभेदान्तराणि संकीर्णतया
पूर्वमुदाहृतानीति तान्येव दृष्टान्तयति । तदेव व्याचष्टे—यथाहीति । तथात्रापी-
त्यध्याहारोऽत्र कर्तव्यः । 'तथा हि' इति वा पाठः ।
ननु व्यञ्जकभेदात्प्रथमभेदयोः परिहारोऽस्तु एकव्यञ्जकानुप्रवेशे तु किं
वक्तव्यमित्याशङ्क्य पारमार्थिकं परिहारमाह—किञ्चेति । ततोऽपीति । यतोऽन्य-
के कारण एक पक्ष के ग्रहण में प्रमाण नहीं है। एक व्यञ्जकानुप्रवेश उन्हीं-पदों से
गुणीभूत व्यङ्ग्य और प्रधानीभूत रस का विभावादि के प्रकार से अभिव्यञ्जन से होता
है । और इसी लिए—। अर्थात् जिस कारण इस लक्ष्य में देखा जाता है उस कारण ।
गुणीभूत और प्रधान व्यङ्ग्य दोनों देखे जाने पर भी विरुद्ध ही है, केवल कह देने से
श्रद्धा के योग्य नहीं, यह आशङ्का करके 'व्यञ्जक भेद से विरोध नहीं है' यह दिखाते
हैं—इसी लिए—। अपने—। अपने अन्य प्रभेद सङ्कीर्ण रूप से पहले उदाहृत हो चुके '
हैं उन्हें ही दृष्टान्त करते हैं । उसे ही व्याख्यान करते हैं—'जैसा कि'—। 'उस प्रकार
यहाँ भी' इसका अध्याहार यहाँ करना चाहिए । अथवा 'तथाहि' यह पाठ है ।
व्यञ्जक के भेद से प्रथम दो भेदों में ( विरोध का ) परिहार हो जाय, किन्तु एक
व्यञ्जकानुप्रवेश में क्या कहियेगा ? यह आशङ्का करके पारमार्थिक परिहार कहते हैं—
तृतीय उद्योतः ५३९
ध्वन्यालोकः
बहूनामेकत्र वाच्यवाचकभाव इव व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽपि निर्विरोध एव
मन्तव्यः । यत्र तु पदानि कानिचिदविवक्षितवाच्यान्यनुरणनरूप-
व्यङ्ग्यवाच्यानि वा तत्र ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोः संसृष्टत्वम् । यथा-
‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्’ इत्यादौ । अत्र हि ‘विलाससुहृदां’
‘राधारहःसाक्षिणाम्’ इत्येते पदे ध्वनिप्रभेदरूपे ‘ते’ ‘जाने’ इत्येते च
पदे गुणीभूतव्यङ्ग्यरूपे ।
और इस संसृष्टि और सङ्कर व्यवहार को एक जगह बहुतों के वाच्यवाचक भाव की
भाँति व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव में भी निर्विरोध ही मानना चाहिए । परन्तु जहां कुछ पद
अविवक्षितवाच्य और कुछ पद अनुरणनरूप व्यङ्ग्यपरक हों वहाँ ध्वनि गुणीभूतव्यङ्ग्य
की संसृष्टि है । जैसे—‘तेषां गोपवधूविलाससुहृदां’ इत्यादि में । यहां ‘विलाससुहृदां’
‘राधारहःसाक्षिणां’ ये दो पद ध्वनिप्रभेद रूप हैं और ‘ते’ ‘जाने’ ये पद गुणीभूतव्यङ्ग्य
रूप हैं।
लोचनम्
द्व्यङ्ग्यं गुणीभूतमन्यच्च प्रधानमिति को विरोधः । ननु वाच्यालंकारविषये
श्रुतोऽयं संकरादिव्यवहारो न तु व्यङ्ग्यविषय इत्याशङ्क्याह-अयं चेति ।
मन्तव्य इति । मननेन प्रतीत्या तथा निश्चयः उभयत्रापि प्रतीतेरेव शरणत्वा-
दिति भावः । एवं गुणीभूतव्यङ्ग्यसंकरभेदांस्त्रीनुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति-यत्र
तु पदानीति । कानिचिदित्यनेन संक्रावकाशं निराकरोति । सुहृच्छब्देन साक्षि-
शब्देन चाविवक्षितवाच्यो ध्वनिः ‘ते’ इतिपदेनासाधारणगुणगणोऽभिव्य-
क्तोऽपि गुणत्वमवलम्बते, वाच्यस्यैव स्मरणस्य प्राधान्येन चारुत्वहेतुत्वात् ।
और भी—। इस कारण भी—। क्योंकि गुणीभूत व्यङ्ग्य अन्य है और प्रधान व्यङ्ग्य
अन्य है, फिर विरोध कैसा ? ( शङ्का ) वाच्य अलङ्कारों के विषय में यह सङ्कर आदि
का व्यवहार सुनने में आता है न कि व्यङ्ग्य के विषय में, यह आशङ्का करके कहते
हैं—और इस—। मानना चाहिए—। मनन अर्थात् प्रतीति से उस प्रकार निश्चय
करना चाहिए, भाव यह कि क्योंकि दोनों स्थानों में प्रतीति ही शरण है । इस प्रकार
गुणीभूतव्यङ्ग्यसङ्कर के तीन भेदों को उदाहृत करके संसृष्टि को उदाहृत करते हैं—
परन्तु जहां कुछ पद—। ‘कुछ’ इस ( कथन ) से संकर के अवकाश का निराकरण
करते हैं । ‘सुहृत्’ शब्द और ‘साक्षी’ शब्द से अविवक्षित वाच्य ध्वनि है । ‘ते’ इस
पद से असाधारण गुणसमूह अभिव्यक्त होकर भी ( वाच्य के प्रति ) गुणभाव प्राप्त
कर लेता है, क्योंकि वाच्य स्मरण ही प्राधान्यतः चारुत्व का हेतु है । उत्प्रेक्ष्यमाण
५४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्वमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यापेक्षया रसवति
सालङ्कारे काव्ये सर्वत्र सुव्यवस्थितम् । प्रभेदान्तराणामपि कदाचि-
त्सङ्कीर्णत्वं भवत्येव । यथा ममैव—
वाच्य अलंकारों का संकीर्णत्व अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की अपेक्षा के साथ रसयुक्त और
अलंकारयुक्त सभी काव्य में सुनिश्चित है । अन्य प्रभेदों का भी कदाचित् संकीर्णत्व
( संकर ) होता ही है । जैसे मेरा ही—
लोचनम्
'जाने' इत्यनेनोत्प्रेक्ष्यमाणानन्तधर्मव्यञ्जकेनापि वाच्यमेवोत्प्रेक्षणरूपं प्रधानी-
क्रियते । एवं गुणीभूतव्यङ्ग्येऽपि चत्वारो भेदा उदाहृताः ।
अधुनालंकारगतांस्तान्दर्शयति—वाच्यालङ्कारेति । व्यङ्ग्यत्वे त्वलंकाराणा-
मुक्तभेदाष्टक एवान्तर्भाव इति वाच्यशब्दस्याशयः । काव्य इति । एवंविधमेव हि
काव्यं भवति । सुव्यवस्थितमिति । 'विवक्षा तत्परत्वेन' इति द्वितीयोद्द्योतम्-
लोदाहरणैभ्यः संकरत्रयं संसृष्टिश्च लभ्यत एव । 'चलापाङ्गां दृष्टिम्' इत्यत्र हि
रूपकव्यतिरेकस्य प्राग्व्याख्यातस्य शृङ्गारानुग्राहकत्वं स्वभावोक्तेः शृङ्गारस्य
चैकानुप्रवेशः । 'उप्पह जाया' इति गाथायां पामरस्वभावोक्तिर्वा ध्वनिर्वेति
प्रकरणाद्यभावे एकतरग्राहकं प्रमाणं नास्ति ।
यद्यप्यलङ्कारो रसमवश्यमनुगृह्णाति, तथापि 'नातिनिर्वहणैषिता' इति
यदभिप्रायेणोक्तं तत्र सङ्करासम्भवात्संसृष्टिरेवालङ्कारेण रसध्वनेः । यथा—'बाहु-
लतिकापाशेन बद्ध्वा दृढम्' इत्यत्र । प्रभेदान्तराणामपीति । रसादिध्वनिव्यति-
अनन्त धर्म के व्यंजक भी 'जाने' इस से उत्प्रेक्षण रूप वाच्य ही प्रधानीकृत होता है ।
इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य में भी चार भेद उदाहृत हुए ।
अब अलंकारत उन्हें दिखाते हैं—वाच्य अलंकारों का—। व्यङ्ग्य होने पर
अलङ्कारों का उक्त आठ भेदों में ही अन्तर्भाव है यह 'वाच्य' शब्द का आशय है । काव्य
में—। इस प्रकार का ही काव्य होता है । सुनिश्चित—। 'विवक्षा तत्परत्वेन' इस द्वितीय
उद्योत के मूल के उदाहरणों से तीनों संकर और संसृष्टि प्राप्त ही होते हैं । 'चलपाङ्गां
दृष्टि' यहां पहले व्याख्यात रूपक और व्यतिरेक शृङ्गार के अनुग्राहक हैं, स्वभावोक्ति
का और शृंगार का एकानुप्रवेश है । उप्पइ जाया' इस गाथा में पामर की स्वभावोक्ति है
अथवा ध्वनि है, प्रकरण आदि के अभाव में दोनों में से एक का ग्राहक प्रमाण नहीं है ।
यद्यपि अलंकार रस को अवश्य अनुगृहीत करता है तथापि जिस अभिप्राय से
'नातिनिर्वहणैषिता' ( अर्थात् अलंकार को अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा न रखना )
कहा है । कहाँ संकर के सम्भव न होने से अलंकार के साथ रसध्वनि की संसृष्टि ही
होती है । जैसे 'बाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढं' यहाँ ( रूपक के साथ रस की संसृष्टि
ही है ) । अन्य प्रभेदों का भी—। रसादि ध्वनि से व्यतिरिक्त । व्यापारशील—। कह
तृतीय उद्योतः ५४१
ध्वन्यालोकः
या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचित्कवीनां नवा
दृष्टिर्या परिनिष्ठितार्थविषयोन्मेषा च वैपश्चिती ।
हे समुद्र में शयन करनेवाले भगवान्, जो रसों के आस्वाद करने के लिए
व्यापारशील कवियों की नई कोई दृष्टि है और परिनिष्ठित है अर्थ के विषय में उन्मेष
लोचनम्
रिक्तानाम् । व्यापारवतीति । निष्पादनप्राणो हि रस इत्युक्तम् । तत्र विभावादि-
योजनात्मिका वर्णना, ततः प्रभृति घटनापर्यन्ता क्रिया व्यापारः, तेन सतत-
युक्ता । रसानिति । रस्यमानतासारान् स्थायिभावान् रसयितुं रस्यमानताप-
त्तियोग्यान् कर्तुम् । काचिदिति लोकवार्तापतितबोधावस्थात्यागेनोन्मीलन्ती ।
अत एव ते कवयः वर्णनायोगात् तेषाम् । नवेति । क्षणे क्षणे नूतनैर्नूतनैर्वैचित्र्यै-
र्जगन्त्यासूत्रयन्ती । दृष्टिरिति । प्रतिभारूपा, तत्र दृष्टिश्चाक्षुषं ज्ञानं पाडवादि
रसयतीति । विरोधादलङ्कारोऽत एव नवा । तदनुगृहीतश्च ध्वनिः, तथाहि चाक्षुषं
ज्ञानं नाविवक्षितमत्यन्तमसम्भवाभावात् । न चान्यपरम्; अपि त्वर्थान्तरे
ऐन्द्रियकविज्ञानाभ्यासोल्लसिते प्रतिभानलक्षणेऽर्थे संक्रान्तम् । संक्रमणे च
विरोधोऽनुग्राहक एव । तद्वक्ष्यति—'विरोधादलङ्कारेण' इत्यादिना । या चैवंविधा
दृष्टिः परिनिष्ठितोऽचलः अर्थविषये निश्चेतव्ये विषये उन्मेषो यस्याः । तथा
परिनिष्ठिते लोकप्रसिद्धेऽर्थे न तु कविवदपूर्वस्मिन्नर्थे उन्मेषो यस्याः सा ।
चुके हैं कि रस का प्राण निष्पादन है। वहाँ विभावादि की योजना रूप वर्णना होती है,
उससे लेकर घटना ( तत्तत् पदों की घटना ) तक क्रिया व्यापार है। उस ( व्यापार )
से सततयुक्त। रसों के—। रस्यमानतासार स्थायिभावों के आस्वाद कराने अर्थात्
रस्यमानता की प्राप्ति के योग्य करने। कोई—। लोकवार्ता में प्राप्त बोधावस्था के
त्याग से उन्मीलित रोती हुई। इसी लिए वे 'कवि' हैं क्योंकि उनमें वर्णना का योग
होता है। नई—। क्षण-क्षण में नये-नये वैचित्र्यों से संसार को प्रासूत्रित ( प्रकाशित )
करती हुई। दृष्टि—। प्रतिभा रूप, वहाँ दृष्टि अर्थात् चाक्षुष ज्ञान, पाउप् आदि पेय
द्रव्यों को आस्वाद करती है, यह विरोध अलङ्कार है, इसी लिए नई। और उससे
अनुगृहीत ध्वनि है जैसा कि चाक्षुष ज्ञान अत्यन्त अविवक्षित ( अर्थात् अत्यन्त तिरस्कृत )
नहीं है, क्योंकि अत्यन्त असम्भव नहीं है और अन्य पर ( अर्थात् विवक्षित भी ) नहीं
है, बल्कि ऐन्द्रियक विज्ञान के अभ्यास से उल्लसित प्रतिमान रूप अर्थ में सङ्क्रान्त है।
और सङ्क्रमण में विरोध अनुग्राहक ही है। उसे कहेंगे—'विरोध अलङ्कार से' इत्यादि
द्वारा। जो इस प्रकार की दृष्टि है, परिनिष्ठित अर्थात् अचल है अर्थ के विषय में अर्थात्
निश्चेतव्य विषय में उन्मेष जिसका। उस प्रकार परिनिष्ठित अर्थात् लोकप्रसिद्ध अर्थ में,
न कि कवि की भांति अपूर्व अर्थ में उन्मेष है जिसका वह। विपश्चित् ( विद्वान् ) लोगों